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Date of publication : 26/3/2018 15:44
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शैख़ तूसी र.ह. की ज़िंदगी पर एक निगाह

ख़्वाजा नसीरुद्दीन तूसी र.ह. लिखते हैं कि आप रातों को जाग कर किताबें पढ़ते रहते थे, आपके चारें तरफ़ अलग अलग विषयों की अनेक किताबें रखी रहती थीं आप जब किसी एक विषय को पढ़ते पढ़ते थक जाते थे तो किसी दूसरे विषय की किताब उठा कर पढ़ने लगते थे, आप जब रात में किताबें पढ़ते तो आपके पास हमेशा पानी का एक बर्तन रखा रहता ताकि जैसे ही नींद आए पानी द्वारा नींद को दूर किया जा सके और फिर सुबह जब आप किताबों द्वारा अलग अलग इल्मी मुश्किलों को हल कर के उठते तो आवाज़ देते कहां हैं वह बादशाह और उनकी औलादें..... वह क्या जानें इस मज़े और सुकून को।

विलायत पोर्टल :  शैख़ अबू जाफ़र मोहम्मद इब्ने हसन इब्ने अली इब्ने हसन तूसी जो कि शैख़ुत-ताएफ़ा के नाम से मशहूर थे, आप रमज़ानुल मुबारक 385 हिजरी में इमाम रज़ा अ.स. के शहर तूस में पैदा हुए, आप ने शुरूआती तालीम अपने शहर में ही हासिल की।
आपने 23 साल की उम्र में शैख़ मुफ़ीद र.ह. और सय्यद मुर्तज़ा र.ह. जैसे बुज़ुर्ग उलमा और मराजे से इल्म हासिल करने का इरादा किया और आप तूस से बग़दाद पहुंच गए, आपने शैख़ मुफ़ीद र.ह. के पास 5 साल इल्म हासिल किया और आपने इतने कम समय में उनका भरोसा भी हासिल कर लिया था, 413 हिजरी में शैख़ मुफ़ीद र.ह. के इंतेक़ाल के बाद सय्यद मुर्तज़ा र.ह. के हाथ में दीनी, मज़हबी और इल्मी बागडोर आई, आप शैख़ मुफ़ीद र.ह. की वफ़ात के बाद सय्यद मुर्तज़ा र.ह. के पास इल्म हासिल करने के लिए चले गए और फिर 436 हिजरी तक यानी लगभग 23 साल सय्यद मुर्तज़ा र.ह. से इल्मे कलाम, तफ़सीर, लुग़त, अदब, फ़िक़्ह और उसूले फ़िक़्ह पढ़ते रहे।
आपने अपनी प्रतिभा, मेहनत और लगन से बहुत ही कम समय में इल्मी दुनिया मे ऊंचा मर्तबा हासिल कर लिया था और जवानी ही में इज्तेहाद की मंज़िल पर पहुंच गए थे, और कुछ ही दिनों में आपको बग़दाद शहर के हौज़े का अहम रुक्न माना जाने लगा, और फिर आपको आपके दोनों उस्ताद के बाद इल्म और अमल के मैदान का इकलौता मुजाहिद कहा जाने लगा, आपकी महानता और आपके इल्मी मर्तबे की वजह से उस दौर के सभी दीनी उलमा और फ़ुक़्हा आपका सम्मान करते थे और यह आपका इल्मी मर्तबा ही था कि आपकी वफ़ात के 100 साल बाद तक वह आपके विचारों और नज़रयों के आधार पर फ़तवा देते थे। पांचवी सदी हिजरी के बीच में तुग़रल बेक सलजूक़ी जो एक कट्टर सुन्नी बादशाह था उसने बग़दाद पर हमला कर आले बूयह को ख़त्म करने की साज़िश तैयार की, तुग़रल ने 449 हिजरी तक कई बार शैख़ तूसी र.ह. की लाइब्रेरी और उनकी किताबों को कई बार पूरे शहर के सामने जला कर राख कर दिया, तुग़रल द्वारा ऐसे रवैये ने न केवल उलमा और फ़ुक़्हा को तकलीफ़ पहुंचाई बल्कि आम शियों के लिए भी जीना मुश्किल हो गया और फिर यही हालात कारण बने कि शैख़ बग़दाद से नजफ़ शहर आ गए।
