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Date of publication : 29/7/2018 10:57
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हज का फ़लसफ़ा

यह लब्बैक इस बात की भी निशानी है कि हालांकि हम हज़रत इब्राहीम की उम्मत में से नहीं हैं लेकिन चूंकि उन्होंने अल्लाह की ओर दावत दी है और बुलाया है और अल्लाह के हुक्म से बुलाया है इसलिए हम उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहने के लिए तैयार हैं, हमारी निगाह में अल्लाह के नबी का सम्मान हमेशा रहता है चाहे वह इस दुनिया में ज़िंदा हो या अल्लाह की बारगाह में वापस जा चुका हो हम उन लोगों में से नहीं हैं जिनका नबी उनके सामने उन्हें आवाज़ दे रहा था और वह मुड़ कर देखने को तैयार नहीं थे।

विलायत पोर्टल :  हज बुनियादी तौर पर दो हिस्सों से मिल कर पूरा होता है, एक को उमरा कहा जाता है और एक को हज। दोनों के कुल अरकान लगभग 24 हैं लेकिन कुछ अरकान दोनों में एक जैसे हैं और कुछ किसी एक से विशेष हैं, जैसे एहराम, काबे का तवाफ़, नमाज़े तवाफ़, सफ़ा और मरवा के बीच सई दोनों में है इसी तरह तक़सीर (बालों का काटना) भी वह अमल है जिसका उमरा में होना ज़रूरी है और हज में भी हो सकता है (जिसका दूसरा या तीसरा हज हो)
उमरा में कोई अमल ऐसा नहीं है जो हज में न पाया जाता हो और हज में बहुत से आमाल ऐसे हैं जो उमरा में नहीं होते जिसका साफ़ मतलब यह है कि उमरा हक़ीक़त में हज के लिए ख़ुद को तैयार करने के लिए है जिससे मुसलमान के दिमाग़ को आने वाले दिनों के आमाल के लिए तैयार किया जाता है या उन आमाल द्वारा उन पाक जगहों और अरकान की अहमियत का एहसास दिलाया जाता है जिनसे हज का गहरा संबंध है और जिनके बिना हज अधूरा है।
1- हज का पहला फ़लसफ़ा यह है कि यह एक विश्व स्तर पर जमा होने वाला मजमा है जिसमें पूरी दुनिया से तौहीद के मानने वाले जमा होते हैं, न कोई किसी देश का दूत बन कर आता है न किसी पार्टी का नेता, न किसी का राजनीतिक दख़ल होता है और न किसी तरह के भेदभाव का।
हर इंसान केवल अपने ईमान और इस्लाम की वजह से पहचाना जाता है और उसका मक़सद अल्लाह की इबादत के साये में विश्व के विभिन्न मामलों पर चर्चा करके उनका हल निकालना और वहां से वापस आ कर अपने क्षेत्र में वहां से निकले हुए हल को लागू करना होता है।
2- हज का दूसरा फ़लसफ़ा यह है कि उसे इस्लामी और ईमानी फ़रीज़े के बजाए इंसानी फ़रीज़ा क़रार दिया गया है क्योंकि अल्लाह ने हज के लिए सारे इंसानों को दावत दी है, यानी हज करना इंसानियत की दलील है और उससे मुंह मोड़ना इंसानी वैल्यूज़ से मुंह मोड़ना है क्योंकि हज के फ़ायदे केवल ईमानी दुनिया तक सीमित नहीं बल्कि उसका फ़ायदा और उसका पैग़ाम सारी इंसानियत के लिए है।
3- हज का तीसरा फ़लसफ़ा यह है कि यह लब्बैक से शुरू होता है और रमि-ए-जमरात (शैतान को कंकर मारना) पर ख़त्म होता है, लब्बैक हज़रत इब्राहीम और उनके अल्लाह की मोहब्बत की पहचान है कि इंसान ने हज़रत इब्राहीम की दावत को स्वीकार करते हुए अपना घर परिवार छोड़ दिया है और शैतान को कंकर मार कर शैतान से दूरी की पहचान है यानी इंसान जब तक अल्लाह के औलिया से मोहब्बत और दोस्ती और अल्लाह के दुश्मनों से दूरी का एलान न करे तब तक उसका अमल हज कहे जाने के क़ाबिल नहीं है।
