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Date of publication : 10/6/2018 14:12
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माहे रमज़ान से ख़ुदा हाफ़िज़ी के आदाब

जिस ख़ुदा हाफ़िज़ी के लिए हमसे रिवायतों में कहा गया है उसे दुखी मन के साथ होना चाहिए, और ख़ुदा हाफ़िज़ी दुखी मन के साथ तभी होगी जब माहे रमज़ान का पूरी तरह से सम्मान किया हो, हदीस में ज़िक्र किए गए सारे आदाब का ख़्याल रखा हो, अल्लाह की मर्ज़ी हासिल करने की पूरी कोशिश की हो और इस महीने की हुरमत का पूरा ख़्याल रखा हो, अगर इन सारी चीज़ों का ध्यान रखा और माहे रमज़ान से भरपूर रूहानी फ़ायदा हासिल किया तो ऐसे मेहमान का विशेष सम्मान किया जाता है उसकी जगह आला-इल्लीयीन है वह नबियों और फ़रिश्तों से क़रीब जगह पर रहेगा, वह रमज़ान के आने से बेहद ख़ुश और जाने से बेहद दुखी होगा।

विलायत पोर्टल : माहे रमज़ान के आदाब में से एक इस मुबारक महीने से ख़ुदा हाफ़िज़ी है, आयतुल्लाह तबरेज़ी इस बारे में लिखते हैं कि इस बात को समझना ज़रूरी है समय और स्थान होते तो बे जान हैं लेकिन समझ इनके पास भी होती है यहां तक कि इनमें भी मोहब्बत और नफ़रत पाई जाती है, समय में हयात और समझ पाई जाती है इसी वजह से माहे रमज़ान से ख़ुदा हाफ़िज़ी के आदाब का ज़िक्र किया गया है, जो सबसे ज़्यादा अहमियत देने वाली बात है वह यह है कि ख़ुदा हाफ़िज़ी करने वाले को सच्चा होना चाहिए यानी दिल में किसी तरह का निफ़ाक़ छल कपट नहीं होना चाहिए, क्योंकि अहले बैत अ.स. का हदीसों में  ख़ुदा हाफ़िज़ी के लिए दो जुमले ज़िक्र हुए हैं वह इस तरह हैं...

वह माहे रमज़ान को पुकार कर कहते हैं सलाम हो तुम पर ऐ मेरे साथी जिससे दूर होना मेरे लिए बहुत सख़्त है, वह अल्लाह को पुकार कर कहते हैं कि ख़ुदाया हम माहे रमज़ान से इस हालत में ख़ुदा हाफ़िज़ी कर रहे हैं कि हमारे दिल दुखी हैं और उसको ख़ुदा हाफ़िज़ी के बारे में सोंच कर भी डर लगता है, ज़ाहिर है ऐसी ख़ुदा हाफ़िज़ी वही कर सकता है जिसने पूरी लगन और पूरे ध्यान से माहे रमज़ान का इस्तेक़बाल करते हुए उसे गुज़ारा हो, ऐसा न हो कि ज़ोर ज़बर्दस्ती के नतीजे में रोज़े रखे हों या पूरे माहे रमज़ान में इस मुबारक महीने के आदाब के ख़िलाफ़ अमल न किया हो, क्योंकि ज़ाहिर है ऐसे अमल वाला माहे रमज़ान में अल्लाह का मेहमान ही नहीं कहा जाएगा जिसके चलते वह ख़ुदा हाफ़िज़ी करे।

जिस ख़ुदा हाफ़िज़ी के लिए हमसे रिवायतों में कहा गया है उसे दुखी मन के साथ होना चाहिए, और ख़ुदा हाफ़िज़ी दुखी मन के साथ तभी होगी जब माहे रमज़ान का पूरी तरह से सम्मान किया हो, हदीस में ज़िक्र किए गए सारे आदाब का ख़्याल रखा हो, अल्लाह की मर्ज़ी हासिल करने की पूरी कोशिश की हो और इस महीने की हुरमत का पूरा ख़्याल रखा हो, अगर इन सारी चीज़ों का ध्यान रखा और माहे रमज़ान से भरपूर रूहानी फ़ायदा हासिल किया तो ऐसे मेहमान का विशेष सम्मान किया जाता है उसकी जगह आला-इल्लीयीन है वह नबियों और फ़रिश्तों से क़रीब जगह पर रहेगा, वह रमज़ान के आने से बेहद ख़ुश और जाने से बेहद दुखी होगा।

इन सबके बाद आपकी माहे रमज़ान से ख़ुदा हाफ़िज़ी इमाम सज्जाद अ.स. जैसी ख़ुदा हाफ़िज़ी कहलाएगी और माहे रमज़ान भी आप से दुखी हो कर ख़ुदा हाफ़िज़ी करेगा, बल्कि माहे रमज़ान आप से ज़्यादा दुखी मन के साथ ख़ुदा हाफ़िज़ी करेगा क्योंकि अल्लाह की इनायत हर हाल में बेहतर और ज़्यादा है।


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