उस समय नजफ़ एक छोटा मोहल्ला था, इमाम अली अ.स. की जियारत को आने वाले कुछ ज़ाएरीन ही वहां बसे थे, शैख़ तूसी र.ह. के नजफ़ आने के बाद आपके शागिर्द और दूसरे कुछ उलमा भी नजफ़ आ कर बस गए, आप अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव तक नजफ़ ही में रहे और बहुत क़ीमती किताबें इस्लामी जगत के लिए लिखी जिनसे आज भी हज़ारों उलमा फायदा उठा रहे हैं।
आपके कई उस्ताद थे, कुछ लोगों ने उनकी तादाद 37 बताई है जिनमें से अहम यह लोग हैं, इब्ने हाशिर, इब्ने अब्दून, इब्ने सलत अबवाज़ी, इब्ने ग़ज़ाएरी, शैख़ मुफ़ीद, सय्यद मुर्तज़ा, इब्ने सफ़्फ़ार, अबू तालिब इब्ने ग़रूर, क़ाज़ी अबू तय्यब हुवैरी।
आपके शागिर्दों की तादाद बहुत अधिक है जिनमें से कुछ अहम शागिर्दों के नाम यहां पर ज़िक्र किए जा रहे हैं, शहीद शैख़ मोहम्मद इब्ने फ़त्ताल नेशापूरी, शैख़ हसम इब्ने हुसैन इब्ने बाबवैह क़ुम्मी, शैख़ हुसैन इब्ने फ़त्ह वाएज़ जुर्जानी, शैख़ हसन इब्ने मुज़फ़्फ़र हमदानी, शैख़ हसन इब्ने महदी सलीक़ी, सय्यद नासिर इब्ने रज़ा हुसैनी, शैख़ अबू फ़त्ह मोहम्मद कराजकी, शैख़ मोहम्मद इब्ने अली तबरी, शैख़ मंसूर इब्ने हसन आबी, शैख़ अबू ख़ैर असदी, शैख़ सअदुद्दीन इब्ने बर्राज वग़ैरह..... आपके बारे में बुज़ुर्ग उलमा के बहुत सारे अक़वाल मिलते हैं जिनमें से कुछ को हम यहां बयान कर रहे हैं।
अल्लामा हिल्ली र.ह. लिखते हैं कि शैख़ तूसी र.ह. शिया उलमा के बुज़ुर्गों में से हैं और मकतबे इमामिया की अहम शख़्सियत हैं, आप इल्मे हदीस, इल्मे रेजाल, इल्में फ़िक़्ह, इल्मे उसूल और इल्मे कलाम में ख़ुद अपना नज़रिया बयान करते थे।
अल्लामा बहरुल उलूम र.ह. लिखते हैं कि शिया फ़िक्ह का परचम बुलंद करने वाले और इमामों के बाद शिया फ़िर्क़े के बुज़ुर्गों में आपका शुमार होता था, आप सभी दीनी उलूम में लोगों की उम्मीद थे।
ख़्वाजा नसीरुद्दीन तूसी र.ह. लिखते हैं कि आप रातों को जाग कर किताबें पढ़ते रहते थे, आपके चारें तरफ़ अलग अलग विषयों की अनेक किताबें रखी रहती थीं आप जब किसी एक विषय को पढ़ते पढ़ते थक जाते थे तो किसी दूसरे विषय की किताब उठा कर पढ़ने लगते थे, आप जब रात में किताबें पढ़ते तो आपके पास हमेशा पानी का एक बर्तन रखा रहता ताकि जैसे ही नींद आए पानी द्वारा नींद को दूर किया जा सके और फिर सुबह जब आप किताबों द्वारा अलग अलग इल्मी मुश्किलों को हल कर के उठते तो आवाज़ देते कहां हैं वह बादशाह और उनकी औलादें..... वह क्या जानें इस मज़े और सुकून को।
इमाम ख़ुमैनी र.ह. लिखते हैं कि शैख़ तूसी र.ह. 52 साल की उम्र में भी अपने उस्ताद के पास पढ़ने जाया करते थे जबकि 23 साल की उम्र में वह ख़ुद किताबें लिख रहे थे जैसाकि तहज़ीबुल अहकाम (जो हमारी 4 अहम और भरोसेमंद किताबों में से एक है) जैसी किताब इसी उम्र में लिखी।
 आपकी वफ़ात 72 साल की उम्र में 22 मोहर्रम 460 हिजरी को नजफ़ में हुई, और आपकी वसीयत के अनुसार आपको आपके घर में दफ़्न कर दिया गया जो इस समय इमाम अली अ.स. के रौज़े के उत्तरी हिस्से में है और मस्जिदे तूसी के नाम से मशहूर है।
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