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Code : 193717
Date of publication : 13/5/2018 8:3
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विलायते फ़क़ीह (1)

अल्लाह की ओर से इंसानों की हिदायत के लिए जो तालीम और तरबियत का मासूम सिलसिला हज़रत आदम अ.स. से शुरू हुआ था वह आज भी जारी है, ग़ैब में मौजूद इस हिदायत की कश्ती का नाख़ुदा अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर रहा है............. जब इंसानियत एक पल के लिए भी बिना रहनुमा, रहबर और हादी के नहीं रह सकती तो सवाल यह पैदा होता है कि ग़ैबत में जाने से पहले इमाम महदी अ.स. ने अपनी ज़िम्मेदारियों को किसी के हवाले किया या नहीं? अल्लाह के क़ानूनों को लोगों के लिए बयान करने वाला कोई ज़िम्मेदार है या नहीं?

विलायत पोर्टल : इस दुनिया में जिस चीज़ को भी अल्लाह ने पैदा किया है उसका उसका कोई न कोई मक़सद ज़रूर है तो कैसे मुमकिन है कि सबसे अफ़ज़ल मख़लूक़ इंसान बिना किसी मक़सद के पैदा हुई होगी, क़ुर्आन ने इस मक़सद को बयान किया है और उसका नाम हमेशा बाक़ी रहने वाली सआदत को हासिल करना बताया है।
इस सआदत तक बिना इबादत और बंदगी के पहुंचना मुमकिन नहीं है, इसीलिए अल्लाह ने अपनी हिकमत की बुनियाद पर वही (وحی) और इलहाम द्वारा अपने ख़ास बंदों के लिए कुछ क़ानून नाज़िल किए ताकि इंसान व्यक्तिगत और समाजिक ज़िंदगी में अपने मक़सद को हासिल कर सके, और अल्लाह के अलावा किसी और के बनाए हुए क़ानून इंसान को उस सआदत तक नहीं पहुंचा सकते। दीन की ज़बान में वही और इलहाम द्वारा पैग़ाम पहुंचाए जाने को नबुव्वत कहा जाता है, नबुव्वत का सिलसिला हज़रत आदम अ.स. से शुरू हो कर हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.अ. पर ख़त्म हुआ और बीच में समय और ज़रूरत के अनुसार क़ानून में बदलाव भी आया और बढ़ोत्तरी भी की जाती रही जो कई शरीयत के नाम से मशहूर हैं और फिर अंत में ग़दीर के दीन क़ानून और शरीयत के मुकम्मल होने की मोहर भी लग गई और इस्लाम को मुकम्मल और हमेशा बाक़ी रहने वाले दीन की हैसियतत हासिल हो गई और साथ ही नबुव्वत के सिलसिले के ख़त्म होने का ऐलान भी कर दिया गया यानी अब अल्लाह की ओर से कोई नया क़ानून आने वाला नहीं है बल्कि क़यामत तक इन्हीं क़ानून की सबके लिए तफ़सीर को बयान करते हुए इन्हें हर तरह की तहरीफ़ से बचाना है। और इस काम के लिए इमामत को चुना गया और यह सारी ज़िम्मेदारी इमामत के हवाले की गईं चूंकि इमामत, नबुव्वत के मिशन को आगे बढ़ाने वाली और नबुव्वत के कामों को अंजाम देने वाली है, इसलिए ज़रूरी है कि इसमें भी वही सिफ़ात पाए जाएं जो नबुव्वत में मौजूद थे।
नबुव्वत की चार अहम ज़िम्मेदारियां थीं..
