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Date of publication : 13/3/2018 6:33
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आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र की ज़िंदगी पर एक निगाह

सद्दाम का सौतेला भाई बरज़ान इब्राहीम जो कि इराक़ की सुरक्षा परिषद का चेयरमैन था उसने जेल में आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र से कहा कि आप इमाम ख़ुमैनी र.ह. और इस्लामी इंक़ेलाब के विरुध्द बस कुछ ही शब्द लिख दीजिए वरना आपको मार दिया जाएगा, आपने उसकी इस मांग को रद्द करते हुए कहा कि मैं मरने के लिए तैयार हूं लेकिन तुम्हारी इस नीच और घटिया मांग को पूरा नहीं कर सकता, मैं अपनी रास्ता चुन चुका हूं और अब उसे किसी भी क़ीमत पर नहीं बदल सकता।


विलायत पोर्टल :  अल्लामा शहीद बाक़िर अल-सद्र र.ह. इस्लामी जगत के बहुत नामवर आलिम गुज़रे हैं, और इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने आपको इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देने वाला बताया है। आप काज़मैन में एक इल्मी घराने में पैदा हुए, आप इमाम काज़िम अ.स. की नस्ल से थे, आपके वालिद सैय्यद हैदर सद्र जवानी में ही इंतेक़ाल कर गए थे, आपके दादा आयतुल्लाह इस्माईल सद्र अपने दौर के बुज़ुर्ग मराजे में से थे, आपके घराने के और दूसरे उलमा ईरान, लेबनान, इराक़ और दूसरे देशों में इस्लामी कल्चर और दीन की तबलीग़ की ज़िम्मेदारी को सालों तक निभाते रहे।
आपकी बहन आमिना बिन्तुल हुदा सद्र भी अपने दौर की मशहूर आलिमा और लेखिका थीं, आप फ़िक़्ह और अख़लाक़ जैसे विषयों पर दर्स देती थीं, आपने अपने भाई शहीद बाक़िर अल-सद्र का साथ देते हुए ज़ालिम हुकूमत और तानाशाही का विरोध किया, और आप दोनों को इसी राह में शहीद कर दिया गया। आपने बहुत कम उम्र से ही पढ़ाई शुरू कर दी थी और 11 साल की उम्र में ही लोगों के बीच आपकी प्रतिभा और इल्मी क़ाबिलियत के चर्चे होने लगे थे, आपकी प्रतिभा ने लोगों का ध्यान अपनी ओर इस तरह आकर्षित कर लिया था कि स्कूलों और मदरसों के ज़िम्मेदारों ने आपको हुकूमत के ख़र्च पर पढ़ाने की ठान ली और सबसे मिल कर क़ानूनी भाग दौड़ शुरू कर दी ताकि आपको यूरोप या अमेरिका की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी में भेज कर उच्च शिक्षा दिलाई जा सके।
लेकिन आपको दीनी उलूम हासिल करने का शौक़ था और आप अपनी ख़ानदानी मीरास को आगे बढ़ाना चाहते थे जिसके कारण आपकी मां और आपके बड़े भाई ने उन सभी लोगों को मना कर दिया जो आपको यूरोप और अमेरिका भेजना चाह रहे थे, आपकी मां और भाई के मना करने का कारण साफ़ था क्योंकि इराक़ी हुकूमत उस समय ख़ुद यूरोप और अमेरिका के टुकड़ों पर चल रही थी और आपकी मां और भाई नहीं चाहते थे कि आपकी पढ़ाई में इन साम्राज्यवादी देशों का पैसा ख़र्च हो। अंत में आपने अपने दो मामूं जो ख़ुद मुज्तहिद और फ़क़ीह थे आयतुल्लाह शैख़ मोहम्मद रज़ा आले यासीन और आयतुल्लाह मुर्तज़ा आले यासीन इन दोनों के मशविरे से दीनी उलूम पढ़ना शुरू कर दिए।
