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Date of publication : 7/6/2018 15:1
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फ़िलिस्तीन और विश्व समुदाय का विश्वासघात

फ़िलिस्तीन सारे इस्लामी जगत का मुद्दा है और इस्राईल अवैध राष्ट्र है वह मिडिल ईस्ट में ज़ायोनी विचारधारा के चलते कैंसर का फोड़ा है जिसे खुरच कर फेंक देना चाहिए और अगर सारे मुसलमान आपस में इत्तेहाद कर के एक एक बाल्टी पानी इस्राईल की तरफ़ फेंक दें तो वह उसके सैलाब में बह जाएगा,

विलायत पोर्टल :  वह बादल उठने वाला है जो..... तुर्की में उस्मानी साम्राज्य के पतन के समय फ़िलिस्तीन में ब्रिटिश की साज़िश के नतीजे में जो यहूदियों को बसाने की मुहिम शुरू हुई थी आज उसे 70 साल से ज़्यादा का समय बीत रहा है, जब ज़ायोनी विचारधारा रखने वाले यहूदियों ने सोंची समझी साज़िश के तहत Promised Land हासिल करने का षडयंत्र कर के यूरोप और अमेरिका में बिखरे हुए यहूदियों के बीच फ़िलिस्तीन हिजरत करने की ज़बर्दस्त मुहिम चलाई और इस बहाने से ताक़त, पैसे और साज़िश के बल पर फ़िलिस्तीनियों की ज़मीनों पर यहूदियों ने अवैध क़ब्ज़ा शुरू कर दिया इस तरह इस्राईल ने फ़िलिस्तीन पर अवैध रूप से क़ब्ज़ा कर के अपनी हुकूमत बना ली और वहां के नागरिकों को जिलावतनी पर मजबूर कर दिया और अवैध राष्ट्र इस्राईल की स्थापना के बाद से अब तक फ़िलिस्तीनियों ने इस्राईली आतंकवाद और क़त्लेआम के अलावा अमन और शांति का मुंह भी नहीं देखा, ज़ायोनी दरिंदों ने मुसलमानों का क़त्लेआम किया और इस अत्याचार के विरुध्द आवाज़ उठाने वाले लीडरों, उलमा और जवानों को लोहे की सलाख़ के पीछे डाल दिया जबकि मानवाधिकार का नारा लगाने वाले संयुक्त राष्ट्र संघ, अमेरिका, यूरोपीय देश अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं उन निहत्थे मज़लूम मुसलमानों पर होते हुए यह सारे अत्याचार देखते रहे बल्कि इस्राईल का पूरा समर्थन करते हुए उसको मज़बूत करने की दिन रात कोशिशें करके उसकी वफ़ादारी में लगे हैं।
क़ुद्स डे मनाना
आख़िरकार उस बहादुर फ़क़ीह ने फ़िलिस्तीन के मसले को ज़िदा करने और उसके हल के लिए रमज़ानुल मुबारक के आख़िरी जुमे को क़ुद्स डे का नाम दे दिया जिसके बाद वह मुसलमान जो फ़िलिस्तीन के नाम तक को नहीं जानते थे उन्हें जानकारी हो गई और इस्राईल के चंगुल से मज़लूम फ़िलिस्तीनियों की निजात की दुआ करने लगे बल्कि दुनिया भर के ज़िंदा ज़मीर मुसलमानों के कंधों से कंधा मिला कर फ़िलिस्तीन की आज़ादी में दिल्चस्पी लेने लगे।
हैरत तो इस बात पर है कि इस्लामी देशों के शासक ख़ुद छिप कर इस्राईल से दोस्ती का हाथ मिलाए हुए हैं और मुसलमानों के साथ विश्वासघात जैसा जुर्म कर रहे हैं, अरब होने का दावा करने वाले अरबी शासक फ़िलिस्तीन की आम जनता के लिए कभी गंभीर नहीं रहे जो एक बहुत दुखद बात है.... इन अरबी शासकों की करतूत को देख कर कहा जा सकता है कि इस घर को आग लग गई घर के चिराग़ से...
