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Date of publication : 7/6/2018 1:4
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दुआए जौशन कबीर की फ़ज़ीलत

जो शख़्स माहे रमज़ान में इस दुआ को तीन बार पढ़े अल्लाह उस पर जहन्नम की आग हराम कर देगा और जन्नत उस पर वाजिब कर देगा और दो फरिश्तें उसके साथ कर देगा जो उसे गुनाह से रोकने में मदद करेंगे और वह पूरी ज़िंदगी अल्लाह की हिफ़ाज़त में रहेगा और इस रिवायत के आख़िर में इमाम हुसैन अ.स. ने फ़रमाया मेरे वालिद इमाम अली अ.स. ने मुझे यह दुआ याद करने की वसीयत फ़रमाई और मुझसे अपने कफ़न पर लिखने को भी कहा और साथ यह भी कहा कि अपने अहले बैत अ.स. को इस दुआ की तालीम दूं और उनसे भी पढ़ने के लिए कहूं, इस दुआ में अल्लाह के हज़ार नाम हैं जिन्हें इस्मे आज़म कहा जाता है।

विलायत पोर्टल :  जौशन कबीर वह दुआ है जिसका आम दिनों ख़ास कर माहे रमज़ान में पढ़ने का बेहद सवाब ज़िक्र किया गया है उन्ही रिवायतों में से कुछ को हम आपके सामने पेश कर रहे हैं। बलदुल अमीन और मिसबाहे कफ़अमी में मौजूद है कि इमाम सज्जाद अ.स. ने अपने वालिद इमाम हुसैन अ.स. और उन्होंने अपने वालिद इमाम अली अ.स. से और उन्होंने पैग़म्बर स.अ. से रिवायत को नक़्ल करते हुए फ़रमाया कि यह दुआ एक जंग के दौरान हज़रत जिब्रईल ने पैग़म्बर स.अ. तक उस समय पहुंचाई जब वह भारी ज़ेरह पहने हुए थे जिससे आपको तकलीफ़ हो रही थी।
जिब्रईल ने कहा कि ऐ मोहम्मद (स.अ.) अल्लाह आपको सलाम कहता है और फ़रमाता है कि यह भारी ज़ेरह उतार दें और यह दुआ पढ़ें क्योंकि यह दुआ आप और आपकी उम्मत की हिफ़ाज़त के लिए है, फिर आपने और भी बहुत से फ़ज़ाएल बयान किए, जैसे आपने फ़रमाया कि जो शख़्स इसे कफ़न पर लिखे तो उसका जहन्नम में जाना अल्लाह की रहमत के ख़िलाफ़ है, और जो पहली रमज़ान की रात ख़ुलूस के साथ यह दुआ पढ़े उसे शबे क़द्र नसीब होगी और अल्लाह उसके लिए 70 हज़ार फ़रिश्ते पैदा करेगा जो अल्लाह की तसबीह और तक़दीस करेंगे जिसका सवाब इस दुआ पढ़ने वाले को मिलेगा।
इसी तरह एक रिवायत में बयान हुआ है कि जो शख़्स माहे रमज़ान में इस दुआ को तीन बार पढ़े अल्लाह उस पर जहन्नम की आग हराम कर देगा और जन्नत उस पर वाजिब कर देगा और दो फरिश्तें उसके साथ कर देगा जो उसे गुनाह से रोकने में मदद करेंगे और वह पूरी ज़िंदगी अल्लाह की हिफ़ाज़त में रहेगा और इस रिवायत के आख़िर में इमाम हुसैन अ.स. ने फ़रमाया मेरे वालिद इमाम अली अ.स. ने मुझे यह दुआ याद करने की वसीयत फ़रमाई और मुझसे अपने कफ़न पर लिखने को भी कहा और साथ यह भी कहा कि अपने अहले बैत अ.स. को इस दुआ की तालीम दूं और उनसे भी पढ़ने के लिए कहूं, इस दुआ में अल्लाह के हज़ार नाम हैं जिन्हें इस्मे आज़म कहा जाता है।
इस रिवायत से दो अहम बातें सामने आती हैं, पहली बात यह कि इस दुआ का कफ़न पर लिखना मुसतहब है जैसाकि अल्लामा बहरुल उलूम ने अपनी किताब दुर्रह में इसकी तरफ़ इशारा किया है, उन्होंने लिखा कि मरने वाले के कफ़न पर इसलाम और ईमान की गवाही, क़ुर्आन और जौशन कबीर का लिखना मुसतहब है, जिससे मरने वाला अल्लाह के अज़ाब से महफ़ूज़ रहेगा।
दूसरी बात यह कि इस दुआ को माहे रमज़ान के शुरू में पढ़ना मुसतहब है और जैसाकि अल्लामा मजलिसी ने रिवायत नक़्ल की है कि जौशन कबीर को रमज़ान की तीनों शबे क़द्रों में पढ़ना बेहद सवाब रखता है। इस दुआ की सौ हिस्से हैं और हर हिस्से में अल्लाह के दस नाम हैं और हर हिस्से के बाद
سُبْحانَکَ یَا لاَ إلہَ إلاَّٲَنْتَ الْغَوْثَ الْغَوْثَ الْغَوْثَ خَلِّصْنا مِنَ النَّارِیَارَبِّ
पढ़ा जाता है जिसका मतलब यह है कि तू पाक है ऐ वह कि तेरे सिवा कोई माबूद नहीं फ़रियादियों की फ़रियाद सुनने वाले ऐ रब हमें (जहन्नम की) आग से निजात अता कर। ख़ुदाया हम सबको इस मुबारक महीने में इस दुआ और दूसरी सारी दुआएं ख़ुलूस से पढ़ने की तौफ़ीक़ दे और हमारी हर जाएज़ दुआ को क़ुबूल फ़रमा।
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