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Code : 192725
Date of publication : 20/3/2018 11:20
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इमाम बाक़िर अ.स. का राजनीतिक संघर्ष (2)

इमाम अ.स. ने फ़रमाया अगर जन्नत में जाना पसंद नहीं तो जाओ क़ौम के मामलों के ज़िम्मेदार बन जाओ, क्योंकि कभी कभी ज़ालिम हाकिम मुसलमानों पर हुकूमत ही इसी लिए करता है ताकि उनका ख़ून बहा सके, तुम हुकूमत के एक छोटे पद को ही स्वीकार करने की बात कर रहे हो लेकिन फिर भी उन्हीं ज़ालिम हाकिमों के जुर्म और अपराध में शामिल रहोगे, ऐसा तो हो सकता है उनकी हुकूमत से तुमको थोड़ा सा भी फ़ायदा न मिले लेकिन उनकी जुर्म की दुनिया के हिस्सेदार ज़रूर कहलाओगे,
विलायत पोर्टल :  पिछले भाग में आपने पढ़ा कि इमाम बाक़िर अ.स. के दौर में कैसे कैसे ज़ालिम हाकिम थे और इमाम अ.स. और आपके शियों के लिए हालात कितने सख़्त थे, यहां तक कि इमाम अ.स. से मिलने पर पाबंदी थी, इमाम अ.स. को हर कुछ दिन पर पूछताछ कर के उनको तकलीफ़ देने और उनका ध्यान भटकाने की कोशिश में लगे हुए थे, ज़ाहिर है इमाम अ.स. अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते थे, ऐसे घुटन के माहौल में इमाम अ.स. ने दीन के अहकाम और इस्लामी वैल्यूज़ को बाक़ी रखने के लिए कई कामयाब रास्ते अपनाए जिनको हम इस भाग में आपके सामने पेश कर रहे हैं।
तक़य्या

तक़य्या की अहमियत के बारे में इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं कि तक़य्या मेरे और मेरे वालिद के दीन का हिस्सा है जो तक़य्या पर ईमान नहीं रखता उसका ईमान ही कामिल नहीं। (बिहारुल अनवार, जिल्द 75, पेज 431) तक़य्या करने की परिस्तिथियां भी बयान की गई हैं जैसे जान का ख़तरा, अपनी कमाई के लुटने का ख़तरा, इस्लामी वैल्यूज़ की नाबूदी का ख़तरा वग़ैरह... इन हालात में इंसान तक़य्या पर अमल करते हुए इन ख़तरों से ख़ुद को बचा सकता है। रिवायत में है कि हमरान ने इमाम बाक़िर अ.स. की इस हदीस को सुन कर आपसे सवाल किया कि आपका इमाम अली अ.स. और इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. के बारे में क्या कहना है? इमाम अ.स. ने फ़रमाया ऐ हमरान, अल्लाह ने उन लोगों के लिए उसी तरह ही शहादत लिखी थी और अल्लाह ने पैग़म्बर स.अ. द्वारा उन सभी घटनाओं का इल्म इन पाक हस्तियों तक पहुंचा दिया था इसलिए वह जानते हुए उन तमाम घटनाओं पर सब्र के साथ उसी राह में डटे हुए थे क्योंकि अल्लाह की यही मर्ज़ी थी। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 30)
इस्लामी हाकिमों को उनकी ज़िम्मेदारी बताना
 इमाम अ.स. की यही कोशिश थी कि वह इस्लामी हाकिमों को उनकी ज़िम्मेदारी याद दिलाएं, और आप उनके ग़लत फ़ैसले और उनके ज़ुल्म पर उनकी आलोचना भी करते थे और उनको याद दिलाते रहते थे कि उन्होंने ख़िलाफ़त और हुकूमत को अहलेबैत अ.स. से छीना है, जैसे आपने फ़रमाया पांच चीज़ों पर इस्लाम की बुनियाद रखी गई है, नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज और विलायत, ज़ोरारह ने पूछा इनमें से कौन बेहतर है? इमाम अ.स. ने फ़रमाया विलायत सबसे बेहतर है क्योंकि इमाम ही वह है जो इन चारों की ओर लोगों की हिदायत करेगा। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 18)
ज़ालिम हुकूमत के सहयोग से रोकना
