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Date of publication : 26/8/2018 17:27
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नमाज़ की अज़मत

अल्लाह ने नमाज़ के तीन समय तय कर के हर ईमानी हरारत का इम्तेहान कर लिया, सुबह की नमाज़ आराम और ईमान का मुक़ाबला है और उस समय यह अंदाज़ा हो जाता है कि इंसान के लिए आराम ज़्यादा अहमियत रखता है या ईमान और अक़ीदाl

विलायत पोर्टल :  नमाज़ की अज़मत और अहमियत के लिए अल्लाह का यह फ़रमान ही काफ़ी है कि: नमाज़ क़ायम करो और ख़बरदार मुशरिकों में से न हो जाना,  यानी अल्लाह की निगाह में नमाज़ इस्लाम और ईमान की अलामत है और नमाज़ से मुंह मोड़ने वाला दूरी बनाने वाला हक़ीक़त में मुशरिकों में शामिल हो जाता है हालांकि ज़ाहिर में वह मुसलमान ही रहता है उसके अहकाम मुसलमानों के ही अहकाम रहते हैं, इसके अलावा नमाज़ में बहुत सारी विशेषताएं पाई जाती हैं जिनमें से कुछ हम यहां बयान कर रहे हैं:
** नमाज़ मासूमीन अ.स. के अमल की पैरवी है जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: "वैसे नमाज़ पढ़ो जैसे मुझे नमाज़ पढ़ते देखते हो" यानी नमाज़ी नमाज़ में वही हालत अपना लेता है जो अल्लाह की बारगाह में उसके नबी की हालत होती थी और नमाज़ी मालिक की बारगाह में उसी तरह हाज़िरी देता था जिस तरह अल्लाह का पसंदीदा नबी हाज़िरी दिया करते थेl
यह शरफ़ नमाज़ी को तो हासिल है लेकिन दौलत और पावर वाले को हासिल नहीं है उनके रहन सहन, उनकी ज़िंदगी और हुकूमत नबी के अंदाज़ की तरह नहीं है, आपकी ज़िंदगी न पूंजीपतियों की तरह थी न सत्ताधारियों की तरह लेकिन बंदगी में आप अल्लाह के बंदे ज़रूर थे और आपका हर अंदाज़ अल्लाह की बंदगी की बेहतरीन मिसाल था इसलिए बंदगी करने वाला तो आपकी पूरी तरह से पैरवी कर सकता है लेकिन पूंजीपतियों और सत्ताधारी अंदाज़ की ज़िंदगी गुज़ारने वाला आपकी ज़िंदगी को आइडियल नहीं बना सकताl
** नमाज़ की एक विशेषता यह भी है कि उसका रुख़ हमेशा बुलंदी की तरफ़ होता है, नमाज़ी शुरु से ही अल्लाह से क़रीब होने की नीयत करता है जिसका मतलब यह है कि वह अपने हर अमल से अल्लाह की बारगाह से क़रीब होता चला जाता है और नई नई ऊंचाइयों को हासिल करता जाता है, नमाज़ का यह वह शरफ़ है जिसे दुनिया का कोई कमाल नहीं पा सकता, हर कमाल का रुख़ कभी बुलंदी तो कभी पस्ती की तरफ़ होता है लेकिन नमाज़ का रुख़ शुरु से आख़िर तक बुलंदी की तरफ़ रहता है और अगर इसके विपरीत हो जाए तो नमाज़ नमाज़ कहे जाने लायक़ नहीं हैl
** नमाज़ का बुलंदियों की तरफ़ ही परवाज़ करना इस बात की निशानी है कि नमाज़ का संबंध इस दुनिया से नहीं है बल्कि किसी और दुनिया से है, इंसान मिट्टी के ढेले को हवा में छोड़ दे तो वह ज़मीन ही की तरफ़ आएगा और अगर ग़ुब्बारे को ज़मीन पर भी बांध दे तो वह ऊपर ही की तरफ़ जाएगा क्योंकि मिट्टी का संबंध पस्ती से है और हवा का संबंध बुलंदी से और हर चीज़ की फ़ितरी ख़ासियत यह है कि वह अपनी असलियत की तरफ़ परवाज़ करेl
नमाज़ का अल्लाह के क़रीब ले जाना इस बात की अलामत है कि उसका संबंध एक अज़ीम दुनिया से है और यह बात उन हदीस से भी साबित हो जाती है जिनमें नमाज़ को मेराज का तोहफ़ा बताया गया है और अल्लाह ने सारे अहकाम जिबरील द्वारा ज़मीन पर भेजे लेकिन नमाज़ का तोहफ़ा अपने नबी को उस समय दिया जब आप मेराज पर तशरीफ़ ले गए थे और वहां से वापस आ रहे थे, अल्लाह ने यह चाहा कि मेरा हबीब इतने अज़ीम और इतने लंबे सफ़र से ख़ाली हाथ न लौटे इसलिए उम्मत की कामयाबी और नजात के लिए एक ऐसा तोहफ़ा साथ में दिया जो किसी एक इलाक़े या किसी एक दौर तक सीमित नहीं था बल्कि हर इलाक़े और हर दौर के लोगों के लिए काम आ सकता हैl
