Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 194754
Date of publication : 31/7/2018 15:34
Hit : 273

इस्लाम और ग़ुलामी

अगर कोई शख़्स अपने ग़ुलाम का एक हिस्सा भी आज़ाद कर दे तो पूरा ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा और अगर ग़ुलाम दो लोगों का है और अगर एक ने आज़ाद कर दिया है तो पूरा ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा लेकिन उसे दूसरे मालिक के हिस्से की क़ीमत अदा करनी होगी। इस्लाम के इन्हीं अहकाम का नतीजा था जिसको देखते देखते ग़ुलामी कब ख़त्म हो गई किसी को पता तक नहीं चला और समाज पर कोई बोझ भी नहीं पड़ा।
विलायत पोर्टल :  ग़ुलामी के बारे में इस्लाम के विचार जानने से पहले ग़ुलामी के इतिहास पर ध्यान देने की ज़रूरत है जिससे अच्छी तरह यह अंदाज़ा हो जाएगा कि ग़ुलामी की जड़ें इंसानियत के इतिहास में बहुत दूर तक फैली हुई हैं और कोई दौर और कोई तारीख़ ऐसी नहीं रही है जिसमें इंसानों ने ताक़त और दौलत के ज़ोर पर इंसानों को ग़ुलाम न बनाया हो।
ग़ुलामी का एक पहलू इंसानी फ़ितरत से क़रीब है कि कोई इंसान अपने सारे काम ख़ुद अंजाम नहीं दे सकता है और हर इंसान मजबूर है कि दूसरे का सहारा ले, अब अगर इंसान शरीफ़ होता है तो जिससे काम लेता है उसे अपना मोहसिन समझता है और अपने से ज़्यादा अहमियत देता है और अगर शातिर और चालाक होता है तो अपने को ऊंचा और ज़्यादा अहमियत वाला समझते हुए उसे नौकर और मज़दूर का दर्जा देता है, यही इंसान की फ़ितरत जब मसलेहत परस्ती का रूप ले लेती है तो ग़ुलामी का तसव्वुर सामने आता है और इंसान दूसरे को अपना मोहसिन समझने के बजाए मज़दूर और नौकर समझने के लिए तैयार नहीं होता है क्योंकि मज़दूर समझने पर उसकी मज़दूरी देनी पड़ेगी बल्कि अपने आप को ऐसा मालिक समझने लगता है कि हर इंसान को अपनी नौकरी और मज़दूरी करते हुए देखना चाहता है और दूसरे सभी को नौकर और मज़दूर देखना चाहता है।
ग़ुलामी की परवरिश इसी माहौल में हुई है कि शातिर और चालाक लोगों ने ताक़त और दौलत के बल पर अपने को मालिक बना लिया है और दूसरों को कमज़ोर और ग़ुलाम का दर्जा दे दिया है जहां इंसान को बेक़ीमत बन कर काम करना है और उसका ज़िंदगी में किसी तरह का कोई हक़ नहीं हैl इंसान ने जब अमल के मैदान में क़दम रखा तो इस हालत का सख़्ती से मुक़ाबला किया, हज़रत इब्राहीम ने इंसानियत को नमरूद की बर्बरता से छुटकारा दिलाया, हज़रत मूसा ने फ़िरौन की ग़ुलामी से निजात दिलाई, हज़रत ईसा ने अपने दौर के हरमख़ोर यहूदियों का जम कर मुक़ाबला किया और पैग़म्बर स.अ. ने अपने दौर के ज़ालिमों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, जाहिलिय्यत का दौर इस हद तक ज़लील था कि अल्लाह की कोई क़द्र नहीं थी और शातिर बंदे शाम को अपने ख़ुदा (हलवा) को खा जाते थे तो सोचिए कमज़ोर इंसानों की क्या हालत होगी।
आपने शुरू में मज़दूरी देने जैसे मामलात पर ज़ोर दिया ताकि कमज़ोर इंसान को अपनी क़द्र और क़ीमत एहसास पैदा हो और ताक़तवर अपने को मालिक समझना छोड़ दे, आपको मालूम था कि ग़ुलामी की छांव में परवरिश पाने वाला समाज ग़ुलामी की ज़ंजीर से आज़ाद नहीं हो सकता है और ग़ुलामी का मामला शराब पीने जैसा निजी मामला नहीं है कि उसे हराम क़रार दे दिया जाए, ग़ुलामी की जड़ें ज़िंदगी की हर दिशा में फैली हुई हैं इसलिए उसे हराम करने से पहले मज़दूरी देने के सिस्टम को लागू करना पड़ेगा ताकि सेवा का जज़्बा बाक़ी रहे और समाज में लोग एक दूसरे का सहारा बनते रहेंl केवल एक मामला रह जाएगा कि काम करने वालों की हैसियत क्या होगी, इस्लाम ने उसे ग़ुलाम से मज़दूर की शक्ल में बदल दिया ताकि इंसानी शराफ़त का एहसास भी बेदार रहे और ताक़तवर इंसान मुफ़्त खाने की लानत से भी निजात हासिल कर सकेl इसके बाद इस्लाम ने ग़ुलामी के मामले पर ध्यान दिया और उसको ख़त्म करने के लिए दो रास्ते अपनाए।
1- ग़ुलामी ईजाद करने के सभी रास्तों को बंद कर दिया जाए और इस मामले को केवल जंग के मैदान तक सीमित रखा जाए कि जंग के मैदान में आने वाले इंसानियत के दुश्मन अगर अपने साथ औरतों और बच्चों को भी ले आए हैं तो जंग के बाद औरतों को असीर कर के कनीज़ बना लिया जाएगा और बच्चों को ग़ुलाम बना लिया जाएगा।
हक़ीक़त में यह ग़ुलाम बनाने का अमल नहीं है बल्कि हक़ और हक़ीक़त के विरुद्ध जंग छेड़ने का जवाब है जिसे किसी क़ीमत पर अदालत और इंसाफ़ के ख़िलाफ़ नहीं कहा जा सकता है, हक़ीक़त के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने वालों को हर हाल में सज़ा मिलनी चाहिए, अगर वह बालिग़ हैं और मर्द हैं और हक़ के विरुद्ध जंग में शामिल हैं तो उनकी सज़ा मौत है, लेकिन अगर ना बालिग़ हैं या औरतें और जंग में हिस्सा नहीं लिया है तो उनको मारना इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है लेकिन सज़ा बहेर हाल ज़रूरी है ताकि जंग छेड़ने वालों को यह एहसास पैदा हो कि जंग का असर केवल सिपाहियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि आने वाली नस्लों तक पहुंचता है और उसका नतीजा बाद तक रहता है।
यह और बात है कि इस्लाम ने औरतों और बच्चों की कमज़ोरी को देखते हुए उनके साथ अच्छे सुलूक को वाजिब क़रार दिया है और किसी तरह के बुरे सुलूक को जायज़ नहीं क़रार दिया है।
2- आज़ादी के कई रास्ते खोल दिए:
** अगर किसी इंसान ने फ़ी सबीलिल्लाह सवाब के लिए ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया तो वह आज़ाद हो जाएगा।
** अगर कोई शख़्स उसी समय आज़ाद करने के बजाए ग़ुलाम से यह कह दे कि तू मेरे मरने के बाद आज़ाद है तो मालिक के मरते ही ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा और उसके वारिसों को दख़ल देने का हक़ नहीं है।
** अगर कोई शख़्स अपने ग़ुलाम से मामला कर ले कि अगर इतनी रक़म कमा कर दे तो आज़ाद हो जाएगा तो जैसे ही ग़ुलाम रक़म अदा कर देगा तो वह आज़ाद हो जाएगा।
** अगर कोई शख़्स अपने ग़ुलाम का एक हिस्सा भी आज़ाद कर दे तो पूरा ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा और अगर ग़ुलाम दो लोगों का है और अगर एक ने आज़ाद कर दिया है तो पूरा ग़ुलाम आज़ाद हो जाएगा लेकिन उसे दूसरे मालिक के हिस्से की क़ीमत अदा करनी होगी।
इस्लाम के इन्हीं अहकाम का नतीजा था जिसको देखते देखते ग़ुलामी कब ख़त्म हो गई किसी को पता तक नहीं चला और समाज पर कोई बोझ भी नहीं पड़ा।  .....................


