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Date of publication : 17/5/2018 10:36
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विलायते फ़क़ीह (3)

यह एक अफ़सोसनाक हक़ीक़त है कि मुसलमान इस्लानी क़ानूनों से ग़फ़लत के नतीजे में अहकाम की रूह को भूल गया और साम्राज्यवादी ताक़तों की साज़िशों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने हुकूमत और सियासत को शजरे ममनूआ समझने लगा (यानी वह पेड़ जिसके पास जाने से हज़रत आदम को मना किया गया था) और मुसलमान ख़ुद कहने लगा कि उलमा का हुकूमत से क्या संबंध? इमामों को हुकूमत की क्या ज़रूरत? उनकी हुकूमत तो दिलों पर है।
विलायत पोर्टल :  इस्लामी अहकाम और हुकूमत इस्लामी अहकाम केवल इबादतों तक सीमित नहीं है बल्कि इंसानी ज़िंदगी के हर पहलू के लिए इस्लाम ने क़ानून पेश किए हैं, व्यक्तिगत मामले हों या सामाजिक, इबादत के मसाएल हों या व्यापार के, आपसी मतभेद का हल निकालना हो या दुश्मन से संबंध का मामला हो, सामाजिक कठिनाईयां हों या आर्थिक परेशानियां इस्लाम ने हर मुश्किल का हल पेश कर दिया है यह और बात है कि हम इस्लामी तालीमात से ग़ाफ़िल रहें। अगर इस्लामी अहकाम पर ध्यान दिया जाए तो साफ़ नज़र आता है कि यह अहकाम इस्लामी हुकूमत के बिना क़ायम नहीं हो सकते, अगर इस्लामी हुकूमत न हो तो ख़ुम्स, ज़कात, अम्र बिल मारूफ़, नहि अनिल मुन्कर, को उनका सही मक़ाम नहीं मिल सकता, हद जारी करना, जान का क़ेसास और दियत हमारी फ़िक़्ह का अहम हिस्सा हैं और ज़ाहिर है अगर इस्लामी हुकूमत न हो तो मज़लूम को दियत नहीं मिल सकती है।
फ़क़ीह की एक और अहम ज़िम्मेदारी जिस पर फ़ोक़हा एकमत हैं वह क़ज़ावत (यानी फ़ैसला करना) है, ज़ाहिर है कि अगर फ़क़ीह के पास हुकूमत न हो तो उसकी अदालत से जारी होने वाले फ़ैसले लागू नहीं किए जा सकते, इस हुक्म को अगर हम क़ज़ावत के पहलू से दूसरे हुक्म से मिला कर देखें तो इस्लामी हुकूमत की अहमियत और ज़्यादा साफ़ हो जाती है कि इस्लाम ने ज़ालिम हुकूमतों की अदालत में जाने को हराम कहा है और क़ुर्आन ने इस काम का ज़बर्दस्त विरोध करते हुए फ़रमाया है कि, यह चाहते हैं कि सरकश लोगों के पास फ़ैसला कराएं जबकि उन्हें हुक्म दिया गया है कि ताग़ूत का इंकार करें। (सूरए निसा, आयत 60)
ऐसे माहौल में कि जब एक तरफ़ अपने हक़ को हासिल करना, प्रतिरक्षा करना अदालत ही में जा कर हल हो सकता हो और दूसरी तरफ़ ज़ालिम हुकूमत की अदालत में जाने को हराम कह दिया जाए तो इसके अलावा कोई रास्ता नहीं रह जाता कि फ़क़ीह की निगरानी में इस्लामी हुकूमत क़ायम हो और हर फ़ैसला इस्लामी क़ानून के आधार पर हो।
इस्लाम में सामाजिक मसाएल व्यत्तिगत मसाएल से कहीं ज़्यादा हैं और सामाजिक मसाएल में आमतौर से टकराव होता है, सवाल यह है कि यह टकराव कौन दूर करेगा? किसके हक़ में फ़ैसला हो और किसके नहीं? यह एकमत न होना भी हुकूमत के बिना दूर नहीं हो सकते और इस मुश्किल को दूर करने के लिए हुकूमत की ज़रूरत है। इस्लामी जगत में रोज़ाना नए नए मसाएल सामने आते हैं, नई नई सोंच और विचारधारा पैदा होती है, नए नए फ़ितने जन्म लेते हैं, कभी नबुव्वत का दावा तो कभी इमामत को दावा किया जाता है, कभी क़ुर्आन का अपमान होता है कभी इस्लामी क़ानून का मज़ाक़ उड़ाया जाता है, कभी क़ादयानी साम्राज्यवादी शक्तियों का मोहरा बन कर उभरते है तो कभी वहाबियत सारे इस्लामी जगत के क़त्ल को वाजिब क़रार देती है और ख़ालिस तौहीद के नाम पर रौज़ों और मज़ारों को गिरा देती है, हर दौर में सलमान रुश्दी और तसलीमा नसरीन जन्म लेते हैं अगर सही इस्लामी हुकूमत हो तो इन सारी बुराईयों की जड़ उखड़ सकती है और अगर विलायते फ़क़ीह न हो तो फिर इमाम ज़माना अ.