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Code : 192807
Date of publication : 27/3/2018 4:45
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इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के दौर के राजनीतिक और समाजिक हालात

मामून के इस मक़सद को हासिल करने में सबसे बड़ी रुकावट इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. थे, लेकिन इमाम अ.स. ने अल्लाह की मदद से मामून और उसके दरबारी उलमा के हर सवाल का जवाब दे कर उसकी हर साज़िश को नाकाम कर दिया और शिया मज़हब की सच्चाई और उसकी हक़्क़ानियत को साबित कर दिया।

विलायत पोर्टल : आपका नाम मोहम्मद और मशहूर लक़ब तक़ी और जवाद है, आपकी विलादत 10 रजब सन् 195 हिजरी में हुई, आपने सबसे कम उम्र में इमामत जैसे अहम पद को संभाला जिस समय आपने इमामत की ज़िम्मेदारी को संभाला आपकी उम्र केवल आठ साल की थी। आपकी इमामत के शुरूआत में हालांकि कुछ अहलेबैत अ.स. के शिया हुकूमत की ज़िम्मेदारी संभाले हुए थे लेकिन राजनीतिक और समाजिक हालात बहुत ख़राब थे, विशेष कर अक़ीदों को ले कर लोग आपस में एक दूसरे से दुश्मनी किए बैठे हुए थे।
आपकी इमामत के दौरान दो ज़ालिम अब्बासी हाकिमों की हुकूमत थी जिनमें से एक मामून जो ख़ुद को अहलेबैत अ.स. का शिया ज़ाहिर करता था लेकिन यही वह ज़ालिम था जिसने आपके वालिद इमाम रज़ा अ.स. को शहीद किया, और दूसरा मोतसिम जिसने इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. को शहीद किया था।
मामून जिसका असली चेहरा इमाम रज़ा अ.स. की शहादत के बाद लोगों के सामने लगभग ज़ाहिर हो चुका था और उसकी हुकूमत भी कमज़ोर हो रही थी लोगों का भरोसा टूटने लगा था इसलिए उसने इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. को ज़्यादा तकलीफ़ न देने ही में अपनी भलाई समझी और चूंकि इमाम अ.स. के चाहने वाले आस पास के कई इलाक़ों में हुकूमत के अहम पदों पर थे इसलिए वह हालात को सही दिखाने का दिखावा करता रहा, और इमाम अ.स. के चाहने वाले जो आस पास के इलाक़ों में हुकूमत के पदों पर थे उन सभी पर नज़र रखने के लिए उसने इमाम रज़ा अ.स. की तरह आपको भी अपना उत्तराधिकारी बनने को कहा, इमाम अ.स. ने भी अपने वालिद की तरह इस शर्त के साथ क़ुबूल कर लिया कि वह हुकूमत के मामलात में कोई दख़ल नहीं देंगे, और इमाम अ.स. की यही शर्त मामून की हुकूमत और ख़िलाफ़त के बातिल होने के लिए काफ़ी है, इमाम अ.स. ने यह शर्त लगा कर मामून की मक्कारी को सारे लोगों के लिए ज़ाहिर कर दिया, क्योंकि मामून के दामन पर आपके वालिद इमाम रज़ा अ.स. के क़त्ल का धब्बा था जिसे वह इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. को उत्तराधिकारी बना कर साफ़ करना चाहता था लेकिन इमाम अ.स. ने हुकूमत के मामलात में किसी तरह के दख़ल न देने की शर्त लगा कर उसकी मक्कारी और साज़िश को नाकाम कर के दुनिया के सामने उसका चेहरा और साफ़ कर दिया कि इसको न हमसे हमदर्दी है और न हमारे घराने से, बल्कि यह हमारे वालिद का क़ातिल है और मुझे उत्तराधिकारी बना कर हमारे चाहने वालों की निगाहों में अच्छा बन कर उनका समर्थन हासिल कर मेरे वालिद के क़त्ल से अपने आपको अलग दिखाना चाहता है।
शियों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा उस समय मोतज़ेला के बढ़ते हुए विचार और तेज़ी से फैलते हुए उनके अक़ीदे और उनका मज़हब था, हुकूमत का मोतज़ेला फ़िर्क़े को पूरा समर्थन था जिसके चलते वह अपनी गतिविधियों को तेज़ी से आगे बढ़ा रहे थे, वह लोगों को दीनी अहकाम और दीनी मामलात को अक़्ल के अनुसार समझने की दावत दे रहे थे यानी जो चीज़ अक़्ल के हिसाब से साबित हो वही सही और मानने के क़ाबिल है उसके अलावा हर अक़ीदा बेकार है, और चूंकि उनको अपनी अक़्लों के हिसाब से इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. का इतनी कम उम्र में इमामत की ज़िम्मेदारी को संभालना समझ में नहीं आ रहा था इसीलिए वह सख़्त से सख़्त सवालों को तैयार करते ताकि इमाम अ.स. उन सवालों के जवाब न दे सकें और वह अपनी सोंच के हिसाब से इमाम अ.