आपने अपने भाई के पास से शुरूआती किताबें पढ़ना शुरू कीं और बहुत कम समय में उन्हें ख़त्म कर लिया, आप ख़ुद की पढ़ाई के साथ साथ अपनी बहन को भी पढ़ाते थे क्योंकि उस समय के इराक़ के स्कूलों की हालत ऐसी नहीं थी कि उसमें अपनी बहन को पढ़ाई के लिए भेजते। आप 12 साल की उम्र में अपने भाई के साथ नजफ़ आ गए ताकि नजफ़ के बुज़ुर्ग मराजे के दर्स में शामिल हो सकें, आपने फ़िक़्ह और उसूल के विषय को आयतुल्लाह ख़ूई और आयतुल्लाह शैख़ मोहम्मद रज़ा आले यासीन जैसे महान फ़क़ीह से पढ़ा, इस्लामी फ़लसफ़े को शैख़ सदरा बादकूबेई से पढ़ा और उसी समय आप पश्चिमी देशों और ग़ैर मुस्लिमों के फ़लसफ़े का भी अध्ययन करते रहे और फ़िर आपने उन्हीं दिनों में फ़लसफ़तोना नामी किताब द्वारा पश्चिमी देशों के फ़लसफ़े को ग़लत साबित किया। आपने और दूसरे विषयों जैसे हदीस, रेजाल, कलाम और तफ़सीर वग़ैरह को भी पढ़ते रहे और यहां तक ख़ुद इन सभी विषय में अपनी राय पेश करने लगे।
आप अपनी पढ़ाई की शुरूआत से अंत तक (क़रीब 17 साल) रोज़ाना लगभग 16 घंटे पढ़ाई लिखाई करते थे, आप कहा करते थे कि मैं कई लोगों के बराबर पढ़ाई में अकेले मेहनत करता था यही कारण है कि अल्लाह ने इतने कम समय में मुझे यह मर्तबा दिया। आपने 20 साल की उम्र में किफ़ायतुल उसूल जैसी किताब पढ़ानी शुरू कर दी थी और तभी से ही शागिर्दों की तालीम और तरबियत का ज़िम्मा संभाल लिया था, और आपने 25 साल की उम्र में उसूल का और 28 साल की उम्र में उर्वतुल वुसक़ा जैसी फ़िक़्ह की किताब का दर्से ख़ारिज देना शुरू कर दिया था, इसके बाद आपने तफ़सीर और फ़लसफ़ा भी पढ़ाना शुरू कर दिया, आपने लगभग 30 साल शागिर्दों की तरबियत करते हुए क़ौम को अनेक शागिर्द दिए, जो बाद में अपने अपने इलाक़ों में दीन की तबलीग़ और अहलेबैत अ.स. के मआरिफ़ को फैलाने और अपने उस्ताद की इल्मी और सियासी विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने में लग गए।
आप इमाम ख़ुमैनी र.ह. के इंक़ेलाब के मिशन को इस्लामी उम्मत के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद बताते थे और आप की ओर से शुरू से ही इमाम ख़ुमैनी र.ह. और इंक़ेलाब का समर्थन था, इसीलिए जिस समय इमाम ख़ुमैनी र.ह. तुर्की से दोबारा जिलावतन कर के नजफ़ इराक़ भेजे गए तो नजफ़ में आपका बहुत अच्छे से स्वागत हुआ सारे उलमा ख़ुश थे लेकिन इन सारे उलमा में आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र र.ह. अपने शागिर्दों के साथ सबसे आगे आगे दिखाई दे रहे थे, इमाम ख़ुमैनी र.ह. 14 साल नजफ़ में रहे और इन 14 सालों में आप उनके बहुत क़रीब रहते थे, जिस से इमाम ख़ुमैनी र.ह. के लिए आपके दिल में सम्मान और उनसे मोहब्बत ज़ाहिर होती है।
आयतुल्लाह हकीम र.ह. की वफ़ात के बाद आप मरजए तक़लीद बने और इराक़ की ठीक ठाक जनता आपकी तक़लीद करने लगी, धीरे धीरे आपकी राजनीतिक गतिविधियों को देख कर सद्दाम की हुकूमत ने आप पर सख़्ती करना शुरू कर दी और आप पर कड़ी नज़र रखने का हुक्म दिया, और आपके साथ रहने वालों के घरों पर हमला और उनको गिरफ़्तार कर के जेल में डालना शुरू कर दिया, सद्दाम की हुकूमत को आपके वजूद से इतना डर था कि एक बार आप बीमार हुए और नजफ़ के एक अस्पताल में भर्ती हुए तो हुकूमत ने अपने जासूस वहां पर भी तैनात कर रखे थे। आपकी मरजईयत के दौरान आपके द्वारा एक और अहम घटना 20 सफ़र 1397 हिजरी को हुई जब आपने इमाम हुसैन अ.स. के चेहलुम पर नजफ़ से कर्बला पैदल जाने वाले उस समय हज़ारों अंजुमन और ज़ायरीन की भरपूर मदद की और उन सभी से ज़ोर दे कर कहा कि वह सब अज़ादारी के साथ साथ सद्दाम और उसके ज़ुल्म के विरुध्द जम कर आवाज़ उठाएं।