स. के ज़ुहूर तक इन फ़ितनों से नेजात नहीं पा सकता।
संक्षेप में इतना समझ लीजिए कि अगर इमाम अ.स. की ग़ैबत में फ़ोक़हा को हुकूमत का हक़ हासिल न हो तो इस्लामी अहकाम पर अमल नहीं हो पाएगा, और अल्लाह के अहकाम पर अमल न होना न नबियों की मर्ज़ी हो सकती है और न ही मासूम इमामों अ.स. की, बल्कि उनकी मर्ज़ी सिर्फ़ और सिर्फ़ इस्लामी अहकाम के लागू होने ही में छिपी है।
यह एक अफ़सोसनाक हक़ीक़त है कि मुसलमान इस्लानी क़ानूनों से ग़फ़लत के नतीजे में अहकाम की रूह को भूल गया और साम्राज्यवादी ताक़तों की साज़िशों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने हुकूमत और सियासत को शजरे ममनूआ समझने लगा (यानी वह पेड़ जिसके पास जाने से हज़रत आदम को मना किया गया था) और मुसलमान ख़ुद कहने लगा कि उलमा का हुकूमत से क्या संबंध? इमामों को हुकूमत की क्या ज़रूरत? उनकी हुकूमत तो दिलों पर है।
सियासत और हुकूमत में दख़ल आज कुफ़्र के बराबर हो गया है जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, हुकूमत अल्लाह और उसके नेक बंदों का हक़ है बे दीन, ज़ालिम और अत्याचारी लोगों का हक़ नहीं.... अगर हुकूमत कोई ख़राब चीज़ होती तो क़ुर्आन में हज़रत दाऊद, हज़रत सुलैमान और दूसरे नेक बंदों की हुकूमत का ज़िक्र न होता और पैग़म्बर स.अ. भी हुकूमत क़ायम न करते।
इन सारी बातों से ज़ाहिर होता है कि बहुत सारी चीज़ों की तरह ख़ुद हुकूमत भी बुरी चीज़ नहीं है बल्कि हुकूमत का ग़लत इस्तेमाल करना बुरा है, हुकूमत का अयोग्य, बेदीन और बातिल परस्त के हाथों में होना ग़लत है वरना हुकूमत अगर उलमा और नेक बंदों के हाथ में हो तो बेशक यह कहना पड़ता है कि हमारी सियासत ही दीनदारी है और दीनदारी ही हमारी सियासत है।
उमूरे हसबिया पर विलायत सभी फ़ोक़हा इस बात पर एकमत हैं कि फ़क़ीह उमूरे हसबिया पर विलायत रखता है, उमूरे हसबिया ऐसे मामलात को कहा जाता है जिनके बारे में हम यक़ीनी तौर पर कह सकते हैं कि अल्लाह उनको एंजाम न देने पर राज़ी नहीं है, जैसे कि यतीमों, बच्चों और दीवानों के मसाएल और मामलात, यानी यतीम और मजनून पर विलायत को तो सभी मानते हैं लेकिन कहां तक और किन किन मामलात तक विलायत है इस बारे में एकमत नहीं हैं...., तो अगर यतीम, बच्चों और मजनून के मसाएल में उनकी सरपरस्ती इतनी अहमियत रखती है कि उन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता बल्कि हर क़ीमत पर उनकी देखभाल ज़रूरी है तो क्या पूरे इस्लामी जगत के मामलात और मसाएल इतनी अहमियत नहीं रखते? क्या इस्लामी देशों की सरहदों की हिफ़ाज़त को अनदेखा किया जा सकता है? जबकि यह बात बिल्कुल साफ़ है कि इन सभी चीज़ों के लिए हुकूमत की ज़रूरत है।
जारी है........
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