स. को इल्मी और राजनीति के मैदान में हरा सकें, लेकिन इमाम अ.स. उनके हर सवाल का दलीलों के साथ इल्मी जवाब देते जिससे वह ला जवाब हो जाते, इमाम अ.स. ने उनके हर सवाल का जवाब दे कर न केवल उनका मुंह बंद किया बल्कि इमामत की सही परिभाषा भी बताई और साबित किया कि इमामत दुनिया के पदों की तरह नहीं जिस पर हर किसी को बिठा दिया जाए बल्कि यह एक अल्लाह का बनाया हुआ पद है जिसपर बैठने वाले को वह ख़ुद अपनी मर्ज़ी से चुनता है, उसके लिए उम्र का कम होना या ज़्यादा होना शर्त नहीं है बल्कि अल्लाह इमामत के लिए ख़ुद चुनता है वह जिसके अंदर क़ाबिलियत देखता है उसी को यह ज़िम्मेदारी देता है।
इस दौर की एक और सबसे बड़ी मुश्किल अक़ीदे की आड़ में अब्बासी ख़लीफ़ा मामून और मोतसिम का लोगों को धोखा देना था, इतिहास गवाह है कि मामून अब्बासी ख़ानदान का सबसे बड़ा मक्कार और मुनाफ़िक़ था जिसने शिया अक़ीदे को ग़लत और बातिल साबित करने के लिए हर कोशिश कर डाली ताकि शिया मज़हब और इमाम अ.स. को ग़लत साबित कर सके, ज़ाहिर है मामून इसीलिए बड़े बड़े मुनाज़ेरे करवा रहा था ताकि इमाम अ.स. को हरा कर शिया मज़हब के हक़ होने और इमाम अ.स. की इमामत को सबके सामने बातिल ऐलान कर दे, मामून चाह रहा था कि इल्मी मैदान में इमाम अ.स. को हरा कर हमेशा हमेशा के लिए इमामत का सिलसिला ख़त्म कर दिया जाए चूंकि जब इमाम अ.स. हार जाएंगे तो लोगों का भरोसा ख़त्म हो जाएगा और इमाम का अल्लाह की तरफ़ से चुने जाने जैसी सच्चाई भी हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी यानी जो इमाम अ.स. गुज़र चुके हैं उनको भी बातिल ठहरा दे और आज के बाद से इमामत का सिलसिला भी ख़त्म हो जाए, मामून के इस मक़सद को हासिल करने में सबसे बड़ी रुकावट इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. थे, लेकिन इमाम अ.स. ने अल्लाह की मदद से मामून और उसके दरबारी उलमा के हर सवाल का जवाब दे कर उसकी हर साज़िश को नाकाम कर दिया और शिया मज़हब की सच्चाई और उसकी हक़्क़ानियत को साबित कर दिया।
आपने अब्बासी हुकूमत का रवैया और उनके राजनीतिक हथकंडों को देखते हुए अपने चाहने वालों से वकीलों द्वारा मुलाक़ात शुरू कर दी ताकि शियों की समस्याओं को भी हल करते रहें और उनकी जान भी बची रहे। जैसाकि रिवायतों में है कि इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. ने अपने वकीलों को अनुमति दी थी कि वह अपनी पहचान छिपा कर हुकूमत के संवेदनशील पदों तक पहुंचें और इसी तरह कुछ वकील दूसरे शहरों के हाकिम बनें ताकि राजनीतिक और समाजिक हालात पर नज़र रखी जा सके, इमाम अ.स. के दौर में बहुत से गुमराह अक़ीदे ऐसे थे जो पहले से ही लोगों के दिलों में जगह बनाए चले आ रहे थे लेकिन इमाम अ.स. ने उन सभी गुमराह और ग़लत अक़ीदों को सही समय पर इस तरह लोगों के लिए बयान किया जिससे सही और ग़लत अक़ीदों का फ़र्क़ साफ़ हो गया। इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. उन सभी फ़िर्क़ों जो मुसलमानों के बीच ग़लत और गुमराह करने वाले अक़ीदे फैला रहे थे आप मुसलमानों को उनके बारे में बताते जैसाकि अहले हदीस जो अल्लाह के जिस्म होने को लेकर ग़लत अक़ीदा फैला रहे थे कि अल्लाह हमारी तरह जिस्म रखता है वग़ैरह, इमाम अ.स. ऐसे लोगों के बारे में अपने चाहने वालों से फ़रमाते थे कि अल्लाह के बारे में ऐसा अक़ीदा रखने वालों के पीछे ना ही नमाज़ पढ़ना सही है और ना ही उनको ज़कात देना सही है।
इसी तरह शिया फ़िर्क़े से अलग होने वाला एक फ़िर्क़ा वाक़फ़िया है यह वह लोग थे जो केवल इमाम मूसा काज़िम अ.स. तक इमामत के सिलसिले को मानते थे और इमाम अली रज़ा अ.स. को इमाम नहीं मानते थे। या इसी तरह एक फ़िर्क़ा ज़ैदिया था यह लोग इमाम सज्जाद अ.स. के बाद उनके बेटे हज़रत ज़ैद को इमाम मानते थे और यह फ़िर्क़ा न केवल इमाम बाक़िर अ.स. और दूसरे इमामों को इमाम नहीं मानता था बल्कि यह लोग इमामों की शान में गुस्ताख़ी भी करते थे इसीलिए इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. ने इन दोनो फ़िर्क़ों (वाक़फ़िया और ज़ैदिया) को नासबी बताया है।
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