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Date of publication : 2/8/2018 13:25
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मोमिन और दुनिया की मुसीबतें

पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि जिस माल की ज़कात न निकाली जाए उस माल पर भी लानत और जिस बदन की ज़कात न निकाली जाए उस बदन पर लानत, आपसे सवाल किया गया कि माल की ज़कात का मतलब तो साफ़ है लेकिन यह बदन की ज़कात का क्या मतलब है? आपने फ़रमाया बदन की ज़कात का मतलब परेशानियों और मुसीबतों में गिरफ़्तार होना है।

विलायत पोर्टल : आमतौर से सबके दिमाग़ में यह ख़्याल होता है कि अल्लाह के ख़ास बंदों को दुनिया की सारी मुसीबतों और परेशानियों से महफूज़ रहना चाहिए और हर समय अल्लाह की पनाह में रहना चाहिए और सारी मुसीबतों का रुख़ काफ़िरों और मुशरिकों की तरफ़ होना चाहिए, लेकिन इस्लामी हदीसों और रिवायतों ने साफ़ तौर पर बता दिया कि अल्लाह इंसान का इम्तेहान उसके ईमानी दर्जे और मर्तबे के हिसाब से लेता है।
हज़रत इब्राहीम को उस समय तक इमाम नहीं बनाया जब तक उन्होंने ख़ुल्लत के इम्तेहान में पूरी तरह से कामयाबी हासिल नहीं कर ली और ज़िंदगी के हर मोड़ को सब्र और सुकून और शुक्र के साथ तय नहीं कर लिया।
मोमिन की ज़िंदगी में मुसीबतें अल्लाह का तोहफ़ा और उसकी अज़मत की दलील हैं और उन्हीं मुसीबतों पर सब्र कर के इंसान इस क़ाबिल होता है कि अल्लाह उसके साथ हो जाए और वह सारी दुनिया के आगे हाथ फैलाने से बेनेयाज़ हो जाए.
मोमिन और मुसीबतों के संबंध के बारे में बयान की जाने वाली हदीसों पर ध्यान देने की ज़रूरत है....
** मोमिन के साथ दुनिया की परेशानियां तब तक रहती हैं जब तक उसके गुनाह माफ़ नहीं हो जाते।
** जैसे जैसे इंसान का ईमान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसकी आर्थिक तंगी और माली मुश्किलें बढ़ती जाती हैं।
** मोमिन की मुसीबतें उसके ईमान के एतेबार से तय होती हैं।
** मोमिन जब 40 दिन गुज़ार लेता है तो वह किसी न किसी मुश्किल में ज़रूर पड़ता है ताकि और ज़्यादा अल्लाह को याद कर सके।
** मोमिन चाहे किसी जानवर के बिल में ही क्यों न हो तो भी उसको तकलीफ़ देने वाला कोई न कोई उस पर ज़रूर हावी हो जाएगा।
** अल्लाह मोमिन बंदों का इम्तेहान बिल्कुल उसी तरह लेता है जिस तरह हकीम अपने मरीज़ का इलाज दवाओं से करता है।
** अल्लाह जब किसी बंदे से मोहब्बत करता है तो उसे मुसीबत में डाल देता है ताकि अपने उस बंदे के रोने और गिड़गिड़ाने को सुन सके।
** अल्लाह का इरशाद है कि मेरी इज़्ज़त की क़सम कि मैं किसी मोमिन बंदे पर मेहरबानी करता हूं तो उस समय तक उसे दुनिया से नहीं उठाता जब तक सारे गुनाहों का हिसाब न कर दूं चाहे उसके जिस्म में बीमारी पैदा हो जाए या माली मुश्किल हो जाए या दुनिया में किसी तरह के डर का शिकार हो जाए उसके बाद भी अगर कोई सख़्ती रह गई तो मौत की सख़्ती उसके सामने होगी ताकि उसका एक भी गुनाह बाक़ी न बचे और वह सीधा जन्नत में दाख़िल हो जाए।
** अल्लाह जब किसी बंदे के साथ नेकी करना चाहता है और अगर वह गुनहगार हुआ तो अल्लाह उसे किसी परेशानी में डाल देता है ताकि उसको इस्तेग़फ़ार याद आ जाए और उसका ध्यान इस्तेग़फ़ार की ओर रहे।
** पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि जिस माल की ज़कात न निकाली जाए उस माल पर भी लानत और जिस बदन की ज़कात न निकाली जाए उस बदन पर लानत, आपसे सवाल किया गया कि माल की ज़कात का मतलब तो साफ़ है लेकिन यह बदन की ज़कात का क्या मतलब है? आपने फ़रमाया बदन की ज़कात का मतलब परेशानियों और मुसीबतों में गिरफ़्तार होना है।
** जिसकी दुनिया मुसीबतों और मुश्किलों के बिना हो उसका दीन में शक रह जाता है।
** दुनिया की कड़वाहट आख़ेरत की मिठास है और दुनिया की मिठास आख़ेरत की कड़वाहट है।
इन सारी हदीसों से यह नतीजा सामने आता है कि...
-- मुसीबत अल्लाह की याद का बेहतरीन ज़रिया है, और अल्लाह की याद अहम होने के एतेबार से उस मुसीबत को भी पंसदीदा बना देती है जिसके द्वारा अल्लाह की याद हासिल होती है।
-- मुसीबत इंसान को सब्र की दावत देती है और सब्र इंसान को इस का़बिल बना देता है कि वह अल्लाह से क़रीब होने का हक़दार हो जाए और जिसको अल्लाह का साथ नसीब हो जाए उससे अज़ीम और बुलंद मर्तबे वाला कोई इंसान नहीं हो सकता।
-- मुसीबत रोने और आंसू बहाने का ज़रिया है और आंसू बहाना और गिड़गिड़ाना ऐसा बेहतरीन वसीला है जो अल्लाह के करम को अपनी ओर आकर्षित करता है।
-- मुसीबत इंसानों के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती है और इंसान को बिना किसी हिसाब के जन्नत में पहुंचा देती है और इससे बढ़ कर कोई शरफ़ और मर्तबा नहीं है कि इंसान बिना हिसाब किताब के जन्नत में दाख़िल हो जाए।
-- दुनिया में आराम और चैन की आरज़ू आख़ेरत से ग़फ़लत का नतीजा है और आख़ेरत से ग़फ़लत इंसान को हज़ारों मुसीबतों में डालती है इसलिए इंसान के लिए बेहतर यही है कि मुसीबतों, मुश्किलों और परेशानियों का सामना करे ताकि आख़ेरत की हर तरह की मुश्किल और परेशानी से छुटकारा हासिल कर ले। .........................


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