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Date of publication : 15/5/2018 21:1
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माहे रमज़ान की फ़ज़ीलत और आमाल

पैग़म्बर स.अ. ने एक औरत के बारे में सुना कि उसने रोज़े की हालत में अपनी कनीज़ को गाली दी है तो आपने उस औरत को बुला कर खाना मंगवाया और उस औरत से कहा कि यह लो खाना खा लो, उसने कहा या रसूलल्लाह (स.अ.) मैं रोज़ा हूं, पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया कि यह कैसा रोज़ा है जबकि तुमने अभी कुछ देर पहले अपनी कनीज़ को गाली दी है, रोज़ा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि अल्लाह ने रोज़े का मतलब हर बुरे काम और हर बुरी बात से बचना बताया है

विलायत पोर्टल :  शैख़ सदूक़ र.ह. ने मोतबर रावियों द्वारा इमाम रज़ा अ.स. से और इमाम रज़ा अ.स. अपने अजदाद से नक़्ल करते हुए फ़रमाते हैं कि इमाम अली अ.स. की हदीस है आपने फ़रमाया कि एक दिन पैग़म्बर स.अ. ने हमें ख़ुत्बा देते हुए इरशाद फ़रमाया कि ऐ लोगों तुम्हारी ओर रहमतों और बरकतों का महीना आ रहा है जिस महीने में तुम्हारे गुनाह माफ़ होते हैं, यह महीना अल्लाह के नज़दीक सबसे अफ़ज़ल महीना है जिसके दिन दूसरे महीने के दिनों और जिसकी रातें दूसरे महीनों की रातों से बेहतर हैं, जिसका हर पल दूसरे महीने से ज़्यादा फ़ज़ीलत वाला है, यही वह महीना है जिसमें अल्लाह ने तुम लोगों को अपना मेहमान बना कर बुलाया है और जिसमें तुम्हारी सांस लेना तसबीह और तुम्हारा सोना इबादत का दर्जा रखता है और इस महीने में तुम्हारे आमाल और तुम्हारी दुआएं क़ुबूल हो जाती हैं।
इसलिए तुम लोग अपने दिलों को बुरी बातों से पाक कर के अच्छी नीयत से सजा कर अल्लाह की बारगाह में दुआ करो कि वह तुम को इस महीने में रोज़ा रखने और क़ुर्आन की तिलावत करने की तौफ़ीक़ दे, क्योंकि जो इस महीने अल्लाह की मग़फ़ेरत से महरूम रह गया उसका अंजाम ख़तरनाक और बहुत बुरा होगा, इस महीने में जब भूख प्यास लगे तो क़यामत की भूख और प्यास का ख़्याल करो, फ़क़ीरों और मिसकीनों को सदक़ा दो, बड़ों की इज़्ज़त करो और छोटों पर रहम करो और रिश्तेदारों से अच्छा बर्ताव करो, अपनी ज़बान को ऐसी बातों से बचाओ जिनका बोलना और कहना हराम है और आंखों को उन चीज़ों से बचाओ जिनका देखना हराम है और कानों से उन बातों को मत सुनो जिनका सुनना सही नही है, यतीमों पर रहम करो ताकि कल तुम्हारे मरने के बाद लोग तुम्हारे यतीम बच्चों पर रहम करें, अपने गुनाहों से तौबा करो और सारा ध्यान अल्लाह की बारगाह में लगाओ, नमाज़ के बाद अपने हाथों को उठा कर दुआ करो क्योंकि इस समय अल्लाह अपने बंदों को रहमत की निगाह से देखता है और जो बंदे उस समय उससे मुनाजात करते हैं उन सबका वह जवाब देता है और जो भी उस समय पुकारता है उसकी पुकार को वह सुनता है।
