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Code : 192483
Date of publication : 8/3/2018 15:56
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जवान मुझे जाने ही नहीं दे रहे थे.....

मैंने जाकर 1 घंटा कुछ मिनट उन जवानों के लिए एक दिलचस्प तक़रीर की, फिर मैंने वापसी के लिए निकलना चाहा लेकिन वह जवान मुझे निकलने ही नहीं दे रहे थे, वह यही कह रहे थे थोड़ी देर और कुछ बोलिए,

विलायत पोर्टल : आज जब मैं यहां आप लोगों के बीच आने के लिए तैयार हो रहा था उसी समय मुझे एक बात याद आई, जिसको आप के बीच ज़िक्र करना बेहतर समझता हूं और वह इस तरह है कि, मैं 1950 से 1960 के बीच पहली बार हमदान मे जवानों ही के एक जलसे में आया था, उस से पहले मैं कभी यहां नहीं आया था, यही मोहम्मदी साहब (जो यहां मौजूद हैं) उस समय इनकी उम्र शायद 20 साल रही होगी, यह तेहरान आए और मुझ से मुलाक़ात की, मैं भी उस समय तेहरान किसी काम से आया था, मुझ से मुलाक़ात में उन्होंने कहा कि हम कुछ जवान हमदान में हैं आप वहां आकर हमारे लिए तक़रीर कीजिए, अब मुझे यह नहीं मालूम कि किस ने उनको मेरा नाम बताया था, मैंने इनसे पूछा कि मैं हमदान आकर किस पते पर पहुंचूंगा, मुझे एक पता दिया कि आप यहां तशरीफ़ लाइयेगा, मुझे कोई किराया वग़ैरह भी नहीं दिया था, जिस दिन के लिए कहा था मैं उसी दिन हमदान के लिए बस पर बैठ गया, शाम को मैं हमदान के लिए निकला था 5 से 6 घंटे बाद मैं पहुंच गया, रात हो चुकी थी मैं ने वह पता हाथ में लेकर पूछना शुरू किया, किसी तरह लोगों से पूछते हुए उस पते पर पहुंचा, वहां जाकर देखा वह घर सय्यद काज़िम अकरमी साहब का था जो वहां के सांसद थे, और आज ख़ुदा का शुक्र वह तेहरान की एक यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं, यह भी उस समय जवान थे लेकिन मोहम्मदी साहब से बड़े थे, हमदान के सभी लोग मेरा इन्तेज़ार कर रहे थे, फिर मुझे बताया गया रात रुकने का इंतेज़ाम अकरमी साहब के घर पर ही है।
अगले दिन मुझे एक छोटी सी मस्जिद मे ले गए जहां क़रीब 30 जवान छात्र बैठे हुए थे, आज इस समय जब मैं यहां आया तो मुझे वही पहली बार हमदान आने पर छात्रों के बीच की गई बातें वग़ैरह याद आ गईं, वह सभी आज आप जवानों की तरह ही थे, मेरे लिए कुर्सी रखी गई थी, मैंने जाकर 1 घंटा कुछ मिनट उन जवानों के लिए एक दिलचस्प तक़रीर की, फिर मैंने वापसी के लिए निकलना चाहा लेकिन वह जवान मुझे निकलने ही नहीं दे रहे थे, वह यही कह रहे थे थोड़ी देर और कुछ बोलिए, क्योंकि वहीं नमाज़ होती थी और कुछ ही देर में वहां के इमाम जमाअत आने वाले थे इसलिए वह सब कुर्सी मेज़ और मुझे लेकर मस्जिद के ऊपरी फ्लोर पर बने हुए कमरे में ले गए, फिर मैंने समय पर ध्यान नहीं दिया और कई विषय पर उन जवानों के लिए तक़रीर की, यह हमदान का मेरा पहला सफ़र था, आज भी मैं उन जवानों में से कुछ को पहचानता हूं, आज उन में से कई जवान ईरान के महत्वपूर्ण लोगों में जाने जाते हैं और देश के लिए पूरी लगन से काम कर रहे हैं। (7 जूलाई 2004 को हमदान शहर की सभी यूनिवर्सिटी के छात्रों और प्रोफ़ेसरों के बीच आयतुल्लाह ख़ामेनई का बयान)
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