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Date of publication : 4/6/2018 12:42
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इमाम अली अ.स. और यतीमों की सरपरस्ती

एक दिन इमाम अली अ.स. को यतीमों की तंगी और बदहाली की ख़बर मिली, आपने घर जा कर चावल, खजूर, तेल और कुछ खाने की चीज़ों का बंदोबस्त किया उसे अपने कंधे पर रख कर उनके घर चल दिए, मेरे बार बार कहने पर भी वह खाने का सामान मुझे नहीं दिया बल्कि ख़ुद अपने कंधे पर रखे रहे, जब हम यतीमों के घर पहुंचे तो इमाम अ.स. ने अपने हाथ से लज़ीज़ खाना बनाया और फिर अपने हाथ से उन्हें पेट भर खाना खिलाया। फिर आप उन बच्चों के साथ बहुत देर तक खेलते रहे उनको हंसाते रहे बच्चे भी आपके साथ खेलते और खिलखिला कर हंस रहे थे।
विलायत पोर्टल : नेक बंदों के लिए अल्लाह की मर्ज़ी और उसकी ख़ुशनूदी से बढ़ कर कुछ नहीं होता, इमाम अली अ.स. जैसा इंसान जिसकी बहादुरी का पूरा अरब गवाह हो जिसके मुक़ाबले पर आने वाला बचा ही न हो उस बहादुर इंसान ने अल्लाह की मर्ज़ी के अलावा कभी मैदान में क़दम नहीं रखा और लेकिन आप जब रात की तंहाई में अल्लाह की बारगाह में खड़े होते तो आंसुओं का ऐसा सैलाब उमड़ता कि आख़िर में बेहोश हो जाते ऐसा लगता कि जैसे आपसे ज़्यादा डरने वाला कोई नहीं, आपकी इसी सिफ़त को देखते हुए अरब का शायर कहता है कि ऐ अली (अ.स.) आपके वुजूद में विपरीत चीज़ें जमा हो गई हैं।
बेशक वह अल्लाह के दुश्मन के मुक़ाबले में बिल्कुल सख़्त लेकिन यतीम बच्चों के साथ इस क़द्र मेहेरबान थे कि उनके सामने आप ज़मीन पर बैठ कर उनके सरों पर हाथ फेरते और दर्द भरी आह के साथ फ़रमाते यतीम बच्चों के सामने मेरे मुंह से जितनी दर्दनाक आह निकली उतनी किसी मौक़े पर नहीं निकली,जैसाकि आपने वसीयतनामे में फ़रमाया यतीमों के सिलसिले में अल्लाह से डरो कहीं ऐसा न हो वह भूखे रह जाएं और समाज की चकाचौंध में वह खो जाएं, मैंने पैग़म्बर स.अ. से सुना है कि अगर कोई किसी यतीम की सरपरस्ती करते हुए उसकी सारी ज़रूरतों को पूरा कर दे अल्लाह उसके इस अमल के बदले जन्नत वाजिब कर देगा इसी तरह अगर किसी ने यतीम के माल को छीन कर खाया तो अल्लाह उस पर जहन्नम वाजिब कर देगा।
इसी तरह एक दूसरी जगह फ़रमाया जो भी मोमिन या मोमिना किसी यतीम के सर पर प्यार और मोहब्बत से हाथ रखेगा अल्लाह उसके हाथ के नीचे आने वाले बालों की तादाद के बराबर उसके लिए नेकियां और सवाब उसके आमाल नामे में लिखेगा। अली (अ.स.) को माफ़ कर दो एक दिन इमाम अली अ.