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Date of publication : 9/3/2018 10:32
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हां फ़ातिमा अ.स. इसलिए फ़ातिमा अ.स. थीं......

फ़ातिमा अ.स. अपने ख़ुलूस, ईमान, हक़ के रास्ते में क़ुर्बानी का जज़्बा रखने वाली, विलायत की राह में सब कुछ लुटा देने की बुनियाद पर फ़ातिमा अ.स. थीं, फ़ातिमा अ.स. इसलिए फ़ातिमा अ.स. थीं क्योंकि आप अपनी नीयत, अपने अमल में बे मिसाल थीं, फ़ातिमा अ.ल. इसीलिए फ़ातिमा अ.स. थीं, उनके नफ़्स पर ख़ुदा की मर्ज़ी की छाप थी हां फ़ातिमा अ.स. इसीलिए फ़ातिमा अ.स थीं।


विलायत पोर्टल : बचपन से उल्मा और ज़ाकेरीन से यह हदीस सुनी थी कि पैग़म्बर स.अ. अपनी बेटी का बेहद सम्मान करते थे, आपने अपनी बेटी के लिए फ़रमाया फ़ातिमा अ.स. मेरे कलेजे का टुकड़ा है जिसने उनको तकलीफ़ पहुंचाई उसने मुझे तकलीफ़ पहुंचाई, उनकी मर्ज़ी मेरी मर्ज़ी है और उनकी नाराज़ होने से अल्लाह नाराज़ होता है।
अक़्ल और समझ के बढ़ने के साथ साथ मेरे दिमाग़ में यह सवाल भी बढ़ता गया कि आख़िर कैसे किसी की ख़ुशी और नाराज़गी से अल्लाह ख़ुश और नाराज़ हो जाएगा, इतना बड़ा मर्तबा किसी को ऐसे ही तो नहीं मिल सकता फिर हज़रत ज़हरा स.अ. कैसे अल्लाह की ख़ुशी और नाराज़गी का आधार बनीं ?
इस सवाल के जवाब की खोज ने मेरे सामने इतनी दलीलें रख दीं कि जो मेरे लिए इस सवाल के जवाब में बहुत थीं, हो सकता है इन दलीलों से किसी को उसके किसी और सवाल का जवाब भी मिल जाए, इसीलिए अपनी उस तलाश और खोज को आपके सामने इस उम्मीद से पेश कर रहा हूं कि आख़िर तक आप हमारी इस तलाश को पढ़ेंगे।
** एक दिन पैग़म्बर स.अ. एक कनीज़ के साथ घर में आए और कनीज़ का हाथ हज़रत ज़हरा स.अ. के हाथ में दे कर फ़रमाया, बेटी यह कनीज़ आज से तुम्हारी ख़िदमत करेगी यह पाबंदी से नमाज़ पढ़ती है इसलिए तुम्हारे लिए बेहतर होगी, फिर आपने उस कनीज़ के हुक़ूक़ के बारे में कुछ नसीहत बयान फ़रमाईं, आपने अपने वालिद की तरफ़ देखते हुए कहा, आज से घर के कामों को मैंने बांट दिया है एक दिन घर के काम आपकी बेटी करेगी और एक दिन यह कनीज़, आपके इस जवाब को सुन कर पैग़म्बर स.अ. की आंखों में आंसू आ गए और आपने इस आयत की तिलावत फ़रमाई, अल्लाह ही बेहतर जानता है कि अपनी रिसालत (ज़िम्मेदारी) किसके सुपुर्द करे।
 ** फ़िज़्ज़ा घर की कनीज़ थीं, उनको हज़रत ज़हरा अ.स. की मारेफ़त भी थी और अहलेबैत अ.स. के मर्तबे को भी जानती थीं, लेकिन आपने घर के कामों को बांट रखा था एस दिन घर का सारा काम फ़िज़्ज़ा करती थीं एक दिन आप ख़ुद करती थीं, सलमान फ़ारसी का बयान है कि एक दिन मैंने देखा कि शहज़ादी बच्चों को गोद में संभाले हुए चक्की चला रही हैं जबकि आपका हाथ ज़ख़्मी है और उससे ख़ून बह रहा है, मैंने कहा शहज़ादी घर पर फ़िज़्ज़ा मौजूद हैं फिर आप उनसे काम क्यों नहीं लेतीं, आपने फ़रमाया कल फ़िज्ज़ा ने घर के काम किए आज मेरी ज़िम्मेदारी है।
** हज़रत ज़हरा स.