जमाल अब्दुल अल-नासिर ने मिस्र से अरब राष्ट्रवाद की दुहाई दे कर फ़िलिस्तीन के मामले को आगे बढ़ाना चाहा तो नकाम हो गए, ईरान के एक आलिम शहीद नव्वाब सफ़वी ने अपनी एक तक़रीर में फ़िलिस्तीन के मामले को राष्ट्रवाद से जोड़ने जैसे विचार पर टोका और कहा कि फ़िलिस्तीन पूरे इस्लामी जगत का मामला है तब कुछ अरब लीडरों को होश आया।
इमाम ख़ुमैनी र.ह. और फ़िलिस्तीन का मुद्दा बीसवीं शताब्दी में इस्लामी क्रांति के लीडर इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने ऐलान कर दिया कि फ़िलिस्तीन सारे इस्लामी जगत का मुद्दा है और इस्राईल अवैध राष्ट्र है वह मिडिल ईस्ट में ज़ायोनी विचारधारा के चलते कैंसर का फोड़ा है जिसे खुरच कर फेंक देना चाहिए और अगर सारे मुसलमान आपस में इत्तेहाद कर के एक एक बाल्टी पानी इस्राईल की तरफ़ फेंक दें तो वह उसके सैलाब में बह जाएगा, और भी न जाने कितने मार्ग दर्शन उम्मत के दिए। फ़िलिस्तीन पर ज़ायोनी क़ब्ज़े की वजहें
1- तुर्की में उस्मानिया हुकूमत का पतन
2- ब्रिटेन की साज़िश जिसे अमेरिका और यूरोप का पूरी समर्थन हासिल था
3- फ़िलिस्तीनी नागरिकों का अपने दौर के हालात से बे ख़बर रहना और परिस्तिथियों की संवेदनशीलता को न समझ पाना
4- इस्राईल की स्थापना के लिए ज़ायोनियों की प्लानिंग और उनकी कामयाब राजनीति
5- अरब के मुस्लिम देशों के शासकों और बादशाहों की बे हिसी और बेग़ैरती
6- फ़िलिस्तीन के मुद्दे को इस्लामी जगत के बजाए अरब राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाना
7- कुछ अरब देशों जैसे सऊदी,जार्डन वग़ैरह का ख़ुफ़िया तौर से इस्राईल का समर्थन करना और उनसे दोस्ती निभाते हुए पूरी तरह से उनसे वफ़ादारी पेश करना 8- अमेरिका, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से इस्राईल को हर तरह की सुहूलत देना और उसकी हर दरिंदगी पर आंख बंद किए रहना।
यह कुछ वह अहम कारण हैं जिनकी वजह से आज तक फ़िलिस्तीनियों को कामयाबी हासिल नहीं हो सकी, हालांकि दुनिया में कुछ ऐसे देश भी थे जो सेकुलर ग़ैर मुस्लिम होते हुए इस्राईल को एक दरिंदा समझते रहे और अपने देश में अवैध राष्ट्र इस्राईल के दूतावास तक को स्वीकार नहीं किया जिसमें एक देश भारत भी था क्योंकि ख़ुद महात्मा गांधी जी का भी यही ख़्याल था।
महात्मा गांधी जी की यहूदियों को नसीहत
वह कहते हैं मैं यहूदियों से कहूंगा कि अमेरिका और यूरोप के समर्थन से फ़िलिस्तीन की तरफ़ हिजरत न करें यह बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी है, फ़िलिस्तीनियों को उनके घर से निकाल कर ख़ुद को वहां बसाना भी तो बहुत बड़ा आतंकवाद है। यहूदियों को अमेरिका और यूरोप पर विश्वास करने के बजाए अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए,
अल्लामा इक़बाल फ़रमाते हैं कि..
है ख़ाके फ़िलिस्तीं पर यहूदी का अगर हक़
स्पानिया पर हक़ नहीं क्यों अहले अरब का।
संक्षेप में इतना समझ लीजिए माहे रमज़ान का आख़िरी जुमा बेहतरीन मौक़ा है जब फ़िलिस्तीन और उसके मज़लूम नागरिक पर एक बार फिर दुनिया भर के मुसलमान और ज़िंदा और आज़ाद ज़मीर इंसान देखते हैं और अवैध राष्ट्र इस्राईल की काली करतूतों के ख़िलाफ़ अपने विरोध और ग़ुस्से को ज़ाहिर करते हुए इमाम ख़ुमैनी र.ह. की आवाज़ पर लब्बैक कहते हुए बैतुल मुक़द्दस की वापसी और फ़िलिस्तीन की मज़लूम जनता के समर्थन का ऐलान करते हैं, इंशा अल्लाह वह दिन दूर नहीं जब सारे मुसलमान एकजुट हो कर इस्राईल और उसके ज़ुल्म और अत्याचार को जड़ से उखाड़ फ़ेंकेंगे और हज़रत मोहम्मद स.अ. की मुबारक नस्ल से आप ही के वारिस इमाम महदी अ.स. के साथ इसी फ़िलीस्तीन की ज़मीन पर इस्लाम का परचम लहराएंगे और क़िबल-ए-अव्वल को आज़ाद कर के दुनिया के सभी मज़लूमों ख़ास कर फ़िलिस्तीनियों के आंसू पोंछेंगे...कि....
वह बादल उठने वाला है जो सबकी प्यास बुझाएगा।
(हुज्जतुल इस्लाम मौलाना मुशाहिद आलम रिज़वी तंज़ानिया )
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