ऐ लोगों इसमें शक नहीं है कि तुम्हारी जानें गिरवीं हैं इसलिए अल्लाह से मग़फ़ेरत मांग कर उन्हें छुड़ाने की कोशिश करो, तुम्हारी कमर गुनाहों के बोझ से झुकी हुई हैं तुम ज़्यादा से ज़्यादा सजदे कर के उनका बोझ हलका करो क्योंकि अल्लाह ने अपनी इज़्ज़त और अज़मत की कसम खा कर कहा है कि वह इस महीने नमाज़ पढ़ने वाले और सजदे करने वालों पर अज़ाब नाज़िल न करे और क़यामत में उनको जहन्नम का ख़ौफ़ न दिलाए। ऐ लोगों जो भी इस महीने किसी मोमिन के इफ़तार का बंदोबस्त करेगा तो अल्लाह उसके गुनाह को माफ़ कर देगा और उसे एक ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब देगा, पैग़म्बर स.अ. के कुछ सहाबियों ने पूछा या रसूलल्लाह (स.अ.) हम में से कुछ लोग इस अमल पर क़ादिर नहीं हैं तो आपने फ़रमाया, तुम इफ़तार में आधी खजूर खिला कर या एक घूंट शर्बत पिला कर भी ख़ुद को जहन्नम की आग से बचा सकते हो, क्योंकि अल्लाह उसको भी वही सवाब और अज्र देगा जो इससे ज़्यादा इफ़तार देने पर क़ादिर नहीं होगा। ऐ लोगों जो शख़्स इस महीने अपने अख़लाक़ को सुधारेगा अल्लाह क़यामत में उसे पुले सेरात से जहां सबके पैर फिसल रहे होंगे उसे आसानी से गुज़ार देगा, और जो शख़्स इस महीने अपने ग़ुलाम और कनीज़ पर काम का बोझ कम डालेगा अल्लाह क़यामत के दिन उसके हिसाब किताब को आसान कर देगा, और जो यतीमों को प्यार, इज़्ज़त और सम्मान देगा उसे क़यामत में अल्लाह सम्मान देगा, जो अपने रिश्तेदारों से अच्छा बर्ताव करेगा अल्लाह उस पर क़यामत में अपनी रहमत जारी रखेगा और जो उनसे बद सुलूकी करेगा अल्लाह उसे अपनी रहमत से महरूम कर देगा, जो इस महीने मुस्तहब नमाज़ें पढ़ेगा अल्लाह उसे जहन्नम से आज़ादी अता करेगा और जो वाजिब नमाज़ें अदा करेगा उसके आमाल का वज़न भारी कर देगा जबकि उस समय लोगों के आमाल का पलड़ा हलका होगा, जो इस महीने क़ुर्आन की एक आयात की तिलावत करेगा अल्लाह दूसरे महीनों में पढ़े जाने वाले पूरे क़ुर्आन का सवाब देगा।
 ऐ लोगों बेशक इम महीने में जन्नत के दरवाज़े खुले हुए हैं इसलिए अल्लाह से दुआ करो कि वह उन्हें तुम पर बंद न करे और जहन्नम के दरवाज़े बंद हैं इसलिए अल्लाह से दुआ करो कि वह उन्हें फिर कभी तुम पर न खोले और शैतानों को इस महीने क़ैद कर दिया जाता है इसलिए तुम अल्लाह से दुआ करो कि वह फिर तुम्हारे ऊपर हावी न होने दे। शैख़ सदूक़ र.ह. ने रिवायत नक़्ल की है कि जब रमज़ान का महीना आता था तो पैग़म्बर स.अ. सभी ग़ुलामों और क़ैदियों को आज़ाद कर दिया करते थे और किसी भी मांगने वाले को ख़ाली हाथ नहीं जाने देते थे।