अ. की इबादत इस तरह थी कि घर में एक ख़ास जगह इबादत के लिए चुन रखी थी, अल्लाह की इबादत करते समय आप पूरी तरह उसी में खो जाती थीं और आप मुस्तहब अरकान पर विशेष ध्यान देती थीं, आपने अपनी ज़िंदगी के अंतिम क्षणों में असमा से कहा कि असमा मुझे वह इतर ला दो जिसे हमेशा नमाज़ से पहले लगाती हूं और वह कपड़े जिसे नमाज़ के लिए पहनती हूं और मेरे पास ही बैठ जाओ अगर नमाज़ में मेरी तबियत बिगड़ने लगे तो मुझे सहारा दे कर उठाना और अगर तुम्हारे उठाने से न उठ पाऊं तो अबुल हसन अ.स. के पास ख़बर भेज देना।
** इबादत पर इतना विशेष ध्यान देने के बावजूद अपने वालिद हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा स.अ. का इतना ख़्याल रहता था कि एक दिन आप मुस्तहब नमाज़ पढ़ रही थीं जैसे ही अपने वालिद की आवाज़ सुनी नमाज़ छोड़ कर उनके पास आईं और आकर सलाम किया, पैग़म्बर स.अ. ने सलाम का जवाब दिया और सर पर हाथ फेर कर हाथों को दुआ के लिए उठा अपनी बेटी के लिए इस तरह दुआ की, ख़ुदाया इस पर अपनी रहमत नाज़िल फ़रमा।
** एक दिन पैग़म्बर स.अ. ने सलमान फ़ारसी से कहा, सलमान यह अरबी अभी नया नया मुसलमान हुआ है और यह भूखा है जाओ इसके लिए खाने का कुछ बंदोबस्त करो, सलमान सीधे इमाम अली अ.स. के दरवाज़े पर पहुंचे शायद सलमान जानते थे कि कहीं मिले न मिले अली अ.स. के दर से ख़ाली हाथ वापस नहीं लौटेंगे, वहां पहुंच कर दरवाज़ा खटखटाया इमाम अली अ.स. घर पर नहीं थे हज़रत ज़हरा स.अ. ने आने की वजह पूछी, सलमान ने कहा आपके वालिद ने किसी अरबी के लिए खाने का बंदोबस्त करने को कहा था तो मैं आपके दरवाज़े पर आ गया, आपने फ़रमाया सलमान ख़ुदा की क़सम घर में खाने को कुछ भी नहीं है बड़ी मुश्किल से हसन अ.स. और हुसैन अ.स. को भूखा सुलाया है, लेकिन फिर आपने कहा सलमान ख़ैर और नेकी जो मेरे दरवाज़े तक चल कर आई है इसलिए वापस कैसे कर सकती हूं, फिर आपने सलमान को अपना एक लिबास दे कर कहा कि सलमान यह मेरा लिबास है इसे शमऊन (मदीने में रहने वाला एक यहूदी जो बाद में मुसलमान हो गया था) के पास ले जाओ और इसके बदले खजूर और जौ ले आओ, सलमान वह लिबास लेकर शमऊन के पास गए और सारी घटना उसको बताई, जैसे ही उसको पता चला कि यह लिबास पैग़म्बर स.अ. की बेटी का है और उनके घर में कुछ खाने पीने के लिए नहीं है तुरंत उसके मुंह से यह जुमला निकला कि सलमाम ज़ोहद इसी को कहते हैं, और यह दुनिया और उसकी दौलत से दिल न लगाना यह वही सिफ़त है जिसके बारे में तौरैत में मैंने पढ़ा है, फिर वह कहता है कि इसका मतलब हज़रत ज़हरा स.अ. जिस ख़ुदा को मानती हैं वही हक़ है, उसके बाद वह उसी समय कलमा पढ़ कर मुसलमान हो गया और उसने खजूर और जौ सलमान को ला कर दे दी, सलमान ख़ुशी ख़ुशी उसे ले कर पहुंचे और हज़रत ज़हरा स.अ. को खजूर और जौ ले जा कर दे दी, आपने अपने हाथों से जौ को पीस कर आटा तैयार किया और फिर रोटी बना कर सलमान को दे दीं, सलमान ने कहा शहज़ादी आप भी भूखी हैं हसनैन अ.स. भी भूखे हैं कुछ रोटियां इनमें से अपने लिए रख लीजिए, हज़रत ज़हरा स.अ. ने फ़रमाया ऐ सलमान हम जो चीज़ अल्लाह की राह में दे देते हैं फिर उसमें हाथ नहीं लगाते।
** सलमान ही से नक़्ल है कि किसी काम से हज़रत ज़हरा स.