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Date of publication : 4/6/2018 14:50
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शबे क़द्र में कुछ अपने लिए.....

इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. अभी छोटे थे, रमज़ान का महीना था शबे क़द्र थी, आपने रात जल्द ही बच्चों को सुला दिया और आधी रात के बाद जगा दिया ताकि सहर तक बच्चे जागते रहें आप बीच बीच में उन्हें खजूरें और पानी देती रहतीं। ज़रा सोचिए तो सही, शहज़ादी अपने छोटे छोटे बच्चों तक को उन शबों में जगाती हैं आख़िर कोई अहम शब होगी न.....
विलायत पोर्टल : बंदों से प्यार और मोहब्बत उनकी हर छोटी बड़ी ज़रूरत को ख़्याल रखना केवल अल्लाह का काम है, बंदा समझे या न समझे रात दिन यहां तक पूरी उम्र वही उसकी सारी ज़रूरतों और हाजतों को बिना मांगे पूरा करता है मगर यह बंदा जाहिल भी है और अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करने वाला भी, चूंकि अल्लाह आलिम और क़ादिर है इसलिए वह अपने इल्म और क़ुदरत से हर काम पूरी हिकमत और बड़े हिसाब किताब से करता है जैसे अल्लाह इंसान की जिस्मानी ज़रूरतों को खाने पीने और अनाज को पैदा कर के पूरी करता है वैसे ही उसकी रूहानी और मानवी ज़रूरतें भी पूरा करता है उसके लिए उसने नमाज़ और रोज़े के अहकाम भेज कर उन ज़रूरतों को भी अच्छी तरह से पूरा किया है, यह रमज़ान का मुबारक महीना बंदों के लिए ही रखा है जिसमें अपनी रहमत और मग़फ़ेरत को सबके लिए आम करते हुए जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए शैतान को जकड़ दिया ताकि उसका बंदा उस महीने से फ़ायदा हासिल कर सके।
माहे रमज़ान कब से बरकतों वाला बना
यही नहीं कि इस्लाम में यह महीना फ़ज़ीलत और बरकत वाला बना बल्कि इंसानी इतिहास के शुरू से और शरीयतों के नाज़िल होने से ले कर मोहम्मदी शरीयत के आने तक इस महीने की बरकतें हमेशा एक जैसी रही हैं और सारी आसमानी किताबें इसी महीने में नाज़िल हुई हैं, हज़रत मूसा को तौरैत और हज़रत ईसा को इंजील इसी महीने में मिली और क़ुर्आन भी इसी महीने हमारे नबी पर नाज़िल हुआ, इस महीने की रातें इतनी अहम ठहरीं कि अल्लाह ने उन्हें शबे क़द्र बना दिया।
शबे क़द्र कैसे गुज़ारें
शबे क़द्र क्या है? यह कोई आम रातों जैसी रात नहीं है जिसे आम रातों जैसा गंवा दिया जाए बल्कि इस रात में फ़रिश्ते क़तार बना कर आख़िरी इमाम अ.स. पर नाज़िल हो कर दुरूद और सलाम का पैग़ाम लाते हैं और उसी रात बंदों की तक़दीर लिखी जाती है मौत और ज़िंदगी की तारीख़ें तय की जाती हैं बंदों की सआदत और बद बख़्ती का फ़ैसला होता है, इस रात इबादत करना, अपने मालिक की बारगाह में तौबा और इस्तेग़फ़ार करना और उसकी रहमत की उम्मीद में तसबीह पढ़ना हमारी इबादत का हिस्सा है, अगर कोई किसी मजबूरी की वजह से रोज़ा नहीं भी रख पा रहा हो फिर भी उसे इन रातों में ज़रूर जागना चाहिए, मस्जिद में जाना, क़ुर्आन की तिलावत करना या तिलावत सुनना, दुआ के लिए हाथ उठाना यह सब बंदगी है और यह सभी काम अल्लाह को बेहद पसंद हैं।
हदीस में आया है कि (अल्लाह अपने गुनहगार बंदों का इंतेज़ार करता है) कैसे एक आशिक़ अपने माशूक़ से मिलने और बात करने का दिल से इंतेज़ार करता है उसी तरह अल्लाह और बंदे का मामला बेहद क़रीबी और नर्मी वाला होता है, यह इंसान की सिफ़त है कि नाराज़ हो कर जल्दी राज़ी नहीं होता लेकिन अल्लाह ऐसा करीम है कि वह पहले नाराज़ तक नहीं होता और अगर जुर्म बड़ा भी हो तो तौबा के आंसू से ऐसा धुल देता है कि फिर वह धब्बा तक नहीं रह जाता, इसलिए माहे रमज़ान में शबे क़द्र के आमाल जो किताबों में ख़ास कर शैख़ अब्बास क़ुम्मी की किताब मफ़ातीहुल जेनान में मौजूद हैं उन्हें पढ़ें, माहे रमज़ान की शबों में थोड़ा अपने लिए समय निकालिए अल्लाह को याद कीजिए दुनियादारी और रोज़ाना की बातों से दूर रह कर अपनी आख़ेरत के लिए गंभीर रहिए हो सके तो अपनी हैसियत के अनुसार ग़रीबों को सदक़ा दीजिए आमाल, नमाज़ और तिलावत के मज़े को चखिए।
शबे क़द्र और हज़रत ज़हरा स.अ. का अमल
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा स.अ. के दोनें बेटे इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. अभी छोटे थे, रमज़ान का महीना था शबे क़द्र थी, आपने रात जल्द ही बच्चों को सुला दिया और आधी रात के बाद जगा दिया ताकि सहर तक बच्चे जागते रहें आप बीच बीच में उन्हें खजूरें और पानी देती रहतीं। ज़री सोचिए तो सही, शहज़ादी अपने छोटे छोटे बच्चों तक को उन शबों में जगाती हैं आख़िर कोई अहम शब होगी न.....
अपने लिए अपने पड़ोसियों के लिए और अपने मरहूमीन के लिए दुआएं भी कीजिएगा कि यह शब दुआ और मुनाजात और अपने मौला और मालिक से राज़ की बातें करने की शब है, आप सभी से दुआओं की उम्मीद है।
(हुज्जतुल इस्लाम सैयद मुशाहिद आलम रिज़वी तंज़ानिया)
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