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Date of publication : 12/6/2018 14:39
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ईद और मासूमीन अ.स. की सीरत

मासूमीन अ.स. की निगाह में ईद की ख़ास अहमियत थी, पैग़म्बर स.अ. ने एक हदीस में ईदुल फितर और ईदुल अज़हा के बारे में फ़रमाया कि जिस समय मैं मदीने में आया तो मुझे पता चला कि जेहालत के दौर में लोग ईद के दो दिनों को बेहूदा और ग़ैर ज़रूरी कामों के लिए जानते थे, इसीलिए अल्लाह ने उन दिनों के बदले दो ईद के दिन क़रार दिए एक ईदुल फ़ितर और दूसरे ईदे क़ुर्बान, फिर आपने एक बहुत लंबी हदीस में फ़रमाया कि जब शबे ईदुल फ़ितर आती है तो अल्लाह नेक अमल वालों को बिना हिसाब किताब सवाब देगा, और जैसे ही ईद की सुबह होती है अल्लाह फ़रिश्तों को सारे शहरों में भेजता है वह ज़मीन पर आ कर गली कूचे में खड़े हो कर बुलंद आवाज़ से पुकार कर कहते हैं ऐ मोहम्मद (स.अ.) की उम्मत ईद की नमाज़ के लिए बाहर निकलो अल्लाह बे हिसाब सवाब देगा और सारे गुनाहों को माफ़ कर देगा।



विलायत पोर्टल : ईदे फ़ितर मुसलमानों की अहम ईदों में से एक है जिस दिन मुसलमान एक महीने की इबादत करने और रोज़े रखने के बाद एक साथ जमा हो कर अपनी ख़ुशियां ज़ाहिर करते हुए एक दूसरे को मुबारकबाद पेश करते हैं।
ईदुल फ़ितर का मतलब क्या है?
ईदुल फ़ितर दो शब्दों से मिल कर बना है जिसमें एक ईद है जिसके कई सारे मतलब बताए गए हैं जिनमें से एक पलटना है और आदी हो जाना भी इसका मतलब बताया गया है, दूसरा शब्द फ़ितर है जिसका मतलब फ़ितरत है, यानी इंसान का इस मुबारक महीने रमज़ान में तौबा इस्तेग़फ़ार कर के ख़ुद को गुनाह की गंदगी और नजासत से बाहर निकाल कर ईद के दिन अपनी पाक फ़ितरत पर वापस आ जाता है।

पैग़म्बर स.अ. और ईदुल फ़ितर
मासूमीन अ.स. की निगाह में ईद की ख़ास अहमियत थी, पैग़म्बर स.अ. ने एक हदीस में ईदुल फितर और ईदुल अज़हा के बारे में फ़रमाया कि जिस समय मैं मदीने में आया तो मुझे पता चला कि जेहालत के दौर में लोग ईद के दो दिनों को बेहूदा और ग़ैर ज़रूरी कामों के लिए जानते थे, इसीलिए अल्लाह ने उन दिनों के बदले दो ईद के दिन क़रार दिए एक ईदुल फ़ितर और दूसरे ईदे क़ुर्बान, फिर आपने एक बहुत लंबी हदीस में फ़रमाया कि जब शबे ईदुल फ़ितर आती है तो अल्लाह नेक अमल वालों को बिना हिसाब किताब सवाब देगा, और जैसे ही ईद की सुबह होती है अल्लाह फ़रिश्तों को सारे शहरों में भेजता है वह ज़मीन पर आ कर गली कूचे में खड़े हो कर बुलंद आवाज़ से पुकार कर कहते हैं ऐ मोहम्मद (स.अ.) की उम्मत ईद की नमाज़ के लिए बाहर निकलो अल्लाह बे हिसाब सवाब देगा और सारे गुनाहों को माफ़ कर देगा।