शैख़ अब्बास क़ुम्मी नक़्ल करते हैं कि माहे रमज़ान अल्लाह का महीना है और यह सारे महीनों से अफ़ज़ल है, यह वह महीना है जिसमें आसमान, जन्नत और रहमत के दरवाज़े खुल जाते हैं और जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं, इस महीने में एक रात ऐसी भी है जिसमें इबादत करना हज़ार महीनों की इबादत से बेहतर है, इसलिए ऐ लोगों तुमको सोचना चाहिए कि तुम लोगों को इस महीने के रात दिन कैसे गुज़ारने हैं और अपने बदन के हर हिस्से को कैसे अल्लाह की मासियत से बचाना हैं।
ख़बरदार कोई शख़्स इस महीने की रातों में सोता न रहे और दिनों में अल्लाह की याद से ग़ाफ़िल न रहे क्योंकि एक हदीस में ज़िक्र हुआ है कि माहे रमज़ान में रोज़ा इफ़तार के समय अल्लाह एक लाख रोज़ेदारों को जहन्नम की आग से आज़ाद कर देता है और शबे जुमा और जुमा के दिन हर पल ऐसे हज़ारों गुनहगारों को जहन्नम से निजात देता है जिन पर जहन्नम वाजिब हो चुकी है और फिर माहे रमज़ान की आख़िरी रात में इतने बंदों को जहन्नम से निजात अता करता है जितनों को पूरे रमज़ान में निजात अता की है। इसलिए ध्यान रखना कहीं ऐसा न हो कि रमज़ान ख़त्म हो जाए और तुम्हारी गर्दन पर गुनाहों का बोझ लदा रहे और तुम उन लोगों में गिने जाओ जो जहन्नम से आज़ाद होने से महरूम रह गए हों क्योंकि इमाम सादिक़ अ.स. से हदीस है कि जो शख़्स इस बरकत वाले महीने में नहीं बख़्शा गया वह अगले साल रमज़ान तक नहीं बख़्शा जाएगा मगर यह कि वह हज के समय अरफ़ात के मैदान मे हाज़िर हो कर मग़फ़ेरत की दुआ करे, इसलिए तुम्हें हर उस चीज़ से बचना चाहिए जिसे अल्लाह ने हराम किया हो, और तुम्हें इस तरह रहना चाहिए जैसे इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. ने वसीयत फ़रमाई है कि जब तुम रोज़ा रखो तो तुम्हारे कानों, आंखों और जिस्म के सभी हिस्सों का रोज़ा होना चाहिए, यानी जिस्म के सभी हिस्सों को हराम बल्कि मकरूह चीज़ों से बचाना चाहिए, इमाम अ.स. ने यह भी फ़रमाया कि जिस दिन तुम रोज़ा नहीं रहते हो उस दिन की तरह तुम्हारे रोज़ा रहने वाला दिन नहीं होना चाहिए, फिर फ़रमाया कि रोज़ा केवल भूखा रहना नहीं है बल्कि रोज़े की हालत में अपनी ज़बान को झूठ से बचा कर रखो, आंखों को हराम से दूर रखो, रोज़े की हालत में किसी से लड़ाई झगड़ा मत करो, किसी से हसद (ईर्ष्या) मत करो, झूठी क़सम मत खाओ बल्कि सच्ची क़सम खाने से भी बचो, गालियां मत दो, ज़ुल्म मत करो, जाहिलों का रवैया मत अपनाओ, अल्लाह की याद और नमाज़ से ग़ाफ़िल मत हो, सब्र से काम लो, सच बोलो, बुरे लोगों से दूर रहो, तोहमत और चुग़लख़ोरी से बचो, ख़ुद को आख़ेरत से क़रीब समझो, हर समय इमाम ज़माना अ.स. के ज़ुहूर के इंतेज़ार में रहो, आख़ेरत के सवाब की उम्मीद रखो, आख़ेरत के लिए नेक आमाल को जमा करो, अल्लाह के अज़ाब से बिल्कुल वैसे ही डरे हुए रहो जैसे एक नौकर हमेशा अपने मालिक से डर कर रहता है जिसका दिल थमा हुआ और जिस्म सहमा हुआ रहता है लेकिन साथ ही उसकी रहमत की उम्मीद रखो।
