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Code : 193120
Date of publication : 12/4/2018 21:44
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हज़रत अबू तालिब अ.स. और पैग़म्बर स.अ. की तरबियत

हक़ीक़त तो यह है कि हज़रत अबू तालिब अ.स. पर इमाम अली अ.स. के वालिद होने के कारण यह सारे आरोप लगाए जाते हैं, आपका जुर्म केवल यही है कि आप इमाम अली अ.स. के वालिद हैं और बनी उमय्या और उसके ज़ालिम हाकिम इमाम अली अ.स. के साये का भी विरोध करते हैं, उनकी केवल यही कोशिश है कि किसी भी तरह इस ख़ानदान की तौहीन करें और अपने बे बुनियाद आरोपों द्वारा हज़रत अबू तालिब अ.स. की 42 साल की मेहनत को बर्बाद कर दें।

हज़रत अबू तालिब अ.स. पैग़म्बर स.अ. के चचा और इमाम अली अ.स. के वालिद हैं, आपकी शख़्सियत वह है जिसके बारे में पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: ऐ मेरे चचा! मेरे बचपन में आपने मेरी परवरिश की, यतीमी के समय सरपरस्ती की और जवानी में मेरा सहारा बने, अल्लाह आपकी इन मेहनतों के बदले नेक सिला दे। (अबू तालिब मज़लूमे तारीख़, पेज 1)
हज़रत अबू तालिब अ.स. मक्का और क़ुरैश के बुज़ुर्ग थे और आप अपनी ज़बान और ताक़त दोनों ही से पूरी तरह पैग़म्बर स.अ. का समर्थन करते यहां तक कि हर चीज़ में अपने बच्चों से ज़्यादा पैग़म्बर स.अ. का ख़्याल करते थे, जिस समय पैग़म्बर स.अ. का अपने कुछ साथियों के साथ समाजिक और आर्थिक बॉयकॉट किया गया और लोग दुश्मन बन गए तो आप रात में पैग़म्बर स.अ. के सोने के बाद उनके सोने की जगह बदल देते और उनकी जगह अपने बेटे इमाम अली अ.स. को लाकर लिटा देते थे ताकि रात में अगर कोई दुश्मन आप पर हमले का इरादा रखता हो तो आपकी जान बच जाए चाहे मेरा बेटा क़ुर्बान हो जाए। (अल-सहीह मिनस-सीरह, जिल्द 1, पेज 125)
और कुछ जगहों पर तो आपको ख़ुद खुल कर सामने आना पड़ा और पैग़म्बर स.अ. की जान को बचाने के लिए कुफ़्फ़ार का सामना करना पड़ा, आप ही का दबदबा था जिसके कारण कुफ़्फ़ार अपनी साज़िशों में नाकाम हो कर भाग जाते थे। (अल-सहीह मिनस-सीरह, जिल्द 1, पेज 125)
पैग़म्बर स.अ. वैचारिक समर्थन
कुछ लोगों का कहना है कि हज़रत अबू तालिब अ.स. द्वारा पैग़म्बर स.अ. का समर्थन केवल भावनात्मक था यानी क्योंकि पैग़म्बर स.अ. उनके भतीजे थे इसीलिए उस रिश्तेदारी की वजह से वह उनका समर्थन कर रहे थे, जबकि यह विचार रखने वाले इन बातों से बे ख़बर हैं कि....
 1- इंसान की भावनाएं अपनी औलाद से ज़्यादा जुड़ी होती हैं न कि अपने भाईयों की बच्चों से, जबकि हज़रत अबू तालिब अ.स. अपने बच्चों को पैग़म्बर स.अ. पर क़ुर्बान करने के लिए तैयार रहते थे, उन ख़तरनाक रातों में जिसमें पैग़म्बर स.अ. की जान पर ख़तरा बना रहता था उन रातों में पैग़म्बर स.अ. के सोने की जगह अपने बेटे इमाम अली अ.स. को सुलाते थे। (अल-सहीह मिनस-सीरह, जिल्द 1, पेज 127)
2- अगर भावनाएं और रिश्तेदारी समर्थन का कारण है तो पैग़म्बर स.अ. के दूसरे चचा अबू लहब समर्थन के बजाए क्यों पैग़म्बर स.अ. के हर काम में रुकावट बन रहे थे?