इमाम अ.स. हमेशा मोमेनीन को ज़ालिम हुकूमत के हर तरह के सहयोग से रोकते, और अपने इस पैग़ाम को हर कुछ समय पर उम्मत तक पहुंचाते, अक़बा इब्ने बशीर असदी का बयान है कि मैंने इमाम बाक़िर अ.स. से कहा कि मैं अपनी क़ौम में से सबसे अच्छे ख़ानदान से हूं, मेरी क़ौम के मामलों को हल करने वाला अब इस दुनिया में नहीं रहा और क़ौम वालों ने अब मुझे उसकी जगह क़ौम के मामलों की देखभाल का ज़िम्मेदार बनाने का इरादा किया है इस बारे में आपका क्या विचार है? इमाम अ.स. ने फ़रमाया अगर जन्नत में जाना पसंद नहीं तो जाओ क़ौम के मामलों के ज़िम्मेदार बन जाओ, क्योंकि कभी कभी ज़ालिम हाकिम मुसलमानों पर हुकूमत ही इसी लिए करता है ताकि उनका ख़ून बहा सके, तुम हुकूमत के एक छोटे पद को ही स्वीकार करने की बात कर रहे हो लेकिन फिर भी उन्हीं ज़ालिम हाकिमों के जुर्म और अपराध में शामिल रहोगे, ऐसा तो हो सकता है उनकी हुकूमत से तुमको थोड़ा सा भी फ़ायदा न मिले लेकिन उनकी जुर्म की दुनिया के हिस्सेदार ज़रूर कहलाओगे, तभी वहीं बैठे एक शख़्स ने सवाल किया कि मैं हज्जाज के दौर से अब तक (किसी इलाक़े का) हाकिम रहा हूं क्या मेरे लिए तौबा का कोई रास्ता है? इमाम अ.स. उसके सवाल को सुन कर चुप हो गए उसने अपना सवाल फिर दोहराया, इमाम अ.स. ने फ़रमाया जिस जिस का हक़ छीना गया है (चाहे ज़ुल्म किया हो चाहे माल लूटा हो चाहे किसी और तरह से हक़ छीना गया हो) उन सब को उनका हक़ वापस लौटा कर ही तौबा क़ुबूल हो सकती है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 75, पेज 377)
इमाम अ.स. के शियों में से अब्दुल ग़फ़्फ़ार इब्ने क़ासिम नाम के एक शख़्स का बयान है कि मैंने इमाम बाक़िर अ.स. से कहा मेरे हाकिम से क़रीब होने और उसके दरबार में आने जाने के बारे में आपका क्या कहना है? इमाम अ.स. ने फरमाया मेरी नज़र में सही नहीं है, मैंने कहा कभी शाम जाना होता है तो इब्राहीम इब्ने वलीद के पास भी चला जाता हूं?
इमाम अ.स. ने फ़रमाया ऐ अब्दुल ग़फ़्फ़ार तुम्हारा हाकिमों के साथ उठने बैठने और उनके दरबार में आने जाने से तीन नुक़सान हैं, पहला यह कि तुम्हारे दिल में दुनिया की मोबब्बत बढ़ेगी दूसरा यह कि मौत को भूल जाओगे और तीसरा यह कि अल्लाह ने जो तुम्हारे मुक़द्दर में रखा है उससे राज़ी नही रहोगे।
अब्दुल ग़फ़्फ़ार कहते हैं मैंने कहा मेरा वहां जाने का मक़सद केवल व्यापार करना रहता है, इमाम अ.स. ने फ़रमाया ऐ अल्लाह के बंदे मैं दुनिया से पूरी तरह मुंह मोड़ लेने के लिए नहीं कह रहा बल्कि मेरे कहने का मतलब यह है कि हराम कामों और गुनाहों से बचो, दुनिया की चकाचौंध से मुंह मोड़ लेना फ़ज़ीलत है लेकिन गुनाह को छोड़ना वाजिब है, और इस समय तुम्हारे लिए फ़ज़ीलत हासिल करने से ज़्यादा गुनाहों से बचना ज़रूरी है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 75, पेज 377)
 इसी तरह जब लोग मदीने के नए हाकिम के पास मुबारकबाद के लिए जा रहे थे इमाम अ.स. ने फ़रमाया मदीने के नए हाकिम का घर जहन्नम के दरवाज़ों में से एक दरवाज़ा है। (उसूल काफ़ी, जिल्द 5, पेज 105)
खुलेआम विरोध करना इमाम बाक़िर अ.स. ने एक ओर से ज़ालिम हुकूमत के विरुध्द हज़रत ज़ैद और हज़रत मुख़्तार जैसों के आवाज़ उठाने का समर्थन किया दूसरी ओर आपने ख़ुद जब भी सही समय देखा ज़ालिम हुकूमत का विरोध कर उनकी आलोचना की, आप फ़रमाते थे कि जो भी किसी ज़ालिम और पापी हाकिम के पास जा कर उसको तक़वा की ओर दावत देगा और उसके नेक रास्ते पर चलने की नसीहत करेगा उसको सारे इंसानों और जिन्नातों के बराबर सवाब मिलेगा। (बिहारुल अनवार, जिल्द 75, पेज 375, वसाएलुश शिया, जिल्द 11, पेज 406)
इसी तरह आपने सभी ज़ालिम हाकिमों की हुकूमत को हराम बताते हुए उनके ख़िलाफ़ विरोध करने को सही ठहराया था। (उसूले काफ़ी, जिल्द 1, पेज 184)
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