4- यह लब्बैक इस बात की भी निशानी है कि हालांकि हम हज़रत इब्राहीम की उम्मत में से नहीं हैं लेकिन चूंकि उन्होंने अल्लाह की ओर दावत दी है और बुलाया है और अल्लाह के हुक्म से बुलाया है इसलिए हम उनकी आवाज़ पर लब्बैक कहने के लिए तैयार हैं, हमारी निगाह में अल्लाह के नबी का सम्मान हमेशा रहता है चाहे वह इस दुनिया में ज़िंदा हो या अल्लाह की बारगाह में वापस जा चुका हो हम उन लोगों में से नहीं हैं जिनका नबी उनके सामने उन्हें आवाज़ दे रहा था और वह मुड़ कर देखने को तैयार नहीं थे।
5- हज का लिबास (एहराम) इंसान के जीवन में सादगी की निशानी है और यह लिबास इंसान के ध्यान को इस बात की ओर ले जाता है कि अगर अल्लाह लाखों के मजमे में इंसान को एक लुंगी चादर में खड़ा करना चाहता है तो इंसान को अपनी दौलत, शोहरत और दुनियावी हैसियत को नहीं याद करना चाहिए और अल्लाह के हुक्म से इसी शान से खड़े होना चाहिए जिस तरह उसने हुक्म दिया है, यही बंदगी है और इसी का नाम हज है।
6- एहराम पहनने के बाद जिन चीज़ों को हराम किया गया है उनसे दूरी इस बात की निशानी है कि इंसान ने अल्लाह के हुक्म पर अमल कर के नफ़्स को पाक कर लिया है कि अब उसे किसी चीज़ की परवाह नहीं है, वह ख़ुशबू पर नाक भी बंद कर सकता है और बदबू को बर्दाश्त भी कर सकता है, वह इंसान तो इंसान जानवरों को भी नहीं परेशान कर सकता, दूसरे के बाग़ तो बाग़ एक घास को भी नुक़सान नहीं पहुंचा सकता, वह हर तरह की ज़ीनत से दूर है और हर तरह की मुसीबत के लिए तैयार है, और यह हज की मेराज है कि इंसान अल्लाह के हुक्म को ध्यान में रखते हुए हर तरह की दुनियावी मामलात से ख़ुद को दूर कर ले और अल्लाह की मर्ज़ी के अलावा उसके सामने किसी चीज़ की कोई अहमियत न रह जाए।
7- अल्लाह के घर का तवाफ़ ज़िंदगी के मरकज़ और सेंटर की ओर इशारा है कि मुसलमान की ज़िंदगी इसी घर और उसके मालिक के इशारों पर घूम रही है और उसकी ज़िंदगी का कोई दूसरा मरकज़ और सेंटर नहीं है, वह इस घर के चक्कर से दुनिया के हर चक्कर से ख़ुद को बचा लेता है और फिर अल्लाह की बारगाह में सजदा कर के दुनिया की हर बुलंदी और कामयाबी हासिल कर लेता है।
8- हजरे असवद को चूमना इस बात की ओर इशारा है कि जन्नत की चीज़ें सम्मान के लायक़ होती हैं उनका सम्मान किया जाना चाहिए चाहे वह पत्थर की शक्ल में हों या इंसान की।
9- मक़ामे इब्राहीम हज़रत इब्राहीम की ज़हमतों की यादगार है कि उन्होंने किस तरह अल्लाह के घर की दीवारों को बनाया और इस इमारत को मुकम्मल किया है, उसे अल्लाह की इबादत की जगह क़रार दिया गया है कि मुसलमान की निगाहों के सामने वह ख़ुलूस का मरकज़ रहे जो आज तक आवाज़ दे रहा है अल्लाह की राह में काम करने वाले दुनिया की चीज़ों के मोहताज नहीं होते हैं और जब वह कोई समाजी काम करते हैं तो अल्लाह उसके असर को हमेशा बाक़ी रखता है।
10- सफ़ा और मरवा के बीच सई हज़रत हाजरा की यादगार भी है और औरत मर्द के भेदभाव को ख़त्म करने की निशानी भी, जो भी अल्लाह की राह में कोई काम अंजाम देता है अल्लाह उसके अमल को बाक़ी रखता है चाहे वह मर्द हो या औरत।
11- अरफ़ात और मुज़दलेफ़ा के मैदानों में जमा होना अल्लाह की राह में अपने वतन और आबादी को छोड़ देने के जज़्बे को दर्शाता है, और मुज़दलेफ़ा से कंकर को जमा करना इस बात की ओर इशारा है कि मुसलमान जहां रहे जिस हाल में रहे दुश्मन से कभी ग़ाफ़िल न रहे और उससे मुक़ाबले के लिए हमेशा हर तरह से तैयार रहे।
12- क़ुर्बानी इंसान की ज़िंदगी में वह जज़्बा पैदा करती है जिससे इंसान अल्लाह की राह में अपने सर के ख़ूबसूरत बाल भी काट सकता है और अपना क़ीमती जानवर भी, अल्लाह के हुक्म के सामने किसी भी चीज़ की कोई हैसियत नहीं।
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