स. कूफ़ा की गली में अकेले जा रहे थे, आप भी सारे मुसलमानों की तरह की तरह सादगी के साथ धीरे धीरे चल रहे थे और आस पास निगाह भी रखे हुए थे, क्योंकि आप पूरे समाज के रहबर थे हर एक पर नज़र रखना आपकी ज़िम्मेदारी थी, रास्ते में आपने एक औरत को देखा जो पानी की मश्क (पुराने ज़माने में पानी भर कर लाने का बर्तन) अपने कंधे पर रखे जा रही थी और उस मश्क के बोझ के कारण उसकी सांस फूल रही थी, आपने उसके क़रीब पहुंच कर देखा वह पूरी तरह थक चुकी थी आपने उससे मश्क ले कर अपने कंधे पर रख लिया और रास्ता चलते हुए उसकी ख़ैरियत और हाल चाल पूछने लगे, उस औरत ने बताया कि उसका शौहर किसी जंग में इमाम अली अ.स. के लश्कर की तरफ़ से शहीद हो गया अब मैं और मेरे यतीम बच्चे बिना किसी सरपरस्त और वारिस के रह गए हैं, रिवायत कहती है इमाम अली अ.स. ने पूरी रात बहुत बेचैनी में गुज़ारी फिर सुबह सवेरे खाने के सामान का थैला ले कर उस औरत के घर चल दिए रास्ते में कई लोगों ने चाहा आपसे वह थैला ले लें लेकिन आप फ़रमाते थे कि क़यामत के दिन हमारे आमाल नामे का बोझ कौन ले कर चलेगा? आपने उस औरत के घर के दरवाज़े पर पहुंच कर खटखटाया, औरत ने पूछा कौन? आपने जवाब दिया कि वही जिसने कल आपकी मदद की थी और पानी की मश्क आपके घर तक पहुंचाई थी, मैं आपके बच्चों के लिए कुछ खाने का सामान लाया हूं, दरवाज़ा खोल कर यह सामान ले लीजिए। उस औरत ने कहा, अल्लाह तुझ से राज़ी रहे और मेरे और अली (अ.स.) के बीच फ़ैसला करे।
इमाम अली अ.स. घर के अंदर गए और उस औरत से कहा कि तुम रोटी पकाओगी या बच्चों को संभालोगी? उस औरत ने कहा मैं रोटी जल्दी पका लूंगी आप बच्चों को संभाल लीजिए। उस औरत ने इमाम अ.ल. के लाए हुए आटे का ख़मीर तैयार किया, इमाम अली अ.स. ने अपने साथ लाए हुए गोश्त के कबाब बनाए और साथ साथ बच्चों के मुंह में खजूर खिला रहे थे, आप बहुत प्यार और मोहब्बत से उन बच्चों के साथ पेश आते और हर निवाला खिलाने के बाद उन बच्चों से कहते अल्लाह से कहो कि अली (अ.स.) को माफ़ कर दे। ख़मीर तैयार हो जाने के बाद इमाम अली अ.स. ने घर में बने तंदूर में आग जलाई और जब आग पूरी तरह से जल गई तो आप अपने चेहरे को उस आग के क़रीब ला कर कह रहे थे ऐ अली (अ.स.) देखो दुनिया की आग कितनी ख़तरनाक है, ध्यान रखना आख़ेरत की आग इस से ज़्यादा गर्म और ख़तरनाक होगी। इसी बीच पड़ोस की एक औरत जो इमाम अली अ.स. को पहचानती थी वह घर में दाख़िल हुई और उन बच्चों की मां पर चिल्लाती हुई बोली वाय हो तुम पर, तुम्हें पता नहीं कि यह कौन हैं! यह मुसलमानों के ख़लीफ़ा और हाकिम हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अ.स.हैं।
औरत अपने रवैये से शर्मिंदा हो कर दौड़ी हुई इमाम अ.स. की बारगाह में हाज़िर हो कर कहने लगी, आपसे बहुत शर्मिंदा हूं माफ़ कर दीजिए। लेकिन इमाम अ.स. ने विनम्रता के साथ फ़रमाया तुम मुझे माफ़ कर दो कि मैं अभी तक तुम्हारी परेशानियों को दूर नहीं कर सका था, अल्लाह से दुआ करना कि वह अली (अ.स.) को माफ़ कर दे। (बिहारुल अनवार, जिल्द 41, पेज 52).
