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Code : 194076
Date of publication : 2/6/2018 14:14
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आयतुल्लाह ख़ामेनई की निगाह में शबे क़द्र की आहमियत

माहे रमज़ान के दिन हों या रात अपने दिलों को अल्लाह के ज़िक्र से जितना हो सके नूरानी बनाईए ताकि शबे क़द्र के आने तक आपका नफ़्स इस क़ाबिल हो चुका हो कि वह उस रात से भरपूर फ़ायदा हासिल कर सके जिसकी ख़ासियत क़ुर्आन ने यह बताई है कि शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है और जिसमें अल्लाह की इजाज़त से फ़रिश्ते ज़मीन को आसमान से जोड़ देते हैं, दिलों को अल्लाह के नूर और उसके फ़ज़्ल से रौशन कर देते हैं, जो दिलों को मानवियत से भर देने और मरीज़ों के शिफ़ा हासिल करने और रूहानी बीमारियों के इलाज वाली रात है
विलायत पोर्टल :  हमारा अक़ीदा है (यह इस्लाम के बुनियादी अक़ीदों में से है बल्कि हर दीन में यही अक़ीदा है) कि इंसान केवल अल्लाह से ख़ुद को क़रीब कर के ही कमाल तक पहुंच सकता है, हालांकि रमज़ान का महीना एक ऐसा अवसर है जो सभी के लिए बेहतरीन मौक़ा है, यह मौक़ा कम नहीं है कि अल्लाह फ़रमाता है शबे क़द्र हज़ार महीनों से अफ़ज़ल और इंसान के कमाल तक पहुंचने के लिए बेहतर है, यह शब भी अल्लाह ने माहे रमज़ान में रखी है।
यह फ़ज़ीलत कम नहीं है कि पैग़म्बर स.अ. ने इस महीने को अल्लाह की मेहमानी का महीना शुमार किया है, क्या ऐसा हो सकता है कि इंसान एक करीम हस्ती की बारगाह में हाज़िर हो और वहां से महरूम लौट कर आए? जो भी इस महीने अल्लाह की ओर से बिछाए गए मग़फ़ेरत और मेहमानी के दस्तरख़ान से फ़ायदा हासिल नहीं कर सका वह महरूम ही कहलाएगा और यह ऐसा महरूम होगा जिसे हदीसों में भी महरूम कहा गया है जैसाकि हदीस में मौजूद है कि असली महरूम वह है जो माहे रमज़ान में अल्लाह की मग़फ़ेरत हासिल न कर सके।
शबे क़द्र शबे विलायत है
शबे क़द्र शबे विलायत भी है, क़ुर्आन के नाज़िल होने की शब है, फ़रिश्तों के इमाम ज़माना अ.स. पर नाज़िल होने की शब है और क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. की शब है। माहे रमज़ान में जिस शबे क़द्र का ज़िक्र है उसके बारे में क़ुर्आन का साफ़ ऐलान है कि यह हज़ार महीनों से बेहतर है, आख़िर क्यों इस रात की इतनी फ़ज़ीलत बयान की गई है? क्योंकि इस रात अल्लाह की तरफ़ से नाज़िल होने वाली बरकतें बेशुमार हैं, इस रात फ़रिश्तों का आना जाना बहुत ज़्यादा है, यह रात सलामती की रात है, इस रात में शुरूआत से आख़िर तक अल्लाह की तरफ़ से सलामती ही सलामती है, क़ुर्आन और अहलेबैत अ.स. दोनों की रात है इसी लिए यह शबे विलायत है, रमज़ान के दिन और रातें सभी फ़ज़ीलत वाली हैं लेकिन शबे क़द्र को सारे दिनों और सारी रातों पर फ़ज़ीलत हासिल है, इसलिए इसकी अहमियत को समझिए और इस महीने के दिनों और इसकी रातों में अल्लाह की क़ीमती नेमतों और उसकी बेपनाह रहमतों से जितना हो सके फ़ायदा हासिल कीजिए।
माहे रमज़ान के दिन हों या रात अपने दिलों को अल्लाह के ज़िक्र से जितना हो सके नूरानी बनाईए ताकि शबे क़द्र के आने तक आपका नफ़्स इस क़ाबिल हो चुका हो कि वह उस रात से भरपूर फ़ायदा हासिल कर सके जिसकी ख़ासियत क़ुर्आन ने यह बताई है कि शबे क़द्र हज़ार महीनों से बेहतर है और जिसमें अल्लाह की इजाज़त से फ़रिश्ते ज़मीन को आसमान से जोड़ देते हैं, दिलों को अल्लाह के नूर और उसके फ़ज़्ल से रौशन कर देते हैं, जो दिलों को मानवियत से भर देने और मरीज़ों के शिफ़ा हासिल करने और रूहानी बीमारियों के इलाज वाली रात है, हर बीमारी से निजात पाने की रात है चाहे वह बीमारी किसी एक इंसान की हो या सामाजिक बीमारी हो, अफ़सोस आज अधिकतर देशों की जनता जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं सभी मानवी और रूहानी बीमारियों से जूझ रहे हैं और इन सबका इलाज शबे क़द्र में ही मुमकिन है, लेकिन ध्यान रहे पूरी तैयारी और पूरे ख़ुलूस के साथ।
तक़दीर बदलने की रात
आज जब अल्लाह ने ख़ुद कहा है कि आंसू बहाओ, गिड़गिड़ाओ, उसके सामने हाथ फैलाओ, उसकी बारगाह में अपनी मोहब्बत का इज़हार करो, दिल की गहराईयों से उसे याद करो तो फिर इस मौक़े से फ़ायदा हासिल करना चाहिए, वरना उस दिन को ध्यान में रखना चाहिए जिस दिन के लिए अल्लाह ने फ़रमाया कि जाओ आज मत रो कोई फ़ायदा नहीं है, इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए यह मौक़ा अपनी तक़दीर बदलने का बेहतरीन मौक़ा है क्योंकि पूरे साल के सबसे बरकत वाले दिन इसी माहे रमज़ान के हैं और इस माहे रमज़ान में शबे क़द्र की तीनों रातों में से कोई एक है। सवाल किया गया कि इन तीनों रातों में से कौन सी रात शबे क़द्र है? तो जवाब दिया कि कितना अच्छा है कि इन तीनों रातों में शबे क़द्र को अहमियत दी जाए, इस बात से क्या फ़र्क़ पड़ता है कि शबे क़द्र एक रात है या तीनों रातें हैं इसलिए कि ऐसे लोग भी तारीख़ में गुज़रे हैं जो पहली रमज़ान से आख़िरी रमज़ान तक शबे क़द्र ही समझ कर हर रात उसी तरह अल्लाह की इबादत करते थे।
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