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Date of publication : 1/8/2018 14:31
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पर्दा

पर्दे के बारे में एक ग़लत विचार यह भी फैलाया जाता है कि पर्दे में रहने वाली औरत दुनिया का कारोबार, नौकरी और दूसरे बहुत से दुनियावी काम नहीं कर सकती वह एक क़ैदी बन कर रह जाती है.... पहली बात तो यह कि यह बात इस्लामी पर्दे से हट कर है, दूसरी बात यह कि इस्लामी इतिहास की शुरुआत ही एक पर्देदार औरत के व्यापार और कारोबार से हुई, इसलिए इस्लाम कैसे इस बात को स्वीकार कर सकता है कि पर्दे में रह कर औरत कारोबार नहीं कर सकती है.....

विलायत पोर्टल : पर्दा इंसानी ज़िंदगी का एक फ़ितरी अमल है जो हर अक़्लमंद इंसान की ज़िंदगी में पाया जाता है, दुनिया का कोई भी अक़्लमंद इंसान ऐसा नहीं है जो किसी न किसी हिसाब से पर्दे को स्वीकार न करता हो।
कौन ऐसा दौलत रखने वाला है जो अपनी दौलत को खुलेआम सबके सामने लाकर रख देता होl कौन ऐसा हीरे जवाहेरात का मालिक है जो जवाहेरात को सड़क पर लाकर बिखेर देता हो?
कौन सा ऐसा घर का मालिक है जो घर के दीवारों और खिड़कियों पर पर्दा लगाना न चाहता हो?? कौन सा ऐसा शख़्स है जो पर्दे को ख़ूबसूरती का ज़रिया न समझता हो? पर्दा केवल औरत की ज़िंदगी ही में नहीं बल्कि मर्दों के साथ भी है वरना सारे मर्द सड़क पर नंगे दिखाई देते और समाज एक न्यूड पार्क बन कर रह जाता।
दुनिया में पर्दे का जो जितना बड़ा विरोधी है उसके घर उतना ही ज़्यादा पर्दा दिखाई देता है, हद यह है कि राज़ भी पर्दे में रहते हैं और हिसाब किताब भी, यह दुनिया जो आज बाक़ी है उसका कारण यही पर्दादारी है, वरना अगर पैदा करने वाला ही पर्दे का विरोधी हो जाता तो  हर किसी के राज़ हर किसी की बुराई, किस के दिल में दूसरे के लिए क्या है इन सारी चीज़ों को ज़ाहिर और बेनक़ाब कर देता तो समाज एक दिन भी ज़िंदा नहीं बचता और कोई भी शख़्स किसी दूसरे का चेहरा देखने को तैयार न होता, यह अल्लाह की पर्देदारी है कि कोई किसी के दिल के हालात को नहीं जानता और समाज सुकून के साथ चल रहा है।
इस्लाम ने इन्हीं हालात और फ़ितरी ज़रूरत को देख कर पर्दे का हुक्म दिया तो उसकी सीमाएं भी बता दी ताकि किसी के दिल में किसी तरह की शंका न रह जाए और जिस्म के जो हिस्से खुल जाएं तो उनसे किसी तरह का अख़लाक़ी फ़साद न होने पाए।
इस्लाम ने पर्दे की सीमाएं बताने में इंसानी ज़रूरत को भी ध्यान में रखा है और बेपर्दगी के ख़तरों को भी ध्यान में रखा है,  उसने पर्दे में दो बातों का ख़ास ध्यान रखा है...
