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Date of publication : 26/7/2018 13:20
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देश मे बढ़ती असहिष्णुता

जैसे जैसे चुनाव क़रीब आ रहा है वैसे वैसे और अधिक धार्मिक नफ़रत का ज़हर घोला जा रहा है, एक तरफ़ सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी केवल काग़ज़ी कार्यवाही में लगी है जबकि भय और आतंक का माहौल लगातार बढ़ता ही जा रहा है, वह दिन दूर नहीं जब आपसी एकता और अखंडता की मिसाल दिए जाने वाले देश की पहचान भीड़तंत्र और मॉबलिंचिंग से की जाएगी।

विलायत पोर्टल :  जब पानी का लेवेल बढ़ता है तो शुरू में लोग उस पर ध्यान नहीं देते और यह बढ़ता चला जाता है, जब लेवेल काफ़ी बढ़ जाता है तब आप नोटिस करते हैं उस पर ध्यान देते हैं और आज यही हो रहा है,
यह शब्द भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जी के हैं और आपका यह बयान आपकी नई किताब DARE I QUESTION? के अनावरण से पहले भारत में बढ़ते जातिवाद के बारे में दिया था।
आज अगर देखा जाए तो पानी का लेवेल केवल ऊपर ही नहीं हुआ बल्कि हर ज़िंदा ज़मीर और आज़ाद फ़िक्र वाला इंसान एक भयानक तूफ़ान को अपनी तरफ़ तेज़ी से बढ़ता देख रहा है, हैवानियत और दरिंदगी का तूफ़ान, बर्बरता का तूफ़ान, हत्या का तूफ़ान, जातिवाद का तूफ़ान, मज़हबी पागलपन का तूफ़ान, भारत से मुरव्वत का ख़त्‍म होना और भीड़तंत्र और मॉबलिंचिंग का बोलबाला ख़ुद बढ़ते हुए तूफ़ान की ओर इशारा है कि अगर जल्द ही उसे रोका नहीं गया तो हज़ारों साल पुराना हमारा कल्चर और तहज़ीब इस तूफ़ान की भेंट चढ़ जाएगा।
भारत में जिस तरह कहीं गौमांस को बहाना बना कर बे गुनाहों की हत्या हो रही है तो कहीं बच्चा चोरी का आरोप लगा कर भीड़ द्वारा लोगों की जान जा रही है उसके पीछे साफ़ तौर पर कुछ भगवा तत्व दिखाई देते हैं जो न केवल मॉबलिंचिंग और भीड़तंत्र का विरोध और आलोचना नहीं करते बल्कि कहीं उन्हीं मॉबलिंचिंग और भीड़ की आड़ लेकर हत्या करने वालों के गलों में मालाएं भी पहनाते हैं तो कहीं उनके समर्थन में बयान देते नज़र आते हैं जिसकी वजह से यह कट्टरपंथी गुट इधर उधर मुंह उठाए घूम रहे हैं और कोई उन्हें पूछने वाला नहीं है, हालांकि सत्ता में विराजमान कुछ गंवार नेताओं के इशारों पर ही उनका पगालपन और कट्टरता इतनी बढ़ गई है कि जहां दिल चाहता है वहां घुस कर मारपीट करते हैं जिसकी चाहते हैं हत्या कर देते हैं और कह देते हैं कि भीड़ पर नियंत्रण से बाहर हो गई थी हम क्या कर सकते हैं...?!
जबकि बिल्कुल साफ़ है कि लाठी और डंडों के साथ कोई भीड़ पल भर में जमा नहीं हो जाती उसके लिए तैयारी की ज़रूरत होती है, भड़काऊ भाषण दिए जाते हैं, नफ़रत के बीज बोए जाते हैं, लोगों को उकसाया जाता है, अपने घटिया कामों को धर्म का नाम दिया जाता है तब जाकर यह मज़हबी दीवाने क़ानून हाथ में लेते हैं और किसी की हत्या होती है किसी पर भीड़ हमला करती है कोई मॉबलिंचिंग का शिकार होता है।
जहां धर्म की आड़ में हमले और हत्या पर उतावली भीड़ की एक पूरी चेन दिखाई देती है, एक के बाद एक कांड पढ़ने और सुनने में आते हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अगर देखा जाए तो साफ़ तौर पर उसका फ़ैसला है कि "किसी भी भीड़ को मनमानी की अनुमति नहीं दी जा सकती" यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क़ानून बनाने तक की बात कही है, कोर्ट का आदेश बिल्कुल साफ़ है कि शहर में शांति बाक़ी रखने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों की है और किसी को भी क़ानून हाथ में लेने की अनुमति नहीं है, भय फैलाने और क़ानून को पैरों के नीचे रौंदने और कट्टरता का माहौल फैलाने वालों के विरुद्ध राज्य सरकारों को ठोस क़दम उठाते हुए ऐक्शन लेना चाहिए, कोर्ट के इस आदेश के बाद भी हालात इतने ख़तरनाक हैं कि रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले सालों में गौ रक्षा और बच्चा चोरी के आरोप में भीड़ ने कई लोगों के साथ हाथापाई करके उन्हें मार डाला।