अ. के घर गया तो मुझे महसूस हुआ आप चक्की चला रही हैं और साथ ही साथ क़ुर्आन की तिलावत भी कर रही हैं। ** अधिकतर ऐसा होता कि रात के सन्नाटे में बच्चे आप को अल्लाह की इबादत करते हुए रोते हुए देखते, अधिकतर ऐसा भी होता कि एक तिहाई रात गुज़र जाने के बाद आप बच्चों को जगा कर कहतीं कि बच्चों उठो अब इबादत का समय है।
** इमाम हसन अ.स. फ़रमाते हैं कि एक बार शबे जुमा में मैंने अपनी मां को सुबह तक इबादत करते और अल्लाह से बातें करते हुए देखा, सूरज के निकलने तक मैंने अपनी मां को कभी रुकूअ कभी सजदे में देखा, मां अल्लाह से बातें कर रहीं हैं और सबके लिए दुआ कर रही हैं, मैंने पूछा आपने सबके लिए दुआ की अपने लिए क्यों नहीं की? आपने फ़रमाया बेटा पहले पड़ोसियों का हक़ है फिर हमारा। एक और रिवायत में मिलता है कि इमाम हसन अ.स. ने अपनी मां की इबादत के बारे में फ़रमाया कि मेरी मां इतनी इबादत करती थीं कि पैरों में सूजन आ जाती थी।
** आपका अपने वालिद के साथ इतना गहरा रिश्ता था कि जब आप आती थीं तो पैग़म्बर स.अ. अपनी जगह से खड़े हो जाते थे, सूरए नूर की आयत न. 63 (जिसमें अल्लाह ने लोगों को हुक्म दिया कि पैग़म्बर स.अ. को इस तरह मत पुकारो जिस तरह तुम लोग आपस में एक दूसरे को पुकारते हो) के नाज़िल होने के बाद आपको अपने वालिद को बाबा कह कर पुकारने में शर्म महसूस होने लगी, एक दिन पैग़म्बर स.अ. ने आपको बुला कर कहा बेटी तुम मुझे बाबा कह कर क्यों नहीं बुलातीं यह आयत जो नाज़िल हुई है यह बाक़ी सब लोगों के लिए है, तुम मुझे बाबा कह ही बुलाया करो फिर पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया तुम मुझ से हो मैं तुम से हूं, तुम्हारे बाबा कहने से मेरा दिल मज़बूत होता है और अल्लाह की ख़ुशी का कारण है।
** पैग़म्बर स.अ. ने हज़रत ज़हरा स.अ. को शादी के समय दुल्हन का एक विशेष जोड़ा दिया था, शादी के बाद एक दिन एक ज़रूरतमंद दरवाज़े पर आया जिसने लिबास का सवाल किया, आपने उसी शादी के जोड़े को उतार कर उस ज़रूरतमंद को दे दिया, पैग़म्बर स.अ. जब आपके घर आए और आपको उस दुल्हन वाले जोड़े की जगह एक सादे और पुराने कपड़े में देख कर पूछा बेटी तुम यह पुराने कपड़े पहने हो वह दुल्हन वाला जोड़ा कहां गया? आपने जवाब दिया बाबा एक बार एक ज़रूरतमंद आपके पास आया था और आपसे कपड़े का सवाल किया था उस समय आपके पास वही एक जोड़ा कपड़ा था जो आप पहने थे लेकिन आपने उसे उतार कर दे दिया था आपकी पैरवी करते हुए मैंने भी वह जोड़ा उस ज़रूरतमंद को दे दिया। कुछ रिवायत में है कि आपने फ़रमाया मैंने सोंचा इस आयत पर अमल करूं जिसमें कहा गया है कि तुम उस समय तक नेकी तक नहीं पहुंच सकते जब तक अपनी पसंदीदा चीज़ अल्लाह का राह में ख़र्च न कर लो।
** शादी के अगले दिन पैग़म्बर स.अ. ने इमाम अली अ.स. पूछा आपने हज़रत ज़हरा स.अ. को कैसा पाया? आपने फ़रमाया मैंने उनको अल्लाह की इबादत में अपना मददगार पाया।
** इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं कि हज़रत ज़हरा स.