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Date of publication : 6/6/2018 16:16
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माहे रमज़ान में बेहतरीन दुआ मग़फ़ेरत की दुआ है: आयतुल्लाह ख़ामेनई

इस्लाम में गुनाहों का माफ़ करने वाला केवल अल्लाह है यहां तक कि पैग़म्बर स.अ. भी गुनाहों को नहीं माफ़ कर सकते हैं जैसाकि क़ुर्आन की आयत में इसका ज़िक्र कुछ इस तरह बयान हुआ है कि ऐ पैग़म्बर अगर इन लोगों ने गुनाह किया और आपके पास आ कर मग़फ़ेरत और इस्तेग़फ़ार का सवाल करें तो आप भी उन लोगों के हक़ में तौबा कीजिए अल्लाह उनकी तौबा को क़ुबूल करने वाला है, इस आयत से ज़ाहिर कि पैग़म्बर स.अ. उन लोगों के लिए इस्तेग़फ़ार करते हैं उनकी मग़फ़ेरत के लिए वसीला बनते हैं न कि उनकी तौबा को क़ुबूल करते हैं यानी गुनाह केवल अल्लाह ही माफ़ कर सकता है किसी और को इसका अधिकार नहीं है।

विलायत पोर्टल : इमाम अली अ.स. ने पैग़म्बर स.अ. से सवाल किया कि इस माहे रमज़ान में सबसे बेहतर अमल कौन सा है?
पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया गुनाहों से दूरी और हराम कामों से परहेज़ इम मुबारक महीने में दूसरे सभी नेक कामों से बेहतर है, गुनाहों से दूरी ही दिलों की पाकीज़गी की वजह है। रोज़ा रखना, क़ुर्आन की तिलावत करना, दुआ और मुनाजात पढ़ना और गुनाहों से दूर रहना यह सारी चीज़ें मिल कर इंसान को उन आदाब व अख़लाक़ और नैतिकता से क़रीब करती हैं जो इस्लाम की निगाह में पसंदीदा हैं, और जब इंसान के अंदर यह सारी चीज़ें पैदा हो जाएंगी तो इंसान का दिल नफ़रतों से ख़ाली हो जाएगा और उसके दिल में क़ुर्बानी और ईसार का जज़्बा पैदा होगा और जिसका नतीजा यह होता है कि इंसान ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता है और इंसान दूसरों के फ़ायदे के लिए अपना नुक़सान भी बर्दाशत करने को तैयार हो जाता है, यही वजह है कि आप देख सकते हैं कि माहे रमज़ान में मुसलमान ख़ुद को दूसरे महीनों से ज़्यादा गुनाह, जुर्म और अपराध से दूर रखता है और नेक आमाल ज़्यादा अंजाम देता है और लोगों के बीच आपसी भाईचारा और मोहब्बत भी दूसरे महीनों से ज़्यादा नज़र आता है, यह सब इस महीने अल्लाह के मेहमान होने की बरकत से है।
कुछ लोग होते हैं जो माहे रमज़ान से भरपूर फ़ायदा उठाते हैं वहीं कुछ ऐसे होते हैं जो कुछ बरकतों से महरूम रह जाते हैं, एक मुसलमान की कोशिश यह होना चाहिए कि जितना हो सके इस मुबारक महीने से फ़ायदा हासिल करना चाहिए ताकि अल्लाह की ख़ास रहमत और उसकी मग़फ़ेरत का साया हम पर हो सके, मैं इस मुबारक महीने में तौबा और इस्तेग़फ़ार पर काफ़ी ताकीद कर रहा हूं, गुनाहों से तौबा, ग़लतियों से तौबा चाहे गुनाह छोटे हों या बड़े, सबसे क़ीमती बात यही है कि इस महीने हम अपने दिलों को गुनाहों की गंदगियों से पाक कर लें और यह केवल इस्तेग़फ़ार और तौबा द्वारा ही मुमकिन है, इसी लिए बहुत सारी हदीसों में है कि बेहतरीन दुआ मग़फ़ेरत की दुआ है यानी अल्लाह की बारगाह में इस्तेग़फ़ार किया करे, पैग़म्बर स.अ. अपनी सारी अज़मतों और फ़ज़ीलतों के बावजूद इस्तेग़फ़ार किया करते थे, हमारी तौबा और इस्तेग़फ़ार गुनाहों से होती है वह गुनाह जो हमारे वुजूद में हैवानी सिफ़ात के मज़बूत होने की वजह से होते हैं लेकिन कुछ हस्तियां ऐसी होती हैं जिनके तौबा और इस्तेग़फ़ार का यह मतलब नहीं होता बल्कि उनकी तौबा तर्के औला की वजह से होती है और कुछ तो ऐसी अज़ीम हस्तियां होती हैं जो तर्के औला की वजह से भी नहीं बल्कि वह अल्लाह की बारगाह में ख़ुद को उसकी ज़ात के सामने इतना छोटा और कम महसूस करते हैं कि उसकी बारगाह में गिड़गिड़ा कर तौबा करते हैं वह अल्लाह की पूरी मारेफ़त हासिल न कर पाने की वजह से मग़फ़ेरत की दुआ करते हैं और यह मर्तबा औलिया और अल्लाह के ख़ास बंदों का है।
