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Code : 194103
Date of publication : 4/6/2018 11:11
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अली अ.स.और यतीमों और महरूमों की मदद

इमाम अली अ.स. ने अपनी हुकूमत में एक बूढ़ी ख़ातून को भीख मांगते हुए देखा इमाम अ.स. ने देखने के बाद पूछा कि कौन है यह और यह भीख क्यों मांग रही है? लोगों ने जवाब दिया मौला यह ईसाई है, आपने फ़रमाया कि जब तक काम करने के क़ाबिल थी उससे काम लेते रहे और अब जब बूढ़ी हो गई तो उसे अनदेखा कर दिया, आपने हुक्म दिया कि उसके ख़र्चों को बैतुल माल से पूरा किया जाए।

विलायत पोर्टल :  हर मुसलमान की ज़िम्मेदारी है कि वह यतीमों के साथ इस तरह से मोहब्बत से पेश आए कि उन्हें अपने मां या बाप के न होने का एहसास न हो, क्योंकि आज उनके मां या बाप दुनिया में नहीं हैं इसलिए वह हर किसी से मोहब्बत और अच्छे रवैये की उम्मीद रखते हैं जिसके लिए ज़रूरी है कि उनकी इस ज़रूरत को महसूस करते हुए उनसे मोहब्बत से पेश आया जाए ताकि वह अपनी उम्र के बच्चों के साथ घुल मिल कर अकेलेपन के एहसास से बचे रहें और ख़ुद को अपमानित भी महसूस न करें, हम पर वाजिब है कि यतीमों की ज़िंदगी को अनदेखा न करते हुए यतीम बच्चों को और उनके परिवार को सपोर्ट करें उनका ख़्याल रखें उनकी सरपरस्ती करें और इमाम अली अ.स. की वसीयत को ज़िंदा रखें जो उन्होंने अपनी शहादत से पहले की थी...
अल्लाह के वास्ते अल्लाह के वास्ते यतीमों का ख़्याल रखो, वह कभी खाना खाते कभी भूखे ही सो जाते, ऐसा न हो तुम्हारे होते हुए उनकी देखभाल न हो और वह दुनिया से चल बसें। आप यतीमों की देखभाल और उनका ख़्याल रखने के सवाब के बारे में फ़रमाते हैं कि मर्द हो या औरत जो भी यतीम के सर पर मोहब्बत से हाथ फेरता है अल्लाह उस हाथ के नीचे आने वाले बालों की तादाद के बराबर सवाब देता है।
पैग़म्बर स.अ. और मासूमीन अ.स. की सीरत में यतीमों, महरूमों और कमज़ोरों की मदद का विशेष रूप से ज़िक्र मिलता है, इन हस्तियों की यही कोशिश थी कि इस अहम ज़िम्मेदारी को इस तरह पूरा करें कि उनका आत्मसम्मान भी बाक़ी रहे और उनकी ज़रूरत भी दूर हो जाए क्योंकि मासूमीन अ.स. इन लोगों को अल्लाह के पसंदीदा लोगों में समझते और ख़ुद को महरूम समझते थे इसी लिए वह यतीमों, महरूमों और कमज़ोरों से मोहब्बत करते और उनका सम्मान करते थे।
इमाम अली अ.स. से नक़्ल है कि पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं: अल्लाह ने शबे मेराज उनसे फ़रमाया, ऐ मोहम्मद! (स.अ.) अल्लाह से दोस्ती ग़रीबों और फ़क़ीरों को अपनाने में हैं (आपने पूछा वह कौन लोग हैं? तो अल्लाह ने फ़रमाया) वह ऐसे लोग हैं जो कम पर भी राज़ी हैं, भूख पर भी सब्र करते हैं, आराम की ज़िंदगी के लिए अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं, कभी भूख प्यास की अल्लाह से शिकायत नहीं करते, अपनी ज़ुबान से कभी झूठ नहीं बोलते, किसी हाल में भी अल्लाह से नाराज़ नहीं होते, न मिलने पर परेशान नहीं होते और मिलने पर ख़ुश नहीं होते,
ऐ मोहम्मद! (स.अ.) मुझसे मोहब्बत यानी फ़क़ीरों से मोहब्बत करना है, फ़क़ीरों के साथ उठो बैठो ताकि मैं तुमको अपने से क़रीब कर सकूं और दुनिया परस्त मालदारों से दूर रहो क्योंकि मुझे फ़क़ीर पसंद हैं।
दीनी भाईयों की ज़रूरत पूरी करना
