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Date of publication : 25/3/2018 18:18
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अमेरिका के जंगी जहाज़ बेचने की अजीब घटना

उस समय ईरान और अमेरिका का एक ज्वाइंट अकाउंट था, मैं जब रक्षा मंत्रालय में ख़िदमत कर रहा था तब यह बात मुझे पता चली थी, फिर मैं F.M.S. नाम की कमेटी गया वहां इसका पता लगाया, जिसका आज तक कोई जवाब नहीं आया, उस ज्वाइंट अकाउंट में ईरानी हुकूमत पैसा जमा तो करती थी लेकिन पैसे निकालने का हक़ केवल अमेरिका का था।

विलायत पोर्टल :  उस समय अमेरिका अपने जंगी जहाज़ और कुछ दूसरे सामान हमारे हाथों बेचा करता था, लेकिन उनके मरम्मत की हमें अनुमति नहीं देता था, हालांकि उसके इस व्यापार के बड़े अजीब अजीब क़िस्से हैं, उस समय ईरान और अमेरिका का एक ज्वाइंट अकाउंट था, मैं जब रक्षा मंत्रालय में ख़िदमत कर रहा था तब यह बात मुझे पता चली थी, फिर मैं F.M.S. नाम की कमेटी गया वहां इसका पता लगाया, जिसका आज तक कोई जवाब नहीं आया, उस ज्वाइंट अकाउंट में ईरानी हुकूमत पैसा जमा तो करती थी लेकिन पैसे निकालने का हक़ केवल अमेरिका का था।
जब इंक़ेलाब कामयाब हुआ तो इस अकाउंट मे अरबों डॉलर थे, आज तक अमेरिका ने न तो हमारी बात का जवाब दिया और न ही वह पैसे लौटाए, और जब उस से ख़रीदे हुए जहाज़ ईरान आते और कुछ समय बाद जब मरम्मत की ज़रूरत पड़ती तो आप क्या सोंचते हैं कि यहां ईरान में कोई मरम्मत की जगह होगी....
बिल्कुल नहीं, जब भी कोई पार्ट ख़राब हो जाता था, उसे खोल कर निकालते (क्योंकि कुछ बड़े पार्ट होते और ख़ुद उसमें कई छोटे छोटे पार्ट होते थे) वह उस पार्ट को यहां खोलने के लिए बिल्कुल भी राज़ी नहीं होते, उस पार्ट को दूसरे जहाज़ से अमेरिका भेजते थे, वहां से वही पार्ट नया ख़रीद कर लाते थे।
हमारी जनता के साथ इस तरह व्यवहार करते थे, आज ईरान उनके जैसा हवाई जहाज़ बना रहा है, तो आज की स्तिथि उस समय से बहुत अलग है।
(12 मार्च 2001 में अमीर कबीर यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच आयतुल्लाह ख़ामेनई का बयान)
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