सूत्रों के अनुसार 2012 से 2018 के बीच केवल गौ रक्षा के नाम पर 85 लोगों को निशाना बनाया गया जिनमें 33 लोगों की भीड़ ने हमला कर के हत्या कर दी, यह तादाद क्या किसी बड़े तूफ़ान की ओर इशारा नहीं है जो लगातार समाज की एकता को भंग कर के समाज को खोखला करता कर रहा है?!
और अजीब बात तो यह है कि अब गाय के बाद बच्चा चोरी भी उसी रास्ते पर है कि बच्चा चोरी के बहाने बे का़बू भीड़ जिसे चाहती है मौत के घाट उतार देती है, कितना दर्दनाक हादसा पिछले हफ़्ते पेश आया जब कर्नाटक में बच्चा चोरी के झूठे आरोप में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पीट पीट कर हत्या कर दी गई, क्या यह ध्यान देने वाली बात नहीं कि पहले तो गौ के नाम पर मुसलमानों और दलितों को निशाना बनाया गया और अब बच्चा चोरी की अफ़वाह फैला कर पीट पीट कर हत्या करने का नया सिलसिला शुरू हो गया है।
केवल महाराष्ट्र में पिछले दो महीनों में फैली अफ़वाह के कारण भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या कर देने की 14 वारदातों में से 10 लोगों ने जान गंवाई और तो और अब मुर्ग़ी चोरी के आरोप में भी हत्या का मामला शुरू हो गया है जैसाकि किसी जगह जब यह ख़बर पढ़ी तो बहुत हैरानी हुई कि केरल में एक मज़दूर को मुर्ग़ी चुराने के आरोप में भीड़ ने इतना मारा कि वह अस्पताल पहुंच कर भी अपने गंभीर ज़ख्मों के कारण मर गया और यह सारी घटनाएं लगातार हो रही हैं और इनसे निपटने में सरकार विफ़ल है।
हिंदु धर्मगुरु और सोशल ऐक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेश पर भी कुछ कट्टरपंथियों ने हमला किया और उन्हें बुरी तरह पीटा, एक 80 साल के बूढ़े इंसान को जिसे दुनिया भर में शांति और ख़ुशहाली लाने और उच्च विचारों के लिए जाना जाता है, जो हिन्दुओं के लोकप्रिय मज़हबी रहनुमा होने के साथ साथ एक सोशल ऐक्टिविस्ट भी हैं, कितने अफ़सोस की बात है कि एक बूढ़े इंसान को केवल इसलिए निशाना बनाया जाता है कि विचारों के हिसाब से यह हमेशा कट्टरता फैलाने वाले हिंदुओं की आलोचना करते रहे हैं और उन कट्टरपंथियों के विचारों को हिंदू धर्म के विरुद्ध समझते हैं जबकि उन पर हमला होने के बाद उनका बयान यह था कि "मैं अमन और शांति में विश्वास रखने वाला इंसान हूं और यही मेरी पहचान है मुझे नहीं मालूम इन लोगों ने मुझे क्यों निशाना बनाया"
इस घटना के अभी कुछ ही दिन हुए हैं और हो सकता है इस लेख के आप तक पहुंचते पहुंचते और कई घटनाएं हो चुकी हों, ऐसे में हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि कि सोचें कि हत्या के इस तूफ़ान को कैसे रोका जाए इसके लिए जिसका भी दरवाज़ा खटखटाना पड़े खटखटाया जाए लोगों के सोए हुए ज़मीरों को जगाया जाए इसलिए कि अगर अदालत की जगह किसी भी जुर्म का फ़ैसला भीड़ करने लगे तो देश की क़ानून व्यवस्था का क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाया भी नहीं जा सकता।
आश्चर्य की बात है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों जिनका संबंध आम जनता की शांति से है सरकार ख़ामोश बैठी तमाशा देख रही है और जिस सख़्ती से निपटना चाहिए नहीं निपट रही है जो देश की अखंडता के लिए ऐसा ख़तरा बन रहे हैं जिसको हम धार्मिक आतंक का नाम दे सकते हैं।
क्या यह सोचने की बात नहीं कि सरकार की ओर से कोई ठोस क़दम नहीं उठाया जा रहा और जैसे जैसे चुनाव क़रीब आ रहा है वैसे वैसे और अधिक धार्मिक नफ़रत का ज़हर घोला जा रहा है, एक तरफ़ सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी केवल काग़ज़ी कार्यवाही में लगी है जबकि भय और आतंक का माहौल लगातार बढ़ता ही जा रहा है, वह दिन दूर नहीं जब आपसी एकता और अखंडता की मिसाल दिए जाने वाले देश की पहचान भीड़तंत्र और मॉबलिंचिंग से की जाएगी।  ............................


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