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Code : 193742
Date of publication : 14/5/2018 8:2
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विलायते फ़क़ीह (2)

इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. की तफ़सीली हदीस के आख़िर में इस तरह नक़्ल हुआ है कि, जो हमारे हलाल व हराम और अहकाम के बारे में जो साहेबे नज़र हो तुम अपने मामलात उनके हवाले कर देना और उसके फ़ैसले पर राज़ी हो जाना क्योंकि मैंने ऐसे शख़्स को तुम्हारे ऊपर हाकिम क़रार दिया है और अगर उसके हुक्म का इंकार किया तो समझो अल्लाह के हुक्म का अपमान किया और हमारी बात को ठुकराया और हमारी बात का ठुकराना अल्लाह की बात का ठुकराना है और अल्लाह की बात का ठुकराना शिर्क के बराबर है।

विलायत पोर्टल : फ़ोक़हा की जानशीनी इस मौक़े पर भी अल्लाह ने इंसानों के लिए किसी तरह के बहाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा है, बल्कि इमाम ज़माना अ.स. द्वारा फ़ोक़हा को जानशीन बना कर हर तरह से हुज्जत ख़त्म कर दी, इमाम ज़माना अ.स. ने उलमा की पैरवी को वाजिब क़रार देते हुए फ़रमाया कि यह उलमा मेरी तरफ़ से तुम लोगों पर हुज्जत हैं और मैं अल्लाह की तरफ़ से उन उलमा पर हुज्जत हूं, इमाम अ.स. के इस फ़रमान के बाद अब यह बहाना भी नहीं बचता कि हम अहकाम किस से हासिल करें, इमाम अ.स. ख़ुद ग़ैब में हैं उनकी पैरवी कैसे मुमकिन है इन जैसे सभी सवालों का जवाब इमाम अ.स. के इस फ़रमान में है जिसका ऊपर ज़िक्र किया गया जिसमें फ़ोक़हा को अपना जानशीन कहा है।
इमामत के जानशीन होने की सूरत में फ़ोक़हा के पास भी तीन अहम ज़िम्मेदारियां होंगी,
1- अहकाम की तबलीग़,
2- लोगों के बीच फ़ैसला,
3- हुकूमत और विलायत।
 फ़ोक़हा की तीन अहम ज़िम्मेदारी
1- अहकाम की तबलीग़- इस बारे में सभी फ़ोक़हा एकमत हैं कि इमाम अ.स. की ग़ैबत में इस्लामी अहकाम का क़ुर्आन की आयतों और पैग़म्बर स.अ. और मासूम इमामों अ.स. की हदीसों से निकाल कर लोगों के लिए बयान करना फ़ोक़हा की ज़िम्मेदारी है, और फ़ोक़हा की इस ज़िम्मेदारी में किसी तरह का कोई शक नहीं है कि उन्हें अहकाम को आयतों और हदीसों से निकाल कर लोगों तक पहुंचाने में इमाम अ.स. की जानशीनी हासिल है, इसी जानशीनी की बुनियाद पर ग़ैबते कुबरा से ले कर आज तक तक़लीद का सिलसिला जारी है और इसमें किसी तरह का मतभेद भी नहीं पाया जाता है। फ़र्क़ केवल यह है कि मासूम इमाम अ.स. के पास इल्मे लदुन्नी होता है वह लौहे महफ़ूज़ को देखता और पढ़ता है इसलिए उनके बयान किए गए अहकाम यक़ीनी तौर पर अल्लाह के हुक्म होते हैं लेकिन फ़क़ीह का इल्म ज़न्नी (यक़ीन से कम दर्जे का इल्म) होता है। इमाम मासूम अ.स. और इल्मे लदुन्नी रखने वाले की जानशीनी किसी ग़ैर मासूम के हवाले कैसे की जाए? इस मुश्किल को हल करने के लिए फ़क़ीह के लिए आदल और आलम (यानी सबसे ज़्यादा अद्ल और इल्म रखने वाला) होने की शर्त रखी गई है, जानशीन को आदल होना चाहिए ताकि अदालत के उच्च मर्तबे पर पहुंच कर इसमत से क़रीब कहलाए, इसी तरह फ़क़ीह को आलम होना चाहिए ताकि अल्लाह के अहकाम को क़ुर्आनी आयतों और मासूमीन अ.स. की हदीसों से समझने मे महारत रखता हो, संक्षेप में इतना समझ लीजिए कि इल्म और अमल दोनों में यह मासूम अ.स. से क़रीब हो।
