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Code : 193052
Date of publication : 10/4/2018 15:35
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सय्यद हसन नसरुल्लाह की ज़िंदगी पर एक निगाह (1)

सितम्बर 1997 में ज़ायोनी दरिंदों के हाथों दक्षिणी लेबनान के जबलुर-रफ़ीअ इलाक़े में हिज़्बुल्लाह के दो जियाले शहीद कर दिए और उनके ख़ून में लतपथ जिस्मों को इस्राईल ने बिना पहचाने अपने क़ब्ज़े में ले कर नेशनल टी वी पर दिखा दिया, लेकिन बहुत जल्द ही पहचान लिया गया कि उन दो शहीदों में से एक हिज़्बुल्लाब के जनरल सेक्रेटरी सय्यद हसन नसरुल्लाह का बेटा सय्यद हादी है, इस ख़बर ने लेबनान के लोगों को बहुत ज़्यादा प्रभावित कर दिया था क्योंकि लेबनान के इतिहास में अभी तक चाहे गृह युद्ध हो चाहे ज़ायोनियों के हमलों का मुंह तोड़ जवाब देने का समय हो किसी भी मौक़े पर किसी बड़े राजनीतिक या किसी बड़े पद पर पहुंचे हुए लीडर के बेटे को इस तरह देश की सीमा की रक्षा करते हुए शहीद होते हुए नहीं देखा गया था।
विलायत पोर्टल : सय्यद हसन नसरुल्लाह 31 अगस्त 1960 को दक्षिणी लेबनान के एक गांव अल-बुज़ूरिया में पैदा हुए, आपके वालिद अब्दुल करीम थे जिनकी सब्ज़ी और फलों की दुकान थी जिसमें आप उनका हाथ बटाने के लिए दुकान पर जाया करते थे, आपके वालिद की दुकान की दीवार पर इमाम मूसा सद्र की फोटो हमेशा लगी रहती थी, इमाम मूसा सद्र जिन्होंने दबे और कुचले हुए लोगों के दिलों में ज़ुल्म के विरुध्द प्रतिरोध की चिंगारी पैदा की थी जिसकी वजह से सय्यद हसन नसरुल्लाह के दिल में उनकी मोहब्बत काफ़ी ज़्यादा थी, हालांकि उस समय तक सय्यद हसन नसरुल्लाह ना ही किसी आलिम से जुड़े थे और ना ही आपका घराना बहुत मशहूर था लेकिन आप ख़ुद एक ऐसे दीनदार इंसान थे जिसकी दीनदारी केवल नमाज़ रोज़े तक सीमित नहीं थी बल्कि आप इससे बहुत आगे की सोंच और विचार रखते थे, आप अपने इन्हीं उच्च विचारों के चलते 1976 में नजफ़ गए ताकि अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें, लेकिन परिस्तिथियां कुछ ऐसी हुईं कि आप 1978 में लेबनान वापस आ गए और फिर वहीं अल-इमामुल मुन्तज़र नामी मदरसे जिसका निर्माण शहीद अब्बास मूसवी ने किया था उसी में पढ़ाई करने लगे और साथ ही अमल नामी संगठन में सक्रिय रहे और आख़िरकार आपकी सूझ बूझ को देखते हुए बेक़ाअ नामी इलाक़े में अमल संगठन की सभी राजनीतिक गतिविधियों का इंचार्ज आपको बना दिया गया।
हिज़बुल्लाह का गठन
लीबिया में इमाम मूसा सद्र के अपहरण के बाद अमल नामी संगठन में लीडर शिप को लेकर आपसी मतभेद शुरू हो गया जिसके कारण बहुत से लोग इस संगठन से निकल गए उसी के बाद हिज़बुल्लाह संगठन की बुनियाद डाली गई जिसमें सय्यद हसन नसरुल्लाह के कांधों पर कई ज़िम्मेदारियां आ गईं जिसमें हिज़बुल्लाह की लीडर शिप कमेटी की सदस्यता भी थी, लेकिन आपने अपनी पढ़ाई को जारी रखा और 1989 में एक बार फिर अपनी पढ़ाई को पूरी करने की नीयत से क़ुम ईरान चले गए, लेकिन अवैध राष्ट्र इस्राईल द्वारा लेबनान पर किए जाने वाले हमले और हिज़बुल्लाह द्वारा उनके प्रतिरोध ने आपको क़ुम में भी एक साल से अधिक समय तक रुकने नहीं दिया, आप ज़ायोनियों के ज़ुल्म का अपने भाईयों के साथ मिल कर मुक़ाबला करने के लिए वापस लेबनान आ गए।
सय्यद अब्बास मूसवी की शहादत
