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Code : 192736
Date of publication : 21/3/2018 13:49
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इमाम अली नक़ी अ.स. के दौर के हाकिम और आपका राजनीतिक संघर्ष

इमाम अली नक़ी अ.स. किसी भी मौक़े को हाथ से नहीं जाने देते थे, आप जैसे ही मौक़ा मिलता था हुकूमत के ज़ुल्म और हाकिम का नाहक़ सत्ता पर क़ब्ज़ा करने जैसे मामलों को लोगों को सामने ज़ाहिर करते थे, और लोगों को हुकूमत का किसी भी काम में साथ देने और उनके साथ काम करने को मना करते थे, हालांकि सातवें इमाम हज़रत मूसा काज़िम अ.स. के ज़माने से इमामों ने कुछ ख़ास लोगों को हुकूमत की ओर से दिए जाने वाले पद को क़ुबूल करने की अनुमति दी थी, और इमामों ने ऐसा केवल इसलिए किया ताकि वह हुकूमत के पदों पर रहते हुए मुसलमानों की मदद कर सकें उनकी ज़रूरतों को सरकारी ख़ज़ाने जो आम लोगों का हक़ है वहां से पूरा कर सकें।

विलायत पोर्टल :  शियों के दसवें इमाम हज़रत अली नक़ी अ.स. हैं, आपका नाम अली, लक़ब नक़ी और हादी है, आपके वालिद इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. और वालिदा हज़रत समाना थीं, आपकी इमामत के दौरान बनी अब्बास के ख़लीफ़ा हुकूमत कर रहे थे, और इन्हीं ज़ालिम ख़ुलफ़ा ने आपको और आपके बेटे (इमाम हसन असकरी अ.स.) को ज़बर्दस्ती मदीने से सामरा बुला कर एक घर में क़ैद कर रखा था, आपको घर में क़ैद करने के बावजूद हुकूमत आप पर कड़ी निगरानी रखे हुए थी, आपने भी अपने वालिद की तरह बहुत कम उम्र में इमामत की ज़िम्मेदारी को संभाला, चूंकि इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. के कम उम्र में इमाम बनने पर लोग अपने सवाल का जवाब हासिल कर के संतुष्ट हो चुके थे इसलिए आपके कम उम्र में इमाम बनने पर किसी ने कोई सवाल नहीं किया।
आपके दौर के ख़ुलफ़ा
आपने अपनी 33 साल की इमामत के दौरान 6 अब्बासी ख़ुलफ़ा के दौर और उनके ज़ुल्म का सामना किया, और इनमें केवल मुन्तसिर ही ऐसा था जिसने अपने बाप मुतवक्किल के बाद अपने रवैये को उमर इब्ने अब्दुल अज़ीज़ की तरह थोड़ा नर्म ज़ाहिर किया लेकिन मुन्तसिर की हुकूमत केवल 6 महीने तक ही चल सकी, और उसके बाद मुस्तईन ने फिर अपने बुज़ुर्गों की सीरत पर अमल करते हुए लोगों ख़ास कर अहलेबैत अ.स. के चाहने वालों पर ज़ुल्म के पहाड़ तोड़ने शुरू कर दिए। इमाम अली नक़ी अ.स. की इमामत में हुकूमत की तरफ़ से अहलेबैत अ.स. के शियों पर बहुत ज़ुल्म हुआ, जिसकी वजह से हुकूमत के ख़िलाफ़ कई बार लोगों ने आवाज़ उठाई लेकिन इमाम अ.स. ने तक़य्या करते हुए किसी भी आवाज़ का समर्थन नहीं किया, क्योंकि हुकूमत यही चाह रही थी कि इमाम अ.स. भी इन लोगों का साथ दें ताकि उन लोगों के साथ इमाम अ.स. को भी शहीद किया जा सके।
इमाम अली नक़ी अ.स. की इमामत के दौरान बनी अब्बास के इन 6 ख़ुलफ़ा में से सबसे ज़्यादा अहलेबैत अ.स. से दुश्मनी रखने वाला मुतवक्किल था, इस इंसानियत के दुश्मन ने लगभग 15 साल हुकूमत की और दूसरे सभी हाकिमों से ज़्यादा दसवें इमाम अ.स. को तकलीफ़ देता रहा, मुतवक्किल ने 233 हिजरी में अपने जासूसों की मुख़बिरी के बाद इमाम अ.स. को मदीने से सामरा बुलवा लिया और फिर इमाम अ.स. ने लगभग 20 साल यानी अपनी शहादत तक सामरा ही में अब्बासी हुकूमत के ज़ुल्म को सहन करते हुए ज़िंदगी गुज़ारी।
