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Date of publication : 6/8/2018 16:47
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इल्म और माल

जिस्म और रूह के बाक़ी रहने का ज़रिया इल्म और माल है और दोनों को बाक़ी रहना है इसलिए न माल को बुरा कहा जा सकता है न इल्म को, क़ुर्आन ने माले दुनिया को कहीं ख़ैर कहीं अल्लाह का फ़ज़्ल बताया है जो इस बात को दर्शाता है कि इस्लाम माल और दौलत का दुश्मन नहीं है, इंसान का दुश्मन माल का हराम होना है और हराम माल में माल की ग़लती नहीं बल्कि इंसान की ग़लती है।

विलायत पोर्टल :  अल्लाह ने इंसान को दो हिस्सों से मिला कर बनाया है: जिस्म और रूह, और दोनों को अपने ज़िंदा रखने के लिए ख़ुराक के मोहताज हैं, जिस्म की ख़ुराक का नाम है माल और रूह की ख़ुराक का नाम है इल्म ।
इल्म और माल के दर्जों को समझने के लिए जिस्म और रूह की हैसियत पर ध्यान देना होगा, जितना निचले दर्जे का जिस्म होगा उतना ही पस्त और निचले स्तर का माल होगा और रूह का दर्जा जितना बुलंद होगा इल्म का दर्जा भी उतना ही बुलंद होगा ।
जिस्म मिट्टी में मिल जाने वाला है इसलिए उसकी ख़ुराक भी मिटने वाली चीज़ होती है, रूह अरवाह की दुनिया संबंध रखती है इसलिए उसकी ख़ुराक भी बाक़ी रहने वाली चीज़ होती है।
जिस्म मुर्दा होने वाला है इसलिए उसकी ख़ुराक भी मिट जाने वाली है रूह अमर है इसलिए उसकी ख़ुराक भी अमर है।
माल और दौलत दुनिया से संबंधित है इसलिए उसमें बढ़ोतरी दुनियादारी को बढ़ावा देती है, इल्म रूहानियत से सम्बंधित है इसलिए इल्म में बढ़ोतरी रूहानियत को बढ़ाती है, यही वजह है कि अल्लाह ने इल्म को भूख में रखा है कि जितनी दुनियादारी कम होगी उतना ही इल्म की ख़ुशहाली ज़्यादा होगी ।
जिस्म और रूह के दुनिया और आख़ेरत से सम्बंधित होने का एक असर यह भी है कि जिस्म समय के गुज़रने के साथ साथ कमज़ोर होता जाता है लेकिन रूह में कमज़ोरी नहीं आती, यही वजह है कि उम्र बढ़ने के साथ इल्म बढ़ता जाता है और इल्म जिस्म के कमज़ोर होने से प्रभावित नहीं होता, बुढ़ापे में याद्दाश्त का कमज़ोर होना इल्म की कमज़ोरी नहीं बल्कि जिस्मानी कमज़ोरी है जिसका संबंध दिमाग़ से है।
इस्लाम ने रूह के लिए बेहतरीन इल्म अक़ाएद को क़रार दिया है और जिस्म के लिए बेहतरीन अमल इबादत को क़रार दिया है, माल और दौलत जिस्म के बाक़ी रहने के लिए और आमाल जिस्म की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी है।
जिस्म और रूह का संबंध इतना गहरा है कि अगर रूह से इल्म और अक़्ल को अलग कर दिया जाए तो जिस्म की हैसियत जानवर से ज़्यादा नहीं रह जाती, इसी तरह अगर रूह अकेली रह जाए तो जिस्म मौत का शिकार हो जाता है। इस्लाम का मक़सद यह है कि जिस्म और रूह दोनों में तालमेल बनी रहे ताकि इंसान न घर परिवार से ग़ाफ़िल रहे और न दुनिया की चकाचौंध से धोखा खाए।
इस्लाम ने रूह द्वारा जिस्म को मज़बूत बनाया और इबादतें ऐसी जिससे मेडिकल फ़ायदा भी होता रहे, और जिस्म द्वारा रूह को फ़ायदा पहुंचाया है ताकि माल और दौलत में भी अल्लाह से क़रीब होने की नीयत रहे।
जिस्म और रूह के बाक़ी रहने का ज़रिया इल्म और माल है और दोनों को बाक़ी रहना है इसलिए न माल को बुरा कहा जा सकता है न इल्म को, क़ुर्आन ने माले दुनिया को कहीं ख़ैर कहीं अल्लाह का फ़ज़्ल बताया है जो इस बात को दर्शाता है कि इस्लाम माल और दौलत का दुश्मन नहीं है, इंसान का दुश्मन माल का हराम होना है और हराम माल में माल की ग़लती नहीं बल्कि इंसान की ग़लती है।
जिस्म की माद्दियत और रूह की रूहानियत का असर यह भी है कि दोनों में हमेशा खींचातानी रहती है, जिस्म इंसान को माद्दियत की ओर खींचता है और रूह रूहानियत की ओर, जिस्म को अगर अच्छी ख़ुराक मिल जाती है तो वह रूह को भी अपनी ओर खींच लेता है और अगर रूह को बेहतरीन इल्म मिल जाता है तो वह जिस्म को अपने रंग में रंग लेती है।
जिस्म और रूह की यह खींचातानी का असर इल्म और माल की हैसियत पर भी पड़ता है और उनमें भी खींचातानी जारी रहती है, माल, इल्म को दुनिया की तरफ़ खींचना चाहता है और इल्म माल को आख़ेरत की तरफ़, इंसान की शराफ़त का फ़ैसला इसी खींचातानी में है कि वह माल की तरफ़ खिंच गया या इल्म के साथ चलता रहा।
माल की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि इंसान से अलग हुए बग़ैर काम नहीं आता और इल्म का सबसे बड़ा कमाल यह है कि साथ चलता रहता है और काम आता रहता है, माल, बे वफ़ा दोस्त है और इल्म वफ़ादार मददगार है।
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