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Code : 195030
Date of publication : 19/8/2018 11:37
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इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. की ज़िंदगी पर एक निगाह

आप अपने जद पैग़म्बर स.अ. का यह इरशाद हमेशा नक़्ल करते थे कि दुनिया में तीन काम सबसे मुश्किल हैं: "ईमानी भाई की माली मदद करना, अपने मुक़ाबले में लोगों से इंसाफ़ करना और हर हाल में अल्लाह को याद करना ।

विलायत पोर्टल : आपका नाम मोहम्मद और लक़ब बाक़िर था और रिवायत को देखते हुए कहा जा सकता है कि आपको नाम और लक़ब दोनों पैग़म्बर स.अ. ने दिए थेl आपकी विलादत पहली रजब सन् 57 हिजरी को हुई और आपने लगभग साढ़े तीन साल अपने जद इमाम हुसैन अ.स. के साए में ज़िंदगी गुज़ारी और कर्बला के अज़ीम हादसे को आंखों से देखा और सारे मसाएब में अहले हरम के साथ रहे और अपने वालिद के साथ इस्लाम को बचाने की राह में क़ुर्बानी देते रहे।
आपकी अज़मत आपकी अज़मत और हैबत का आलम यह था कि अब्दुल्लाह इब्ने अता मक्की कहा करते थे कि मैंने किसी के सामने उलमा का क़द इतना छोटा नहीं देखा जितना इमाम बाक़िर अ.स. के सामने देखाl (अल इरशाद, पेज 263) इब्नुल एमाद हमबली का कहना था कि अबू जाफ़र मोहम्मद बाक़िर अ.स. मदीने के फ़ोक़हा में से थे और उन्हें उनकी इल्म की गहराइयों और बारीकियों की वजह से बाक़िर के लक़ब से याद किया जाता है।
(अल इमामुस सादिक़ वल मज़ाहिबुल अरबआ, जिल्द 2, पेज 436)
अल्लाह से आपका रिश्ता
इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. का बयान है कि मेरे वालिद बेहद अल्लाह का ज़िक्र करते थे, रास्ता चलते थे तो अल्लाह का ज़िक्र करते थे, खाना खाते थे तो अल्लाह का ज़िक्र करते थे, लोगों से बात करते समय भी अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल नहीं होते थे, सुबह की नमाज़ के बाद से सूरज निकलने तक सारे घर वालों के साथ अल्लाह का ज़िक्र करते थे। (बिहारुल अनवार, जिल्द 46, पेज 297)
आपके ख़ादिम का बयान है कि हज के सफ़र में मैं आपके साथ था जैसे ही काबे पर निगाह पड़ी आपने रोना शुरू कर दिया, मैंने कहा मेरे मां बाप आप पर क़ुर्बान हो जाएं लोगों की निगाह आप पर है आप इतनी बुलंद आवाज़ से न रोएं, आपने फ़रमाया अल्लाह तुम्हारा भला करे लेकिन मैं कैसे न रोऊं जबकि ऐसी हालत पर अल्लाह को रहम आ सकता है और क़यामत के दिन आख़ेरत संवर सकती है, तवाफ़ के बाद जब नमाज़ पढ़ कर सजदे से सर उठाया तो ज़मीन आंसुओं से भीग चुकी थी । (बिहारुल अनवार, जिल्द 46, पेज 290)
आपकी समाजी ज़िंदगी
इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. का बयान है कि मैंने एक दिन में आपको 8 हज़ार दीनार ख़र्च करते देखा है और एक घर के 11 ग़ुलामों को आज़ाद कराते हुए देखा है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 46, पेज 302)
हसन इब्ने कसीर कहते हैं कि मैंने ग़रीबी और दोस्तों के साथ छोड़ने का ज़िक्र किया तो आपने फ़रमाया कि सबसे बुरा भाई वह है जो मालदारी में रिश्ता रखे और ग़रीबी में रिश्ता तोड़ ले और उसके बाद ग़ुलाम को हुक्म दिया उसने 700 दिरहम की थैली मुझे दे दी और फिर फ़रमाया कि जब यह ख़त्म हो जाएं तो फिर बताना। (अल इरशाद, पेज 266)
उमर इब्ने दीनार और उबैदुल्लाह इब्ने उबैद का बयान है कि हम लोग इमाम अ.स. से जब भी मुलाक़ात करते थे तो आप पहले से ही हमारे लिए अच्छे खाने और कपड़े तैयार रखते थे । (अल इरशाद, पेज 266)
आप अपने जद पैग़म्बर स.अ. का यह इरशाद हमेशा नक़्ल करते थे कि दुनिया में तीन काम सबसे मुश्किल हैं: "ईमानी भाई की माली मदद करना, अपने मुक़ाबले में लोगों से इंसाफ़ करना और हर हाल में अल्लाह को याद करना
आपका इल्मी मर्तबा
अल्लामा इब्ने शहर आशोब का बयान है कि एक शख़्स ने अब्दुल्लाह इब्ने उमर से मसला पूछा उन्हें उसका जवाब नहीं मालूम था तो उन्होंने उसे इमाम मोहम्मद बाक़िर अ.स. के पास भेज दिया और कहा वापस आ कर जवाब मुझे भी बताना, वह शख़्स इमाम अ.स. के पास गया तो ऐसा लगा कि जैसे जवाब पहले से तैयार था, उसने वापस आ कर अब्दुल्लाह इब्ने उमर को बताय तो उनसे कहा कि यह उस घराने से हैं जिनको शरीयत की समझ और परख दे कर भेजा गया है।
(मनाक़िब, जिल्द 4, पेज 197)
मोहम्मद इब्ने अल मुंकदिर अपने दौर के मशहूर सूफ़ी थे, दुनिया छोड़ कर अल्लाह की इबादत किया करते थे, एक दिन इमाम दोपहर के समय ख़ादिमों के साथ बाग़ की ओर जा रहे थे, मैंने देखा और यह सोंच कर उनकी तरफ़ चल दिया ताकि उनको नसीहत करूंगा, उनके पास पहुंच कर कहने लगे कि इस गर्मी में दुनिया को हासिल करने के लिए कहां निकल पड़े रास्ते में अगर मौत आ गई तो क्या होगा? इमाम अ.स. ने फ़रमाया कि यह मौत रोज़ी की तलाश और अल्लाह की इताअत में होगी, तुम यह बताओ उस मौत का क्या होगा जो अल्लाह की मासियत में आ जाए जिसकी तरफ़ पैग़म्बर स.अ. ने इशारा किया है कि जो अपना बोझ दूसरों पर डाल दे वह लानत का हक़दार है और ज़िंदगी के इसी अंदाज़ का नाम सूफ़ी है जिसका दूसरा नाम तक़द्दुस की आड़ में मुफ़्त ख़ोरी है।
इब्ने अल मुंकदिर यह सुन कर चुप हो गया और कहने लगा मैं इन्हें नसीहत करना चाहता था, उन्होंने ख़ुद हो मुझे नसीहत कर दी।  (अल इरशाद, पेज 214)
आपके शागिर्द मोहम्मद इब्ने मुस्लिम का बयान है कि मैंने हर मसले का हल इमाम अ.स. से हासिल किया इसलिए मेरे पास 30 हज़ार हदीसें हैं। (रेजाल कश्शी, पेज 167)
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