3- सभी बनी हाशिम पैग़म्बर स.अ. के क़बीले से थे और आप पर ईमान भी ले आए थे और हर मुश्किल पर साथ में सब्र कर रहे थे लेकिन जो क़ुर्बानी और जैसा समर्थन हज़रत अबू तालिब अ.स. का इतिहास में मौजूद है वैसा किसी का नहीं। इसलिए आपकी क़ुर्बानी और पैग़म्बर स.अ. के समर्थन के लिए किसी तरह की कोई दलील और किसी विश्लेषण की ज़रूरत नहीं है, पैग़म्बर स.अ. की विचारधारा ही इतनी मज़बूत और खरी थी कि जिसके बाद किसी भावना में बह कर समर्थन की ज़रूरत नहीं है।
हज़रत अबू तालिब अ.स. का ईमान
आपके ईमान पर पूरी पूरी किताबें मौजूद हैं जो आपको काफ़िर कहने वालों के मुंह पर ज़ोरदार तमांचा है, हम इस लेख में संक्षेप के साथ कुछ दलीलें अल-सहीह मिनस-सीरह नामी किताब से पेश कर रहे हैं।
1- पैग़म्बर स.अ. और दूसरे मासूम इमामों की ज़बानी वह जुमले जो हज़रत अबू तालिब अ.स. के ईमान के बारे में हैं वह सबसे बेहतरीन दलील आपके ईमान को साबित करने के लिए हैं।
2- ख़तरनाक परिस्तिथियों में आपका पैग़म्बर स.अ. का समर्थन करना और कठिन से कठिन समय में उनकी सुरक्षा करना आपके ईमान ही की मज़बूती के कारण है।
3- आपके वह अशआर जो आपने पैग़म्बर स.अ. और अपने और अल्लाह के बीच संबंध बताने के लिए कहे हैं वह भी आपके ईमान पर खुली दलील हैं।
4- आपका अपने बेटे जाफ़र और अपनी बीवी फ़ातिमा बिन्ते असद और अपने भाई हमज़ा से इस्लाम की पाबंदी और नमाज़ पढ़ने की ताकीद करना और पैग़म्बर स.अ. की हर परिस्तिथि में सुरक्षा का वादा लेना भी आपके ईमान की दलील है।
5- आपकी वफ़ात पर पैग़म्बर स.अ. का उदास होना और गहरा शोक जताना और उनकी मग़फ़ेरत के लिए दुआ करना भी आपके ईमान ही के कारण था।
6- अबू बक्र और इब्ने अब्बास का कहना है कि हज़रत अबू तालिब अ.स. अपनी ज़िंदगी के अंतिम क्षणों में ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदुर-रसूलुल्लाह पढ़ रहे थे।
7- पैग़म्बर स.अ. ने मिंबर से आपकी मग़फ़ेरत के लिए दुआ की और जनाज़े से साथ साथ क़ब्रिस्तान तक गए और इमाम अली अ.स. को हुक्म दिया कि वह ख़ुद ग़ुस्ल दें और अपने हाथों से कफ़न पहनाएं, केवल आप के जनाज़े पर हज़रत ख़दीजा स.अ. की तरह नमाज़ नहीं पढ़ी गई थी क्योंकि उस समय तक नमाज़े जनाज़ा का हुक्म नहीं आया था।
8- इमाम अली अ.स. ने आपकी वफ़ात के कई साल बाद माविया को लिखे जाने वाले ख़त में आपने इस तरह अबू तालिब (अ.स.) के अपने वालिद होने पर गर्व किया कि “ऐ माविया! मेरे वालिद अबू तालिब (अ.स.) और तेरे बाप अबू सुफ़यान में बहुत फ़र्क़ है।“
9- एक हदीस में मिलता है कि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: मैं क़यामत में अपने मां बाप और चचा अबू तालिब (अ.स.) की शफ़ाअत करूंगा, ज़ाहिर है पैग़म्बर स.अ. किसी बे ईमान या काफ़िर की शफ़ाअत नहीं कर सकते।