एक ईमानी समाज आपसी मोहब्बत, भाईचारे, एक दूसरे के सम्मान और इंसानी वैल्यूज़ के साथ ही बाक़ी रह सकता है, अल्लाह के नज़दीक सबसे पसंदीदा काम दीनी और ईमानी भाईयों की मुश्किल और परेशानियों को दूर करने की कोशिश करना है, अल्लाह हर उस क़दम जो दीनी भाईयों की ज़रूरत को पूरा करने के लिए उठाया जाए उस पर सवाब देता है, दीनी भाईयों का आपसी रिश्ता इतना मज़बूत है कि एक दूसरे के सुख और दुख के समय साथ खड़े होना चाहिए, कोई भी मुसलमान अपने लिए यह जानते हुए कि उसके पड़ोस में कोई भूखा और महरूम शख़्स है वह कभी लज़ीज़ खाने को पसंद नहीं करेगा।
मोमिन की अहम ज़िम्मेदारियों में से यह है कि वह सब को एक समान देखे और उनकी मदद करे चाहे माली हो चाहे किसी और तरह की, इसलिए मुसलमानों को अल्लाह के सारे माली हुक़ूक़ अदा करते रहना चाहिए उनकी आंखें अल्लाह की तरफ़ और उनके क़दम अल्लाह की मख़लूक़ की तरफ़, उनके हाथ यतीमों महरूमों और बे सहारा लोगों की मदद के लिए हमेशा आगे होना चाहिए, अल्लाह के बंदों के साथ अच्छा बर्ताव और उनके साथ भलाई की कोशिश इंसान को घमंड और ख़ुद को सब कुछ समझने से रोकते हैं और इलाही और मलकूती अख़लाक़ से उसे सजाते हैं, एक मुसलमान कभी किसी दूसरे मुसलमान की परेशानी को अनदेखा नहीं कर सकता वह बिना उनके हाल चाल पूछे सुकून नहीं हासिल कर सकता, मुसलमान को हमेशा एक ऐसे समाज को बनाने की कोशिश में रहना चाहिए जिसमें किसी तरह की कोई कमी न पाई जाती हो और एक दूसरे की हमदर्दी का पूरा ख़्याल रखना चाहिए । इस्लाम में मेहमान नवाज़ी का काफ़ी ज़िक्र है, हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि मेहमानी में यतीमों महरूमों कमज़ोरों और फ़क़ीरों को बुलाएं ताकि मेहमानी के साथ साथ हमारे दिल एक दूसरे से क़रीब हो सकें, यही वजह है कि इमाम अली अ.स. ने अपने गवर्नर के दस्तरख़ान पर फ़क़ीर और नादार लोगों के न होने पर आपत्ति जताई थी।
शियों की दो पहचान: नमाज़ और बराबरी
इमाम अली अ.स. ने आपसी बराबरी के मामले को इतनी अहमियत दी कि उसे शियों की दो पहचान में से एक ऐलान फ़रमाया, आपने फ़रमाया कि मेरे शियों को दो तरह से पहचानो, पहले इस बात में कि वह नमाज़ के वक़्त के कितने पाबंद हैं, दूसरे यह कि वह अपने दीनी भाईयों की कितनी माली मदद करते हैं, अगर इनमें से कोई भी सिफ़त न हो तो उससे दूर रहो वह मेरा शिया नहीं है।
एक बार इमाम अली अ.स. ने अपनी हुकूमत में एक बूढ़ी ख़ातून को भीख मांगते हुए देखा इमाम अ.स. ने देखने के बाद पूछा कि कौन है यह और यह भीख क्यों मांग रही है? लोगों ने जवाब दिया मौला यह ईसाई है, आपने फ़रमाया कि जब तक काम करने के क़ाबिल थी उससे काम लेते रहे और अब जब बूढ़ी हो गई तो उसे अनदेखा कर दिया, आपने हुक्म दिया कि उसके ख़र्चों को बैतुल माल से पूरा किया जाए।
इमाम अली अ.स. ने अपनी पूरी ज़िंदगी यही कोशिश रही कि लोगों के लिए ऐसी परिस्तिथियां पैदा की जाएं जिससे वह एक समान ज़िंदगी गुज़ारें इसी वजह से आपने अपने मक्के के गवर्नर क़ुसम इब्ने अब्बास को इस तरह एक ख़त लिखा कि वह सारी दौलत जो तुम्हारे पास है उस पर अल्लाह का हक़ है इसलिए उसे ख़र्च करते समय ध्यान रखो कि उसे अपने पास पड़ोस में रहने वाले ज़रूरतमंदों को इस तरह पहुंचाओ कि कि सब तक पहुंच जाए और जो बचे उसे मुझ तक पहुंचाओ ताकि उसे मैं यहां के ज़रूरतमंदों के बीच बांट सकूं। ..........................


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