अ. ने जितने दिन मेरे घर में ज़िंदगी गुज़ारी मेरे लिए कोई क्षण नहीं आया जो मेरे लिए परेशानी का कारण बनता, मुझे हज़रत ज़हरा स.अ. ने किसी काम पर मजबूर नहीं किया, मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कभी कोई क़दम नहीं उठाया, मैं जब भी हज़रत ज़हरा स.अ. को देखता था मेरे सारे ज़ख़्म सारे दुख दर्द ख़त्म हो जाते थे।
** इमाम अली अ.स. के घर आने के बाद आपने कभी किसी चीज़ की मांग नहीं की और न ही कभी किसी चीज़ की ख़्वाहिश ज़ाहिर की, यहां तक कि कठिन से कठिन समय में जब घर में खाने के लिए कुछ भी नहीं था तब भी आपने कभी यह नहीं कहा कि घर में कुछ नहीं है इंतेज़ाम कर दीजिए, इमाम अली अ.स. ने ख़ुद जब देखा कि खाने के लिए घर में कुछ नहीं है तो पूछा ज़हरा स.अ. आपने क्यों नहीं बताया कि घर में खाने को कुछ नहीं रह गया तो आपने जवाब दिया अबुल हसन अ.स. मुझे उस बात के लिए कहते हुए शर्म आती है जिसका पूरा करना आपके लिए सख़्त हो।
** बच्चों को ऐसी तरबियत दी कि हमेशा घर से क़ुर्आन की तिलावत और तसबीह की आवाज़ आती रहती लेकिन उसके बावजूद आप बच्चों से ताकीद कर के कहतीं कि मस्जिद जा कर नाना का ख़ुत्बा सुना करो, और बच्चे मस्जिद से जब वापस आते तो आप उनसे वह सब बातें सुनाने को कहतीं जिसे पैग़म्बर स.अ. ने बयान किया है, आप हमेशा बच्चों से कहतीं कि बच्चों तुम अपने वालिद को देखो और उनकी तरह बनने की नसीहत इस तरह करतीं कि बेटा अपने वालिद की तरह हक़ की गर्दन में पड़ी हुई ज़ुल्म की ज़ंजीरों को तोड़ देना कभी ज़ालिमों का साथ देना।
** घर में खाना बहुत कम था और रात में मेहमान ने दरवाज़ा खटखटाया, हज़रत ज़हरा स.अ. ने इमाम अली अ.स. से कहा कि खाना तो केवल इतना ही है कि बच्चे खा सकें लेकिन मैं बच्चों को सुला देती हूं क्योंकि मेहमान का हक़ पहले होता है, खाना लगा मेहमान ने पेट भर कर खाना खाया, रात ऐसी गुज़र रही थी कि घर में आने वाला मेहमान पेट भर कर सो रहा था लेकिन घर के लोग भूखे पेट सो रहे थे, आपके इसी अमल को देखते हुए आयत भी नाज़िल हुई।
** एक बार बच्चे बहुत बीमार हुए पैग़म्बर स.अ. बेटी के घर बच्चों को देखने आए और इमाम अली अ.स. से कहा मन्नत मान लो जब बच्चे ठीक हो जाएंगे तो तीन दिन रोज़ा रखेंगे, पूरे घर ने मन्नत मान ली, बच्चे ठीक हो गए सबने रोज़ा रखा लेकिन इफ़्तार के लिए घर में कुछ नहीं था, इमाम अली अ.स. कहीं से थोड़ी जौ ले कर आए ताकि इफ़्तार का इंतेज़ाम हो सके, जौ को पीस कर पांच रोटियां तैय्यार की गईं, एक घर की कनीज़ फ़िज़्ज़ा दो बच्चों और एक इमाम अली अ.स. और एक शहज़ादी के लिए, इफ़्तार के समय दस्तरख़ान पर पानी और जौ की रोटियां रखी गईं, अभी इफ़्तार का इरादा ही किया था कि घर के दरवाज़े से किसी की आवाज़ आई ऐ पैग़म्बर स.अ. के अहलेबैत अ.स. मैं मिस्कीन हूं क्या कुछ खाना मिल सकता है? सबने अपने अपने हिस्से की रोटी दे दी, मिस्कीन ख़ुश हो कर चला गया और इधर घर के सभी लोगों ने पानी से इफ़्तार कर लिया,
दूसरे दिन फिर सबने रोज़ा रखा इमाम अली अ.स. ने फिर जौ का इंतेज़ाम किया फिर रोटी बनीं दस्तरख़ान सजा पानी रखा गया जौ की रोटी रखी गईं जैसे ही सब इफ़्तार करने बैठे फिर घर के दरवाज़े से आवाज़ आई मैं यतीम हूं क्या कुछ खाने को मिलेगा? सबने अपने अपने हिस्से की रोटियां उस यतीम को दे दी,