10- एक हदीस में है कि अल्लाह ने पैग़म्बर स.अ. को वही (وحی) द्वारा बताया कि उनके मां बाप और उनके परवरिश करने वाले पर जहन्नम की आग हराम है।
11- हज़रत फ़ातिमा बिन्ते असद स.अ. के ईमान में किसी को भी शक नहीं है, ज़ाहिर है अगर हज़रत अबू तालिब अ.स. मुसलमान न होते तो वह कभी एक काफ़िर के साथ शादी करने के लिए राज़ी न होतीं। (यह सभी दलीलें और तफ़सील के साथ अल-सहीह मिनस-सीरह किताब की जिल्द 1, पेज 134 से 142 तक में पढ़ी जा सकती हैं।
इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं: कि हज़रत अबू तालिब अ.स. इस्लाम के शुरूआती दौर में असहाबे कहफ़ की तरह अपने ईमान को छिपाते थे और वह ऐसा केवल पैग़म्बर स.अ. की सुरक्षा को लेकर करते थे।
उस समय इस्लाम को एक ऐसे समाजिक शख़्सियत की ज़रूरत थी जिसको हर समाज के लोग मानते हों तो अगर हज़रत अबू तालिब अ.स. अपने ईमान को ज़ाहिर कर देते तो कुफ़्फ़ार और दूसरे बहुत से लोग आपसे दूर हो जाते और पैग़म्बर स.अ. के मिशन को फ़ेल करने की हर कोशिश में लग जाते।
इन सभी दलीलों के बाद आपके ईमान में किसी तरह का कोई शक बाक़ी नहीं रह जाता और सच तो यह है कि अगर हज़रत अबू तालिब अ.स. की क़ुर्बनी का दसवां हिस्सा भी किसी ने क़ुर्बानी दी होती तो उसके लिए झूठी फ़ज़ीलतें भी गढ़ ली जातीं। और हक़ीक़त तो यह है कि आप पर इमाम अली अ.स. के वालिद होने के कारण यह सारे आरोप लगाए जाते हैं, आपका जुर्म केवल यही है कि आप इमाम अली अ.स. के वालिद हैं और बनी उमय्या और उसके ज़ालिम हाकिम इमाम अली अ.स. के साये का भी विरोध करते हैं, उनकी केवल यही कोशिश है कि किसी भी तरह इस ख़ानदान की तौहीन करें और अपने बे बुनियाद आरोपों द्वारा हज़रत अबू तालिब अ.स. की 42 साल की मेहनत को बर्बाद कर दें। (फ़रोग़े अबदिय्यत, जिल्द 1, पेज 298)
सऊदी अरब के क़तीफ़ शहर के एक आलिम ने हज़रत अबू तालिब अ.स. के ईमान पर अबू तालिब मोमिने क़ुरैश नाम की किताब लिखी जिसमें उन्होंने अहले सुन्नत की बड़ी और अहम किताबों से आपके ईमान और इस्लाम के लिए आपके दिल में पाए जाने वाले ख़ुलूस को साबित किया, लेकिन सऊदी की कोर्ट ने उनसे अपनी बात को वापस लेने को कहा लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया जिसके बाद उनको जेल में डाल दिया गया और कुछ ही दिन फांसी का हुक्म भी जारी कर दिया लेकिन लोगों के विरोध के चलते उनको आज़ाद करना पड़ा। (फ़रोग़े अबदिय्यत, जिल्द 1, पेज 285)
 या और भी इब्ने अबिल हदीद जैसे लोगों ने अपने अशआर में आपके ईमान को इस तरह बयान किया है कि अगर हज़रत अबू तालिब अ.स. और उनके बेटे इमाम अली अ.स. का ईमान और क़ुर्बानियां न होतीं तो इस्लाम अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो सकता था।