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :

नवीनतम लेख

पैग़म्बर स.अ. की सीरत और इमाम ख़ुमैनी र.अ. की विचारधारा शिम्र मर गया तो क्या हुआ, नस्लें तो आज भी बाक़ी है!! इमाम ख़ुमैनी र.ह. और इस्लामी इंक़ेलाब की लोकतांत्रिक जड़ें हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. के घर में आग लगाने वाले कौन थे? अहले सुन्नत की किताबों से एक बेटी ऐसी भी.... फ़र्ज़ी यूनिवर्सिटी स्थापित कर भारतीय छात्रों को गुमराह कर रही है अमेरिकी सरकार । वह एक मां थी... क़ुर्आन को ज़हर बता मस्जिदें बंद कराने का दम भरने वाले डच नेता ने अपनाया इस्लाम । तुर्की के सहयोग से इदलिब पहुँच रहे हैं हज़ारो आतंकी । आयतुल्लाह सीस्तानी की दो टूक , इराक की धरती को किसी भी देश के खिलाफ प्रयोग नहीं होने देंगे । ईरान विरोधी किसी भी सिस्टम का हिस्सा नहीं बनेंगे : इराक सीरिया की शांति और स्थायित्व ईरान का अहम् उद्देश्य, दमिश्क़ और तेहरान के संबंधों में और मज़बूती के इच्छुक : रूहानी आयतुल्लाह सीस्तानी से मुलाक़ात के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत नजफ़ पहुंची इस्लामी इंक़ेलाब की सुरक्षा ज़रूरी , आंतरिक और बाह्र्री दुश्मन कर रहे हैं षड्यंत्र : आयतुल्लाह जन्नती आख़ेरत में अंधेपन का क्या मतलब है....