1- पर्दे से आज़ादी केवल ज़रूरत के समय दी जाए जैसाकि उसने साफ़ साफ़ कह दिया कि औरत को अपना चेहरा और कलाई तक दोनों हाथ खोलने का अधिकार है क्योंकि उसके बिना वह ज़िंदगी का कोई काम नहीं कर सकती, लेकिन उसकी शर्त यह है कि उसके हाथ या चेहरे पर किसी तरह का कोई मेकअप न हो क्योंकि मेकअप ज़िंदगी की ज़रूरत में शामिल नहीं है, क्योंकि मर्द इसी चेहरे और हाथ द्वारा बिना मेकअप के सारे काम करता है कि नहीं? तो फिर औरत को कारोबार या और दुनियावी दूसरे कामों में मेकअप को क्यों शामिल किया जाए, मेकअप औरतों के काम की रफ़्तार बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि मर्दों के काम की रफ़्तार कम करने का कारण है जिसका दुनिया के सारे आज़ाद समाज में तजुर्बा किया जा चुका है।
2- पर्दे को अनदेखा करते समय औरत को समाज के हालात पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए ताकि कहीं ऐसा न हो कि समाज हवस का शिकार हो जाए और बेपर्दगी औरत के लिए तबाही का कारण बन जाए बल्कि पूरे समाज के अमन और शांति के लिए ख़तरा बन जाए जिसका तजुर्बा यूरोप और अमेरिका के समाज में किया जा चुका है और कभी कभी मुसलमान देशों के अख़बारों में ऐसी ख़बरें छप जाती हैं कि समुद्र के किनारे औरत को कम कपड़ों में देख कर मर्द अपने जज़्बात पर क़ाबू नहीं कर सका और औरत को अपनी हवस का शिकार बना लिया और फिर अदालत में साफ़ साफ़ कह दिया कि क़ुसूर मेरा नहीं है बल्कि इन कम कपड़ों का है वरना मेरी जगह जज साहब भी होते तो और उनमें जवानी का जोश होता तो वह भी यही कर बैठते।
बेपर्दगी फ़ितरी अमल नहीं है लेकिन बेपर्दा औरत को देख कर दिल में गंदे ख़्याल का आना फ़ितरी अमल है जिसकी तरफ़ हर अक़्लमंद इंसान का ध्यान रहना ज़रूरी है।
पर्दे के बारे में एक ग़लत विचार यह भी फैलाया जाता है कि पर्दे में रहने वाली औरत दुनिया का कारोबार, नौकरी और दूसरे बहुत से दुनियावी काम नहीं कर सकती वह एक क़ैदी बन कर रह जाती है....
पहली बात तो यह कि यह बात इस्लामी पर्दे से हट कर है, दूसरी बात यह कि इस्लामी इतिहास की शुरुआत ही एक पर्देदार औरत के व्यापार और कारोबार से हुई, इसलिए इस्लाम कैसे इस बात को स्वीकार कर सकता है कि पर्दे में रह कर औरत कारोबार नहीं कर सकती है.....
औरत अपने सम्मान और अपनी मर्यादा को बचा कर कोई भी जायज़ कारोबार कर सकती है इस्लाम कभी उसके रास्ते की रुकावट नहीं बनता, हां यह और बात है कि इस्लाम इस बात की अनुमति नहीं देता कि माल के कारोबार को वसीला बना कर इज़्ज़त, मान सम्मान और मर्यादा का कारोबार शुरू कर दिया जाए, जैसाकि आजकल कुछ देशों में देखा जा रहा है कि रूस से आज़ाद होने वाले देशों की औरतें व्यापार को बहाना बना कर इस्लामी देशों में सामान लेकर आ जाती हैं और उसके बाद खुलेआम अपने जिस्म का व्यापार शुरू कर देती हैं और ऐसा केवल बेपर्दगी के कारण हो रहा है वरना अगर इस्लामी पर्दे के अनुसार आगे बढ़ती तो ऐसे हालात सामने न आते।
समाज में तो पर्दे की बात अलग है वह तो हर सही अक़्ल रखने वाला स्वीकार करता है इस्लाम ने तो उस समय भी पर्दे का ख़्याल रखा है जब औरत अकेले में बंद कमरे में अपने अल्लाह की बारगाह में खड़ी होती है और नमाज़ अदा करना चाहती है, इस्लाम की तालीम यह है कि उस समय में भी पूरे पर्दे के साथ आओ जिस्म का कोई भी ग़ैर ज़रूरी अंग खुला न हो ताकि औरत को एहसास हो कि पर्दा केवल ख़तरों से बचने के लिए नहीं बल्कि इज़्ज़त, सम्मान और मर्यादा को बढ़ाने का भी ज़रिया है, अल्लाह इसी पर्दे द्वारा उसे अज़मत देना चाहता है पर्दे को उसके पैरों की ज़ंजीरें नहीं बनाना चाहता।
अगर इस्लाम तन्हाई और अकेले में अल्लाह के सामने हाज़िर होने के समय औरत को पर्दे में देखना चाहता है तो फिर वह कैसे इस बात पर राज़ी होगा और किस तरह इस बात को पसंद करेगा कि औरत मस्जिद, इमामबड़े और मजलिसों में बिना पर्दे के जाए और अपनी अज़मत और मर्यादा को बर्बाद कर दे।
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