अगर आपके ईमान पर कोई एक भी दलील न हो फिर भी आपका वसीयतनामा आपके ईमान को साबित करने के लिए काफ़ी है, अल्लामा अमीनी र.ह. अपनी किताब अल-ग़दीर में लिखते हैं कि हज़रत अबू तालिब अ.स. ने ज़िंदगी के अंतिम समय में कहा कि ऐ बनी हाशिम! पैग़म्बर स.अ. की पैरवी करो उनकी बातों की पुष्टि करो ताकि कामयाब हो जाओ और हिदायत हासिल कर सको। फिर आपने कहा कि मोहम्मद (स.अ.) क़ुरैश के सबसे अमानतदार, पूरे अरब के सबसे सच्चे और हर फज़ीलत के मालिक हैं, लोगों के दिल उन पर ईमान रखते हैं लेकिन ज़बानें डर के कारण ख़ामोश हैं, मैं वह दिन देख रहा हूं जिस दिन कमज़ोर और समाज के दबे कुचले लोग उन पर ईमान लाएंगे और वह इन्हीं कमज़ोर और दबे कुचले लोगों की मदद से क़ुरैश के अहंकार को तोड़ देंगे, क़ुरैश के बे सहारा लोगों की मदद कर के वह उन्हें ताक़तवर बना देंगे, फिर आख़िर में कहा कि हमेशा उनसे मोहब्बत करना और उनके साथ रहने वालों का समर्थन करना। (अल-ग़दीर, जिल्द 7, पेज 3766-367)
इंसाफ़ से बताइए कि ऐसी वसीययत करने वाले इंसान को क्या मोमिन के अलावा कुछ और कहा जा सकता है....
इमाम बाक़िर अ.स. ने यूंही नहीं फ़रमाया कि हज़रत अबू तालिब की ईमान बहुत सारे लोगों के ईमान से बेहतर था, और इमाम अली अ.स. हुक्म देते थे कि उनकी तरफ़ से हज अंजाम दिए जाएं। (अल-ग़दीर, जिल्द 7, पेज 380) हज़रत अबू तालिब अ.स. को कैसे मोमिन न माना जाए जबकि तीन हज़ार से ज़्यादा उनके अशआर उनके ईमान को साबित कर रहे हैं। (अल-ग़दीर, जिल्द 7, पेज 341)
कैसे हज़रत अबू तालिब अ.स. के ईमान पर शक किया जा सकता है जबकि आपने हब्शा हिजरत करने वाले मुसलमानों को पनाह देने के लिए वहां के बादशाह को ख़त लिख कर 19 अशआर लिखे थे.....(अल-ग़दीर, जिल्द 7, पेज 331)
कैसे उस इंसान के ईमान पर शक किया जा सकता है जो पैग़म्बर स.अ. के बचपन से ही उन्हें अल्लाह की निगाह में इज़्ज़दार समझता हो, जैसाकि तारीख़ में मौजूद है कि एक बार लगभग दो साल से मक्के में बारिश नहीं हो रही थी, पैग़म्बर स.अ. उस समय तक मां की गोद में थे आपने उनको गोद में लिया और काबे की तरफ़ बुलंद कर के कहा: ख़ुदाया! इस बच्चे की बरकत से हम सबकी पानी की मुश्किल को दूर कर दे, अभी थोड़ी देर ही गुज़री थी कि लोगों ने देखा चारों ओर बादल छा गए और ऐसी मूसलाधार बारिश हुई कि लोगों को डर लगने लगा कि कहीं मस्जिद न गिर जाए, हज़रत अबू तालिब अ.स. ने जब उस बच्चे (पैग़म्बर स.अ.) की इस बरकत और फ़ज़ीलत को देखा तो उनकी शान में अशआर कहे। (अल-ग़दीर, जिल्द 7, पेज 346)


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