1- वही द्वारा अहकाम हासिल करना
2- वही की तबलीग़, यानी लोगों तक अहकाम पहुंचाना और उनकी तौज़ीह बयान करना
3- फ़ैसला, यानी मतभेद के समय लोगों के बीच फ़ैसला कर के उनके मतभेद को ख़त्म करना
4- हुकूमत और विलायत, यानी इस्लामी समाज का नेतृत्व और उसकी रहबरी
दीन के मुकम्मल होने के बाद नबुव्वत का सिस्टम ख़त्म हो गया जिसका मतलब यह है कि अब किसी नए क़ानून के बढ़ाने और घटाने के लिए कोई वही आने वाली नहीं है, पैग़म्बर स.अ. द्वारा हलाल की हुई चीज़ें क़यामत तक हलाल और हराम की हुई चीज़ें क़यामत तक हराम हैं, लेकिन बाक़ी की तीनों ज़िम्मेदारियां इमामत के कांधों पर रहेगी।
हालांकि अधिकतर नबी (हालात की वजह से) हुकूमत क़ायम नहीं कर सके लेकिन अदालत और इंसाफ़ पर आधारित हुकूमत क़ायम करना उनकी ज़िम्मेदारियों में से था जिसको अल्लाह ने क़ुर्आन में साफ़ लफ़्ज़ों में बयान किया है हालांकि क़ुर्आन में अल्लाह ने हज़रत दाऊद अ.स. और हज़रत सुलैमान अ.स. की हुकूमत का ज़िक्र किया है और पैग़म्बर स.अ. ने भी इस्लामी हुकूमत क़ायम की।
ऊपर बयान की गई तफ़सील के बाद इमामत की तीन ज़िम्मेदारियां सामने आती हैं... पहली- अहकाम को लोगों तक पहुंचाना दूसरी- लोगों के बीच फ़ैसले करना तीसरी- हुकूमत और विलायत इमामत के लिए जो शर्तें बयान की गई हैं उनकी रौशनी में यह मक़ाम केवल मासूम इमामों को हासिल है जिनके नामों को ख़ुद पैग़म्बर स.अ. ने बयान फ़रमाया है।
अल्लाह की ओर से इंसानों की हिदायत के लिए जो तालीम और तरबियत का मासूम सिलसिला हज़रत आदम अ.स. से शुरू हुआ था वह आज भी जारी है, ग़ैब में मौजूद इस हिदायत की कश्ती का नाख़ुदा अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर रहा है (हालांकि ऊपर बयान की गई सभी बातों के लिए दलील चाहिए लेकिन चूंकि हम संक्षेप में बातों को बयान कर रहे हैं इसलिए दलीलों को फ़िल्हाल के लिए छोड़ रहे हैं क्योंकि हर शिया ऊपर बयान की गई बातों पर अक़ीदा रखता है और अल्हमदो लिल्लाह इल्मे कलाम ने दलीलों द्वारा इन सभी बातों को साबित किया है और तफ़सीली किताबें लिखी हैं)।
जब इंसानियत एक पल के लिए भी बिना रहनुमा, रहबर और हादी के नहीं रह सकती तो सवाल यह पैदा होता है कि ग़ैबत में जाने से पहले इमाम महदी अ.स. ने अपनी ज़िम्मेदारियों को किसी के हवाले किया या नहीं?
अल्लाह के क़ानूनों को लोगों के लिए बयान करने वाला कोई ज़िम्मेदार है या नहीं?
जिस तरह नबुव्वत की जानशीनी के तौर पर इमामत ज़रूरी थी इसी तरह इमामत का जानशीन होना ज़रूरी है या नहीं?
आज हम पूरे फ़िर्क़े से सवाल करते हैं कि पैग़म्बर स.अ. किसी को अपना जानशीन बना कर गए थे या नहीं? इसी तरह हमें अपने आप से सवाल करना चाहिए कि इमाम ज़माना अ.स. ने ग़ैबत में जाने से पहले किसी को अपना जानशीन बनाया था या नहीं?
इन सवालों की रौशनी में फ़ोक़हा की जानशीनी और उनकी विलायत की अहमियत ख़ुद ही सामने आ जाती है।
इंशा अल्लाह अगले भाग में आपके लिए फ़ोक़हा की जानशीनी और उनकी ज़िम्म्दारी वग़ैरह को बयान किया जाएगा।
जारी.........
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