हदीस में नमाज़ के मोमिन की मेराज होने का एक फ़लसफ़ा यह भी है कि नमाज़ मेराज का तोहफ़ा है और तोहफ़ा, तोहफ़ा लेने वाले को अपनी फेज़ा और परिचित करा देता है और एक दुनिया से दूसरी दुनिया तक पहुंचा देता हैl
** नमाज़ इस फ़ना होने वाली दुनिया के लिए एक थर्मामीटर है, थर्मामीटर वह आला है जिससे इंसान के जिस्म का टेंपरेचर को चेक किया जाता है कि कहीं टेंपरेचर घट कर या बढ़ कर इंसान को मौत तक तो नहीं ले जा रहा है, नमाज़ ईमानी हरारत (temperature) के लिए एक थर्मामीटर का काम करती है, हर शख़्स का ख़्याल है कि वह सच्चा और हक़ीक़ी मोमिन है और ईमान और अक़ीदे के सामने किसी चीज़ की कोई अहमियत और हैसियत नहीं है, मोमिन के लिए सबसे अहम उसका ईमान होता है उससे बढ़ कर उसके लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन जब इम्तेहान का समय आता है तभी ईमान की हक़ीक़त और सच्चाई सामने आती हैl
इंसान ज़िंदगी में तीन अहम इम्तेहान से गुज़रता है जब ईमान ख़तरे में पड़ जाता है और दुनिया की गर्मी ईमान की हरारत को पीछे छोड़ देती है और ईमान की हरारत फीकी पड़ जाती हैl
दूसरा मौक़ा शहवत और ख़्वाहिश का है जहां इंसान इस हद तक अंधा हो जाता है कि न अक़ीदा याद रह जाता है न ईमान, दिल में बस एक आरज़ू होती है कि दुनिया की ख़्वाहिश कैसे भी कर के पूरी की जाए, उसके बाद आख़ेरत की ख़बर अल्लाह जानेl
तीसरा मौक़ा समय का है कि जब इंसान थक जाता है तो थोड़ा समय अकेले में बिताना चाहता है और उस समय में उसे कोई भी चीज़ अच्छी नहीं लगती चाहे वह ईमान और अक़ीदा ही क्यों न होl
अल्लाह ने नमाज़ के तीन समय तय कर के हर ईमानी हरारत का इम्तेहान कर लिया, सुबह की नमाज़ आराम और ईमान का मुक़ाबला है और उस समय यह अंदाज़ा हो जाता है कि इंसान के लिए आराम ज़्यादा अहमियत रखता है या ईमान और अक़ीदाl
ज़ोहरैन की नमाज़ ख़्वाहिशों का थर्मामीटर है कि इंसान दुनिया कमाना चाहता है और ज़्यादा से ज़्यादा आराम की चीज़ें हासिल करना चाहता है और नमाज़ बंदगी की ओर खींचती है, मग़रेबैन की नमाज़ समय और इबादत का टकराव है जहां ईमान वाला इबादत का रुख़ करता है और कमज़ोर ईमान वाला पहले आराम के बारे में सोचता है उसके बाद नमाज़ का ख़ुदा हाफिज़ ही हैl
ध्यान रहे जिस तरह दुनिया में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले की शर्तें होती हैं और उस पर अमल के लिए इंसान की अक़्ल और उसकी फितरत दोनों हुक्म लगाती है उसी तरह आख़ेरत में जन्नत तक पहुंचाने वाले की शर्तों पर भी पूरी तरह अमल होना चाहिए, आख़ेरत में शफ़ाअत करने वाले मासूमीन अ.स. ने यह शर्त लगा दी है कि हम अहलेबैत अ.स. की शफ़ाअत नमाज़ को हल्का और कम अहमियत देने वालों के लिए नहीं हैl


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