तीसरे दिन फिर ऐसे ही हुआ जैसे ही इफ़्तार का इरादा किया आवाज़ आई मैं एक असीर हूं क्या थोड़ा खाना मिल सकता है? सबने फिर पानी से इफ़्तार किया और सो गए, जब सुबह हुई तो इमाम अली अ.स. अपने बच्चों इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. का हाथ पकड़ कर पैग़म्बर स.अ. के पास ले गए, पैग़म्बर स.अ. ने देखा बच्चों के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और वह दोनों भूख की वजह से कांप रहे थे, पैग़म्बर स.अ. इमाम अली अ.स. और बच्चों के साथ उनके घर आए तो देखा शहज़ादी मुसल्ले पर बैठी इबादत कर रहीं हैं भूख की वजह ले आंखों के हलक़े दिखाई देने लगे हैं, पैग़म्बर स.अ. सबकी इस हालत को देख कर बहुत दुखी हुए तभी जिब्रईल नाज़िल हुए और कहा ऐ अल्लाह के हबीब आप के अहलेबैत अ.स. के इस किरदार को देख कर अल्लाह आपको मुबारकबाद पेश करता है और फिर सूरए दहर की आयतों कि तिलावत की।
यह केवल कुछ मिसालें थीं जिनको आपके सामने पेश किया, वरना वह तारीख़ जिसको मैं पढ़ रहा था उसमें हज़रत ज़हरा स.अ. का पूरा वजूद मेरे सामने कुछ इस तरह था कि कहीं बच्चों को संभाल रही हैं तो कहीं चक्की चला रही हैं, कहीं इमाम अली अ.स. के दुखों को सुन रहीं हैं तो कहीं किसी की मदद करती नज़र आ रही हैं, आपका वजूद आवाज़ दे रहा है कि मैं ऐसे ही फ़ातिमा नहीं हूं बल्कि मेरे इस मर्तबे के पीछे मेरी भूख, मेरी प्यास मेरे मज़बूत इरादे, मेरी कोशिशें, मेरा दुखों को बर्दाश्त करना, मेरा सब्र, मेरा हौसला, मेरी लगातार वह इबादतें जिनसे मेरे पैरों का सूज जाना है, मेरे कलेजे में इंसानियत का दर्द है, विलायत की राह में मेरी टूटी हुई पस्लियां और नीले बाज़ू हैं, मुझे यह राज़ समझने में देर नहीं लगी कि जितना अल्लाह की राह में ख़ुद को मिटाते चले जाओगे उतना ही बुलंदी हासिल करते चले जाओगे, लेकिन कुछ बुलंदियां और ऊंचाईयां ऐस हैं जिनसे आगे बढ़ने का हम हौसला तो कर सकते हैं लेकिन उन तक पहुंचना हमारे बस की बात नहीं होती क्योंकि हम ख़ाकी वजूद हैं और वह नूरानी वजूद थे लेकिन ख़ाकी जिस्म के साथ हमारी हिदायत कर रहे थे, लेकिन ध्यान रहे इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि हम थक हार के बैठ जाएं और यह सोंचने लगें कि हमारे बस का कुछ भी नहीं है।
पता नहीं आपको जवाब मिला या नहीं लेकिन मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया कि फ़ातिमा अ.स. क्यों फ़ातिमा अ.स. हैं....... फ़ातिमा अ.स. अपने ख़ुलूस, ईमान, हक़ के रास्ते में क़ुर्बानी का जज़्बा रखने वाली, विलायत की राह में सब कुछ लुटा देने की बुनियाद पर फ़ातिमा अ.स. थीं, फ़ातिमा अ.स. इसलिए फ़ातिमा अ.स. थीं क्योंकि आप अपनी नीयत, अपने अमल में बे मिसाल थीं, फ़ातिमा अ.ल. इसीलिए फ़ातिमा अ.स. थीं, उनके नफ़्स पर ख़ुदा की मर्ज़ी की छाप थी हां फ़ातिमा अ.स. इसीलिए फ़ातिमा अ.स थीं।
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