ईदुल फ़ितर और इमाम अली अ.स. का ख़ुत्बा
इमाम अली अ.स. ने ईदुल फ़ितर के एक ख़ुत्बे में इस दिन के बारे में फ़रमाया
** ऐसा दिन जिसमें नेक काम करने वालों को सवाब दिया जाता है
** ऐसा दिन जिसमें गुनाहगारों को अपने किए का नुक़सान देखना पड़ता है
** ईद का दिन क़यामत के दिन जैसा है
** मग़फ़ेरत और तौबा का दिन
** सीख हासिल करने का दिन
** जब अपने घरों से ईद की नमाज़ पढ़ने के लिए निकलो तो उस समय को याद करो जब क़ब्रों से निकल कर अल्लाह की बारगाह में हाज़िरी देने जाओगे
** जब नमाज़ की जगह पर खड़े हो तो ऐसा लगे जैसे अल्लाह की अदालत में खड़े हो
** जब नमाज़ पढ़ कर घर वापस लौटो तो ऐसा लगता है कि जैसे जन्नत में अपने घर की तरफ़ लौट रहे हो। (मीज़ानुल हिकमह, जिल्द 9, पेज 4201-4202)
इमाम सादिक़ अ.स. ने इसी ख़ुत्बे की तरफ़ इशारा करते हुए फ़रमाया कि इमाम अली अ.स. ने ईदुल फ़ितर के दिन ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया जिसमें इशारा किया कि ऐ लोगों यह वह दिन है जिसमें लोगों को उनके नेक आमाल पर ईनाम दिया जाएगा और गुनहगार घाटा उठाने वालों में से होंगे और यह दिन क़यामत के दिन से मिलता जुलता है इसीलिए जब अपने घर से निकल कर ईदगाह की ओर निकलो तो उस दिन को याद करो जब कब्रों से निकल कर अल्लाह की बारगाह में जाना पड़ेगा, उस दिन को याद करो जिस दिन अल्लाह की बारगाह में पलट कर हाज़िरी देनी पड़ेगी और उस दिन को याद करो जिस दिन अपने असली घर जन्नत की तरफ़ जाओगे, ऐ अल्लाह के बंदों माहे रमज़ान में सबसे मामूली तोहफ़ा बंदों को यह मिलता है कि फ़रिश्ते आवाज़ देते हैं ऐ बंदों मुबारक हो अल्लाह ने तुम्हारे पिछले गुनाहों को माफ़ कर दिया है लेकिन अब भविष्य में ध्यान रखना और अल्लाह की मासियत से बचे रहना।

इमाम हुसैन अ.स. और ईदुल फ़ितर
नक़्ल है कि ईदुल फ़ितर के दिन इमाम हुसैन अ.स. एक जगह से गुज़र रहे थे जहां कुछ लोग बैठे हंसी मज़ाक़ कर रहे थे इमाम अ.स. उनके पास खड़े हो गए और फ़रमाया अल्लाह ने माहे रमज़ान को अपने बंदों के इम्तेहान का मैदान क़रार दिया है ताकि उसकी इताअत करते हुए उसकी ख़ुशनूदी और मर्ज़ी को हासिल कर के एक दूसरे से अमल के मैदान में आगे निकल सकें, और कुछ लोग निकले भी आगे और कामयाबी भी हासिल की और कुछ लोग इन कामयाब होने वाले लोगों के क़ाफ़िले से पीछे रह गए, बहुत ही आश्चर्य की बात है कि इन दिनों में जब नेक आमाल वालों को सवाब मिल रहा है और बुरे आमाल वाले बैठ कर हंसी मज़ाक़ कर रहे हैं, अल्लाह की क़सम अगर निगाहों से पर्दे हटा दिए जाएं तब समझेंगे कि नेक बंदे किस तरह अभी भी नेक आमाल अंजाम देने में लगे हुए हैं और गुनहरार किस तरह गुनाहों के दलदल में धंसता जा रहा है, इसके बाद इमाम हुसैन अ.स. वहां से चले गए.....।

इमाम सज्जाद अ.स. और ईदुल फ़ितर
इमाम सज्जाद अ.स. माहे रमज़ान में अपने ग़ुलामों और कनीज़ों को नहीं डांटते थे बल्कि उनकी ग़लतियों को एक जगह लिखते रहते और शबे ईद उन सब के जमा कर के उनकी ग़लितयों को दिन तारीख़ और समय के साथ उन्हें बता कर पूछते बताओ तुमने यह ग़लती की थी ना? जब वह हां कहते तो आप फ़रमाते कि याद रखना कि मैंने माहे रमज़ान में तुम्हारी ग़लतियों को अनदेखा करते हुए माफ़ कर दिया है, वह ग़ुलाम और कनीज़ जवाब देते कि जिस तरह आपने हम लोगों पर रहम किया अल्लाह आप पर रहम करे, फिर इमाम अ.स. ने फ़रमाया कि मैंने तुम लोगों को माफ़ कर दिया अगर मुझ से कोई शिकायत और नाराज़गी हो तो मुझे भी माफ़ कर देना।
इमाम सज्जाद अ.स. शबे ईद उन ग़ुलामों और कनीज़ों को कुछ पैसे और तोहफ़े दे कर आज़ाद कर देते थे



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