1992 में सय्यद अब्बास मूसवी की शहादत के बाद, हिज़बुल्लाह लेबनान की लीडर शिप कमेटी ने जनरल सेक्रेटरी के पद के लिए सय्यद हसन नसरुल्लाह को चुना, सय्यद अब्बास मूसवी की उनके परिवार समेत ज़ायोनियों द्वारा दर्दनाक हत्या ने लेबनान की जनता विशेष रूप से हिज़बुल्लाह को काफ़ी प्रभावित कर दिया था, और यही वह मोड़ था जिसके बाद हिज़बुल्लाह ने ज़ायोनियों के हमलों का मुंह तोड़ जवाब देना शुरू कर दिया और लेबनान की जनता ने भी हिज़्बुल्लाह पर भरोसा करते हुए उन्हें खुला समर्थन दिया, और फिर 1993 फिर 1996 में ज़ायोनी दरिंदों ने हताशा को मिटाने के लिए लेबनान की जतना पर वहशी हमले शुरू कर दिए लेकिन इस बार भी ज़ायोनियों को हिज़्बुल्लाह के न्यूनतम सैन्य सुविधाओं के साथ कड़े प्रतिरोध का समाना करना पड़ा।
बड़े बेटे की शहादत
सितम्बर 1997 में ज़ायोनी दरिंदों के हाथों दक्षिणी लेबनान के जबलुर-रफ़ीअ इलाक़े में हिज़्बुल्लाह के दो जियाले शहीद कर दिए और उनके ख़ून में लतपथ जिस्मों को इस्राईल ने बिना पहचाने अपने क़ब्ज़े में ले कर नेशनल टी वी पर दिखा दिया, लेकिन बहुत जल्द ही पहचान लिया गया कि उन दो शहीदों में से एक हिज़्बुल्लाब के जनरल सेक्रेटरी सय्यद हसन नसरुल्लाह का बेटा सय्यद हादी है, इस ख़बर ने लेबनान के लोगों को बहुत ज़्यादा प्रभावित कर दिया था क्योंकि लेबनान के इतिहास में अभी तक चाहे गृह युद्ध हो चाहे ज़ायोनियों के हमलों का मुंह तोड़ जवाब देने का समय हो किसी भी मौक़े पर किसी बड़े राजनीतिक या किसी बड़े पद पर पहुंचे हुए लीडर के बेटे को इस तरह देश की सीमा की रक्षा करते हुए शहीद होते हुए नहीं देखा गया था।
इस हादसे ने लेबनान की जनता में हिज़बुल्लाह के जनरल सेक्रेटरी सय्यद हसन नसरुल्लाह के लिए सहानुभूति, विश्वास, जोश और भावनाओं को बहुत ऊंचे पैमाने पर पहुंचा दिया था, हर दीन हर मज़हब के लोगों की ज़ुबान पर सय्यद हसन नसरुल्लाह के लिए दुआएं और उनके बेटे की शहादत पर दुख का इज़हार था, और इस हादसे के बाद लेबनान के बड़े बड़े राजनेताओं ने भी आपसे मुलाक़ात कर सहानुभूति जताई और इस दुख के समय में आपके साथ खड़े रहने की बात कही, लोगों की हमदर्दी और समर्थन केवल लेबनान तक सीमित नहीं रहा बल्कि हिज़बुल्लाह के इतिहास में पहली बार सऊदी अरब के बादशाह अब्दुल्लाह ने भी आपके बेटे की शहादत पर दुख ज़ाहिर करते हुए इस्लामी प्रतिरोध का समर्थन किया।
सन् 2000 और ऐतिहासिक जीत
सन् 2000 में जिस समय अमेरिका इस्राईल और अरफ़ात के बीच मिडिल ईस्ट के मुद्दों के हल के लिए बातचीत चल रही थी और अभी बात किसी नतीजे तक भी नहीं पहुंची थी कि हिज़्बुल्लाह के प्रतिरोध के चलते अवैध राष्ट्र इस्राईल ने दक्षिणी लेबनान के इलाक़ों से अपनी सेना पीछे हटाना शुरू कर दी, केवल मज़ारेअ और शबआ के इलाक़ों के अलावा सभी इलाक़ों से ज़ायोनी दरिंदे पीछे हट गए थे, हिज़बुल्लाह द्वारा इस्राईल की शर्मनाक हार ने इस्लामी प्रतिरोध को और ताक़त दी और सय्यद हसन नसरुल्लाह के नेतृत्व में ऐसी कामयाबी मिली जो इस से पहले पूरे अरब में किसी को नहीं मिली थी और इसी कामयाबी के बाद आपको पूरे अरब की सबसे अहम शख़्सियत समझा जाने लगा। दूसरी तरफ़ से हिज़बुल्लाह ने अपनी इस ऐतिहासिक कामयाबी से अनुभव लेते हुए लेबनान के राजनीतिक मैदान में भी पैर जमाने शुरू कर दिए और देखते ही देखते लेबनान की जनता का यहां तक विश्वास जीत लिया कि पार्लियामेंट से ले कर मंत्रालय तक में हिज़्बुल्लाह के सदस्य को जगह दी।
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