शहीद सद्र र.ह. के उस ऐतिहासिक विरोध के बाद आपको गिरफ़्तार कर के बग़दाद ले जाया गया, आपसे वहां 8 घंटे पूछताछ हुई जिसके दौरान आपको शारीरिक और मानसिक तकलीफ़ पहुंचाई गई जिसके असर को उनकी उम्र के आख़िर तक देखा गया था कि उनको ज़ीने चढ़ने में काफ़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। सद्दाम का ज़ुल्म बढ़ता जा रहा था यहां तक कि जब 18 रजब 1399 हिजरी को सुबह सवेरे जब आपके चाहने वाले आपके घर के चारों तरफ़ जमा थे कि कल उनके रहबर की आज़ादी का दिन था आज हम सब उनकी दोबारा बैअत करेंगे, सद्दाम लोगों के इरादों को देख कर कांप गया और उसने उसी समय अपनी सेना को भेज कर हुक्म दिया कि आपके घर को चारों ओर से घेर लिया जाए। सद्दाम की ओर से आपके घर का घेराव लगभग 9 महीने जारी रहा, और आप पर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी, लेकिन आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र र.ह. ने न केवल अपने मिशन को जारी रखा बल्कि इमाम ख़ुमैनी र.ह. के ईरान में इंक़ेलाब लाने की मुहिम का भरपूर साथ दिया, और फिर वह दिन भी आ पहुंचा जब 19 जमादिउल अव्वल 1400 हिजरी को सद्दाम का भेजा हुआ अबू सईद नाम का अफ़सर अपने कुछ साथियों के साथ आ कर कहता है कि आपको बग़दाद बुलाया गया है, शहीद सद्र र.ह. समझ चुके थे कि इस बार वह वापस नहीं आएंगे।
आपको बग़दाद ले जाते ही अगले दिन आपकी बहन बिन्तुल हुदा को भी गिरफ़्तार कर लिया गया चूंकि हुकूमत को डर था कि कहीं आप भी अपने भाई की तरह लोगों को जमा कर के हुकूमत को बे नक़ाब न कर दें।
सद्दाम का सौतेला भाई बरज़ान इब्राहीम जो कि इराक़ की सुरक्षा परिषद का चेयरमैन था उसने जेल में आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र से कहा कि आप इमाम ख़ुमैनी र.ह. और इस्लामी इंक़ेलाब के विरुध्द बस कुछ ही शब्द लिख दीजिए वरना आपको मार दिया जाएगा, आपने उसकी इस मांग को रद्द करते हुए कहा कि मैं मरने के लिए तैयार हूं लेकिन तुम्हारी इस नीच और घटिया मांग को पूरा नहीं कर सकता, मैं अपनी रास्ता चुन चुका हूं और अब उसे किसी भी क़ीमत पर नहीं बदल सकता।
उधर आपकी बहन को हुकूमत को बे नक़ाब करने से रोकने के लिए बहुत ज़ोर दिया गया लेकिन न भाई ने अपने इस मिशन से हाथ रोका न बहन ने।
जब सद्दाम और उसके चमचों ने देखा कि आयतुल्लाह शहीद बाक़िर अल-सद्र और आपकी बहन को किसी भी क़ीमत पर न तो रोका जा सकता है न ही इमाम ख़ुमैनी र.ह. और इस्लामी इंक़ेलाब के समर्थन से पीछे हटाया जा सकता है तो हुकूमत ने आप दोनों महान हस्तियों को 23 जमादिउल अव्वल 1400 हिजरी को दर्दनाक तरीक़े से शहीद कर दिया गया। आपकी शहादत के बाद आपके और आपकी बहन के जनाज़े को नजफ़ भेज दिया गया जिसके बाद आपको वहीं दफ़्न कर दिया गया। .....................


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