इसी तरह इमाम अली अ.स. की ख़िलाफ़त के दौर में ईरान के हमदान शहर के रहने वाला एक शख़्स इमाम अ.स. की बारगाह में शहद और अंजीर को तोहफ़ा ले कर आया, इमाम अ.स. ने हुक्म दिया कि यतीम बच्चों को ले कर आओ, जब बच्चे आ गए तो आपने शहद की मश्क को खोल कर कहा बच्चों जितना शहद खाना हो खा सकते हो फिर उसी मश्क से बर्तनों में शहद निकाल कर हुक्म दिया कि इसी लोगों के बीच तक़सीम कर दिया जाए, कुछ लोगों ने इमाम अली अ.स. के इस अमल पर आपत्ति जताई कि आपने यतीमों को क्यों मश्क से मुंह लगा कर पीने दिया? इमाम अ.स. ने फ़रमाया कि इमाम यतीमों का बाप और सरपरस्त होता है और उसके लिए ज़रूरी है कि इस तरह के कामों की अनुमति उन्हें दे ताकि उन्हों यतीमी का एहसास न हो। (बिहारुल अनवार, जिल्द 41, पेज 123)
इसी तरह एक और रिवायत में है क़ंबर बयान करते हैं कि एक दिन इमाम अली अ.स. को यतीमों की तंगी और बदहाली की ख़बर मिली, आपने घर जा कर चावल, खजूर, तेल और कुछ खाने की चीज़ों का बंदोबस्त किया उसे अपने कंधे पर रख कर उनके घर चल दिए, मेरे बार बार कहने पर भी वह खाने का सामान मुझे नहीं दिया बल्कि ख़ुद अपने कंधे पर रखे रहे, जब हम यतीमों के घर पहुंचे तो इमाम अ.स. ने अपने हाथ से लज़ीज़ खाना बनाया और फिर अपने हाथ से उन्हें पेट भर खाना खिलाया। फिर आप उन बच्चों के साथ बहुत देर तक खेलते रहे उनको हंसाते रहे बच्चे भी आपके साथ खेलते और खिलखिला कर हंस रहे थे। फिर हम लोग उनके घर से वापस निकल आए, मैंने इमाम अ.स. से कहा कि मौला आज दो चीज़ें आपकी मेरे समझ में नहीं आईं, पहली खाने का सामान मेरे होते हुए आपने अपने कंधों पर उठाया और मुझे हाथ लगाने की अनुमति नहीं दी, दूसरी यह कि आप बच्चों के साथ खेल रहे थे उन्हें हंसा रहे थे ख़ुद भी हंस रहे थे......
इमाम अ.स. ने फ़रमाया पहला काम मेरा उस सवाब को हासिल करना था जो यतीमों की ख़िदमत का अल्लाह ने रखा है, दूसरा काम इसलिए था कि जब हम लोग उनके घर पहुंचे थे तो वह बच्चे रो रहे थे इसीलिए मैंने सोंचा कि जब यहां से जाऊं तो यह हंसते हुए हों। (शजर-ए-तूबा, पेज 407)
इमाम अली अ.स. की यही सीरत, यतीमों और अनाथ बच्चों और विधवा और बेसहारा औरतों की मदद थी जिसे आपकी शहादत के बाद पूरे कूफ़ा वालों ने महसूस की, कितने ग़रीबों, फ़क़ीरों, बेसहारा लोगों और मोहताज लोगों को इमाम अली अ.स. की शहादत के बाद पता चला कि जो हमारे सिरहाने रात में रोटियां रख के जाता था वह कोई और नहीं बल्कि मुसलमानों के ख़लीफ़ा पैग़म्बर स.अ. के जानशीन इमाम अली अ.स. थे। ....................


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