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Date of publication : 30/7/2018 16:52
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मासूमीन (अ.स.) का इस्तेग़फ़ार

इस्तेग़फ़ार एक तरह की सिफ़ारिश भी है जैसाकि इरशाद होता है कि अगर यह लोग इस्तेग़फ़ार करते और रसूल (स. अ.) भी उनके लिए इस्तेग़फ़ार करते तो यह अल्लाह को तौबा क़ुबूल करने वाला और मेहरबान पाते, इस आयत में पैग़म्बर स.अ. का इस्तेग़फ़ार किसी गुनाह का नतीजा नहीं बल्कि एक तरह की शफ़ाअत है।

विलायत पोर्टल : पैग़म्बर स.अ. और इमामों अ.स. की ज़िंदगी में इस्तेग़फ़ार का ज़िक्र देख कर बहुत से लोगों के दिलों में यह विचार पैदा होता है कि यह लोग मासूम नहीं थे वरना इस्मत के बाद इस्तेग़फ़ार का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता, इन बेचारों का ख़्याल यह है कि इस्तेग़फ़ार केवल गुनाहों को माफ़ कराने के लिए होता है और इंसान की ज़िंदगी में गुनाह न हों तो उसे अस्तग़फ़िरुल्लाहा रब्बी व अतूबो इलैह कहने की क्या ज़रूरत है, ज़्यादातर ऐसे लोगों ने क़ुर्आन को ठीक तरह से नहीं पढ़ा है वरना ऐसे विचार रखने वालों को अंदाज़ा होता कि अल्लाह के नज़दीक तौबा और इस्तेग़फ़ार की क्या हैसियत है और उसे मालिक ने क्या दर्जा दिया है।  इस्तेग़फ़ार से इंसान के मर्तबे को बुलंदी हासिल होती है जैसाकि इरशाद होता है कि सारे लोगों के साथ मुज़दलेफ़ा से मेना की ओर जाओ और अल्लाह से इस्तेग़फ़ार करो ज़ाहिर है अरफ़ात और मुज़दलेफ़ा में रुकना कोई जुर्म नहीं था कि उसके लिए इस्तेग़फ़ार ज़रूरी होता।
इस्तेग़फ़ार करना अल्लाह का शुक्र अदा करना है जैसाकि इरशाद होता है कि अल्लाह ने तुम्हें ज़मीन से पैदा कर के ज़मीन में आबाद कर दिया है इसलिए उसकी बारगाह में इस्तेग़फ़ार करो।
इस्तेग़फ़ार एक तरह की सिफ़ारिश है जैसाकि इरशाद होता है कि अगर यह लोग इस्तेग़फ़ार करते और रसूल (स. अ.) भी उनके लिए इस्तेग़फ़ार करते तो यह अल्लाह को तौबा क़ुबूल करने वाला और मेहरबान पाते, इस आयत में पैग़म्बर स.अ. का इस्तेग़फ़ार किसी गुनाह का नतीजा नहीं बल्कि एक तरह की शफ़ाअत है। इस्तेग़फ़ार से बरकतें नाज़िल होती हैं जैसाकि इरशाद होता है कि मैंने क़ौम से कहा कि अपने अल्लाह से इस्तेग़फ़ार करो वह बहुत बख़्शने वाला है, आसमान से मूसलाधार बारिश करेगा माल और औलाद से तुम्हारी मदद करेगा, तुम्हारे लिए बाग़ और नहरें क़रार देगा।
अगर इंसान इन सभी नेमतों और बरकतों से फ़ायदा उठाना चाहता है तो उनका इकलौता रास्ता इस्तेग़फ़ार है, इस्तेग़फ़ार के लिए गुनाहों की माफ़ी का ध्यान में रखना शर्त नहीं है।
इस्तेग़फ़ार ईमान की बुलंदी का नाम है जैसाकि इरशाद होता है कि जन्नत वालों की पहचान यह है कि वह सब्र करने वाले, सच बोलने वाले, दुआ करने वाले और सहर के समय इस्तेग़फ़ार करने वाले हैं।
तौबा इंसान की महबूबियत को बढ़ाती है जैसाकि इरशाद होता है कि अल्लाह तौबा करने वालों को पसंद करता है।
तौबा और इस्तेग़फ़ार का असली फ़लसफ़ा यह है कि यह दोनों जज़्बे इंसान की ज़िल्लत और अल्लाह की अज़मत के एहसास से पैदा होते हैं, अपने घर में किसी महान हस्ती को दावत पर बुलाने वाला उसके सामने सारी दुनिया के खाने भी लाकर रख दे फिर भी मेहमान से माफ़ी मांगता दिखाई देता है कि वह उसकी हैसियत के मुताबिक़ इंतेज़ाम नहीं कर सका, अल्लाह के ख़ास बंदों का इस्तेग़फ़ार इसी जज़्बे के तहत होता है क्योंकि उन्हें अल्लाह की अज़मत का एहसास होता है और वह जानते हैं कि अपनी हैसियत से कितना ही ज़्यादा बुलंद और अज़ीम अमल क्यों न अंजाम दे लें लेकिन वह अल्लाह की अज़मत के आगे कुछ भी नहीं है इसीलिए तौबा और माफ़ी तलब करना ज़रूरी है इससे कम से कम यह बात तो ज़ाहिर ही हो जाती है कि इंसान अना और घमंड का शिकार नहीं होता बल्कि हर समय अल्लाह की अज़मत का एहसास दिल में रहता है।
अल्लाह के मासूम बंदों का भी यही तरीक़ा था अल्लाह की बारगाह में उसकी अज़मत को स्वीकार करते हुए अपनी कमियों को माना जाए ताकि ज़्यादा से ज़्यादा उसकी मेहरबानी के हक़दार हो सकें, अल्लाह अपने बंदों से बेपनाह मोहब्बत करने वाला है वह जानता है कि मेरी अज़मत के मुताबिक़ न किसी का अमल है न मेहनत, लेकिन उसके बावजूद जब बंदा इस्तेग़फ़ार करने लगता है तो वह आवाज़ देता है कि ताहा हमने क़ुर्आन को आपको सख़्ती और परेशानी में डालने के लिए नहीं नाज़िल किया है, मुज़म्मिल ज़रा रातों में आराम कर लिया करो, ऐ अहलेबैत (अ.स.) हमने आपकी कोशिशों को मशकूर क़रार दिया है ताकि दुनिया महसूस कर ले कि अगर बंदा बेगुनाह और बिना ग़लती के अपने को क़ुसूरवार समझता है तो हम भी इस जज़्बे को सराहते हुए उसका सिला देंगे।
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