2- फ़ैसला- इमामत की अहम ज़िम्मेदारियों में से एक अहम ज़िम्मेदारी फ़ैसला करना है, सभी फ़ोक़हा इस बात पर एकमत हैं कि फ़क़ीह होने की सभी शर्तें रखने वाले को फ़ैसले करने का हक़ हासिल है, बल्कि ग़ैबत के दौर में फ़ैसला करने का हक़ केवल उसी फ़क़ीह को हासिल है जिसमें बताई गई सभी शर्तें पाई जाती हों या जिसको वह अनुमति दे वह कर सकता है।
3- हुकूमत और विलायत- इमामत की तीसरी अहम ज़िम्मेदारी इस्लामी समाज की सरपरस्ती है जिसके लिए हुकूमत की ज़रूरत है, क्या इसमें भी फ़ोक़हा को जानशीनी हासिल है? इस मामले में फ़ोक़हा एकमत नहीं हैं। चूंकि हुकूमत का मतलब ही लोगों के माल और उनकी जान पर अधिकार रखना होता है इसलिए मन में यह शंका पैदा होती है कि क्या ग़ैर मासूम फ़क़ीह दूसरों पर उनसे से ज़्यादा हक़ रख सकता है? ग़ैर मासूम दूसरे की जान माल पर अधिकार रख सकता है? इसी शंका और संदेह की बुनियाद पर कुछ लोगों ने विलायते फ़क़ीह का इंकार किया है और जो फ़ोक़हा विलायते फ़क़ीह को मानते हैं वह फ़क़ीह के अधिकारों को ले कर एकमत नहीं हो पाते।
विलायते फ़क़ीह पर दलील इमाम ख़ुमैनी र.ह. फ़रमाते हैं कि विलायते फ़क़ीह कोई ऐसा विषय नहीं है जिसके लिए दलीलों की ज़रूरत हो बल्कि इंसान अगर सही दिशा में रहते हुए इस मामले पर ध्यान दे तो वह विलायते फ़क़ीह की पुष्टि किए बिना नहीं रह सकता, अगर किसी को थोड़ी बहुत भी इस्लामी अहकाम की जानकारी हो तो वह विलायते फ़क़ीह को माने बिना नहीं रह सकता, आज अगर विलायते फ़क़ीह को दलीलों द्वारा साबित करने की ज़रूरत पड़ती है तो उसकी वजह मुसलमानों और हौज़-ए-इल्मिया के अंदरूनी हालात हैं जो एक बहुत लंबा इतिहास है।
 विलायते फ़क़ीह पर दो तरह से दलीलें दी जा सकती हैं
1- हदीसें, 2- अक़्ली दलील।
हदीसें
1- इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि अहकाम और इस्लामी मामलात के जारी करने का ज़िम्मा इलाही उलमा पर हैं जो हलाल और हराम के आलिम और अमानतदार हैं। (मुस्तदरकुल वसाएल, बाब 11, हदीस 16)
2- उलमा नबियों के वारिस हैं। (उसूले काफ़ी, जिल्द 1, पेज 34)
3- इस ज़माने में फ़क़ीह की वही हैसियत है जो बनी इस्राईल के नबियों की थी। (बिहारुल अनवार, जिल्द 78, पेज 346)
4- इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. की तफ़सीली हदीस के आख़िर में इस तरह नक़्ल हुआ है कि, जो हमारे हलाल व हराम और अहकाम के बारे में जो साहेबे नज़र हो तुम अपने मामलात उनके हवाले कर देना और उसके फ़ैसले पर राज़ी हो जाना क्योंकि मैंने ऐसे शख़्स को तुम्हारे ऊपर हाकिम क़रार दिया है और अगर उसके हुक्म का इंकार किया तो समझो अल्लाह के हुक्म का अपमान किया और हमारी बात को ठुकराया और हमारी बात का ठुकराना अल्लाह की बात का ठुकराना है और अल्लाह की बात का ठुकराना शिर्क के बराबर है। (वसाएलुश-शिया, जिल्द 18, पेज 98)
5- इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं उलमा लोगों पर हाकिम हैं। (मुस्तदरकुल वसाएल, बाब 11, हदीस 33) इनके अलावा भी बहुत सारी हदीसें हैं जिनके बारे में उलमा ने लिखा है कि यह विलायते फ़क़ीह पर दलालत करती हैं।

जारी है................
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