ऐ रोज़ेदारों तुम्हारे दिल बुराईयों, तुम्हारा बातिन मक्कारी और तुम्हारा जिस्म गुनाहों से पाक हो जाना चाहिए, अल्लाह के अलावा हर ख़ुदा को अपने दिल से उखाड़ फेंको और रोज़े की हालत में अल्लाह की मदद और उससे मोहब्बत में ख़ुलूस पैदा करो, हर उस चीज़ से दूर हो जाओ जिससे अल्लाह ने अकेले और खुलेआम करने से रोका है, उस क़ह्हार ख़ुदा से ऐसे डरो जैसे डरने का हक़ है और रोज़े की हालत में अपना जिस्म और रूह अल्लाह के हवाले कर दो और अपने दिल को केवल उसी को मोहब्बत के लिए तैयार कर लो और अपने जिस्म को हर उस काम को करने के लिए तैयार रखो जिसका उसने हुक्म दिया है, अगर तुमने इन सभी चीज़ों पर अमल कर लिया तो समझो तुमने अल्लाह की सभी नसीहतों पर अमल किया है, इसके बाद इमाम अ.स. ने फ़रमाया अगर तुमने मेरी बताई गई सारी बातों पर अमल नहीं किया तो तुम्हारे रोज़ों के सवाब और फ़ज़ीलत में यक़ीनन कमी आ जाएगी।
इसके बाद इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि मेरे वालिद इमाम बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया कि पैग़म्बर स.अ. ने एक औरत के बारे में सुना कि उसने रोज़े की हालत में अपनी कनीज़ को गाली दी है तो आपने उस औरत को बुला कर खाना मंगवाया और उस औरत से कहा कि यह लो खाना खा लो, उसने कहा या रसूलल्लाह (स.अ.) मैं रोज़ा हूं, पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया कि यह कैसा रोज़ा है जबकि तुमने अभी कुछ देर पहले अपनी कनीज़ को गाली दी है, रोज़ा केवल भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है बल्कि अल्लाह ने रोज़े का मतलब हर बुरे काम और हर बुरी बात से बचना बताया है, इसीलिए बुज़ुर्ग उलमा कहते हैं कि हक़ीक़ी रोज़ेदार बहुत कम लोग ही होते हैं और भूखे प्यासे रहने वाले बहुत ज़्यादा हैं।
इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया कितने ही रोज़ेदार ऐसे हैं जिनके हाथ केवल भूख और प्यास ही आती है, और कितने इबादत करने वाले ऐसे हैं जिनके हिस्से में केवल जिस्म की थकान आती है, क्या कहना उस अक़्लमंद की नींद का जो जाहिल की बेदारी से बेहतर है और क्या कहना उस अक़्लमंद इंसान का जिसका रोज़े से न होना रोज़ेदारों से बेहतर है।
जाबिर इब्ने यज़ीद जोअफ़ी ने इमाम बाक़िर अ.स. से रिवायत नक़्ल की है कि पैग़म्बर स.अ. ने जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह से फ़रमाया, ऐ जाबिर रमज़ान एक मुबारक महीना है, जो शख़्स इस महीने दिनों में रोज़ा रखे और रातों के कुछ हिस्से में इबादत करे अपने पेट और शर्मगाह को हराम से बचाए, अपनी ज़बान पर क़ाबू रखे तो वह शख़्स गुनाहों से इस तरह बाहर आ जाएगा जैसे यह महीना जल्द ख़त्म हो गया है, जाबिर ने कहा या रसूलल्लाह (स.अ.) कितनी अच्छी हदीस बयान फ़रमाई है, आपने फ़रमाया वह शर्तें कितनी सख़्त हैं जिन्हें मैंने रोज़े के लिए बयान की हैं।
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