दुश्मन की साज़िशों से मुक़ाबला
ज़ाहिर है इमाम अ.स. के कांधों पर पूरी उम्मत की ज़िम्मेदारी होती है, उम्मत के मामलों को कैसे भी हालात में हल करना और उनकी ज़रूरतों को पूरा करना इमाम अ.स. के अहम कामों में से होता है, इमाम अली अ.स. ने हुकूमत के अत्याचारों के बावजूद अपने मिशन को जारी रखा और अपने मिशन में हालात के हिसाब से और समय की ज़रूरत के अनुसार लोगों तक दीनी ज़रूरत पहुंचाने के लिए जिस रास्ते की ज़रूरत हुई उसे अपनाया, इमाम अली नक़ी अ.स. भी उसी सिलसिले की एक कड़ी हैं जिन्होंने समय और मुसलमानों दोनों की ज़रूरत को सामने रखते हुए हुकूमत की हर साज़िश को नाकाम किया और उनके ज़ुल्म को दुनिया के सामने ज़ाहिर किया।
तक़य्या
तक़य्या दीन की ऐसी ज़रूरत है जिसको हमारे चौथे इमाम अ.स. से ले कर ग्हयारवें इमाम अ.स. तक हर इमाम अ.स. ने इस्तेमाल किया, जब भी अहलेबैत अ.स. के शियों पर हुकूमत की तरफ़ से ज़ुल्म किए गए हैं तक़य्या की ज़रूरत उतनी ही ज़्यादा नज़र आती है, लेकिन इमामों ने शियों की जान को बचाने के लिए और हुकूमत की साज़िशों को नाकाम करने के लिए तक़य्या का सहारा लिया वरना तारीख़ गवाह है हाकिम कितना ही ज़ालिम क्यों न हो इमामों ने हर दौर में उसकी आंखों में आंख डाल कर बात की और उसके ज़ुल्म को बे नक़ाब किया है।
अब्बासी हुकूमत को किसी भी तरह का समर्थन नहीं
इमाम अली नक़ी अ.स. किसी भी मौक़े को हाथ से नहीं जाने देते थे, आप जैसे ही मौक़ा मिलता था हुकूमत के ज़ुल्म और हाकिम का नाहक़ सत्ता पर क़ब्ज़ा करने जैसे मामलों को लोगों को सामने ज़ाहिर करते थे, और लोगों को हुकूमत का किसी भी काम में साथ देने और उनके साथ काम करने को मना करते थे, हालांकि सातवें इमाम हज़रत मूसा काज़िम अ.स. के ज़माने से इमामों ने कुछ ख़ास लोगों को हुकूमत की ओर से दिए जाने वाले पद को क़ुबूल करने की अनुमति दी थी, और इमामों ने ऐसा केवल इसलिए किया ताकि वह हुकूमत के पदों पर रहते हुए मुसलमानों की मदद कर सकें उनकी ज़रूरतों को सरकारी ख़ज़ाने जो आम लोगों का हक़ है वहां से पूरा कर सकें।
वकालत की शुरूआत
इमाम अली नक़ी अ.स. की इमामत के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब आपके लिए अपने शियों से मुलाक़ात करना बहुत कठिन हो गया था, इसीलिए आपने उनकी समस्याओं को हल करने और उनकी ज़रूरतों को पूरा करने और उनको सवालों का जवाब देने के लिए वकालत का रास्ता चुना, यानी आपके बिल्कुल क़रीबी लोग अपनी वेशभूषा बदल कर लोगों से मिलते और उनकी समस्याओं, ज़रूरतों और सवालों को उनसे ले कर इमाम अ.स. तक पहुंचाते और फिर इमाम अ.स. से जवाब ले कर शियों तक पहुंचाते, इमाम अली नक़ी अ.स. अपने इस काम से वकालत के मामले को शियों के दिमाग़ में डालना चाहते थे ताकि आने वाले समय में जब इमाम महदी अ.स. ग़ैबत में रह कर लोगों की समस्याओं, सवालों और ज़रूरतों को अपने वकीलों द्वारा हल करें तो लोगों के लिए कोई नई चीज़ न हो।


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