हमें अपने गुनाहों से तौबा करनी चाहिए और इस्तेग़फ़ार का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि हम अपनी ग़फ़लत से बाहर निकलें, क्योंकि हम कभी कभी ख़ुद अपने बारे में धोखे में रहते हैं और ग़फ़लत के नशे में रहते हैं। हम जैसे ही इस्तेग़फ़ार का इरादा करते हैं हमारे सारे गुनाह, सारी ग़लतियां, नफ़्स की पैरवी, लोगों के हक़ को पामाल करना, अपने नफ़्स पर ज़ुल्म और दूसरों पर किए जाने वाले ज़ुल्म सब कुछ हमारी निगाहों के सामने आ जाता है कि हमने क्या क्या अपनी ज़िदगी में किया है, उस समय हमारा घमंड, तकब्बुर, ग़फ़लत सब दूर हो जाता है और इस्तेग़फ़ार का पहला फ़ायदा भी यही है।
और फिर अल्लाह ने वादा किया है कि जो भी इस्तेग़फ़ार करेगा यानी सच में तौबा और इस्तेग़फ़ार को एक दुआ समझते हुए अल्लाह से अपने किए की माफ़ी मांगेगा और अपने गुनाहों पर शर्मिंदा होगा तो अल्लाह को तौबा को क़ुबूल करने वाला पाएगा, अगर इस्तेग़फ़ार और तौबा सच्ची हो तो उसका मतलब यह है कि इंसान गुनाहों और ग़लतियों की तरफ़ पीठ करते हुए अल्लाह की तरफ़ रुख़ कर लेता है और ऐसी ही तौबा अल्लाह क़ुबूल करता है जब तौबा और इस्तेग़फ़ार सच्चे दिल से की जाती है।
ध्यान रहे कि यह जो इंसान ज़बान से असतग़फ़ेरुल्लाह असतग़फ़ेरुल्लाह कहता रहता है लेकिन उसका दिमाग़ कहीं और रहता है इसे ना ही इस्तेग़फ़ार कहते हैं और ना ही इसका कोई फ़ायदा है, इस्तेग़फ़ार एक दुआ है जिसके लिए इंसान को पूरा ध्यान लगा कर अल्लाह की बारगाह में अपने गुनाहों को स्वीकार करते हुए उनपर शर्मिंदा होते हुए कहना होगा कि ख़ुदाया मुझ पर रहम कर मेरे गुनाहों को माफ़ कर दे। अगर इस तरह से अपने हर एक गुनाह से इस्तेग़फ़ार किया जाए तो यक़ीक़न अल्लाह की मग़फ़ेरत हमारे हाल को शामिल होगी।
हालांकि इस्लाम में अपने गुनाहों का दूसरों के सामने बयान करने से मना किया गया है जैसाकि कुछ दूसरे दीन में है कि इबादतगाहों में जा कर मज़हबी रहनुमा के सामने बैठ कर अपने गुनाहों को बयान करें, इस्लाम में यह सब चीज़ें नहीं हैं अपने ही गुनाहों का दूसरों के सामने बयान करने से मना किया गया है और इसका कोई फ़ायदा भी नहीं है, जबकि दूसरे दीनों में अक़ाएद में तहरीफ़ करने के बाद यह कहा जाता है कि चर्च में मौजूद पादरी के सामने गुनाहों को स्वीकार करने के बाद वही पादरी गुनाहों को माफ़ कर देता है
लेकिन इस्लाम में गुनाहों का माफ़ करने वाला केवल अल्लाह है यहां तक कि पैग़म्बर स.अ. भी गुनाहों को नहीं माफ़ कर सकते हैं जैसाकि क़ुर्आन की आयत में इसका ज़िक्र कुछ इस तरह बयान हुआ है कि ऐ पैग़म्बर अगर इन लोगों ने गुनाह किया और आपके पास आ कर मग़फ़ेरत और इस्तेग़फ़ार का सवाल करें तो आप भी उन लोगों के हक़ में तौबा कीजिए अल्लाह उनकी तौबा को क़ुबूल करने वाला है, इस आयत से ज़ाहिर कि पैग़म्बर स.अ. उन लोगों के लिए इस्तेग़फ़ार करते हैं उनकी मग़फ़ेरत के लिए वसीला बनते हैं न कि उनकी तौबा को क़ुबूल करते हैं यानी गुनाह केवल अल्लाह ही माफ़ कर सकता है किसी और को इसका अधिकार नहीं है।
इसी लिए इस्तेग़फ़ार की बहुत अहमियत है, इस महीने इससे ग़ाफ़िल मत रहिए इसे अनदेखा मत कीजिए ख़ास कर माहे रमज़ान की सहर में इस मुबारक महीने की रातों में इस्तेग़फ़ार कीजिए और वह दुआएं जो इस महीने में पढ़ने के लिए किताबों में बयान की गई हैं उन्हें उनके तर्जुमे पर ध्यान देते हुए पढ़िए।
अल्हमदो लिल्लाह हमारे समाज में लोगों का ध्यान तौबा और इस्तेग़फ़ार की तरफ़ है उसे और बेहतर बनाने की ज़रूरत है ताकि हमारा संबंध अल्लाह से और मज़बूत हो सके और हम उसकी बारगाह में और क़रीब हो सकें।


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