Tuesday - 2018 Sep 25
Languages
Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 192201
Date of publication : 22/2/2018 15:43
Hit : 251

अल्लामा अमीनी की ज़िंदगी पर एक नज़र

आप नजफ़ में किताबों के अध्ययन के अलावा बुज़ुर्ग उलमा और मराजे की विशेष बैठकों में भी हिस्सा लेते और आपके तक़वा और आपकी क़ाबिलियत को देखते हुए वह सभी उलमा और मराजे आपको अपने साथ बैठने की अनुमति भी दे देते थे, और आपका तक़वा और आपकी क़ाबिलियत ही कारण बनी की बहुत कम उम्र में आपको रिवायत बयान करने की बुज़ुर्ग मराजे की ओर से अनुमति हासिल हो गई थी, और आप तफ़सीर, हदीस, तारीख़ और इल्मे रेजाल जिससे रावियों के सच्चे और झूठे होने का पता लगाया जाता है और दूसरे उलूम में महारथ हासिल हो गई थी और आप इन उलूम में ख़ुद अपनी राय और अपना नज़रिया बयान करते थे।

विलायत पोर्टल :  ईरान के तबरेज़ शहर के इल्मी, मज़हबी और दीनदार घराने में 1320 हिज्री में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम अब्दुल हुसैन इसलिए रखा गया ताकि वह पूरी उम्र अहलेबैत अ.स. से मोहब्बत करे और उन्हीं के राह में अपनी ज़िंदगी को वक़्फ़ कर दे और अपने मौला और आक़ा इमाम हुसैन अ.स. की तरह विलायत और इमामत को बचाने में अपनी जिंदगी ख़र्च करे ।
आपका ख़ानदान
अल्लामा अमीनी के वालिद शैख़ अहमद अमीनी तबरेज़ी अपने ज़माने के मशहूर आलिम और मुत्तक़ी इंसान थे। (तर्जुमा अल-ग़दीर, मोहम्मद तक़ी वाहिदी और ....., जिल्द 1, पेज 154, उलमाए बुज़ुर्गे शिया, पेज 410)
सभी लोग आपका दिल से सम्मान करते थे, आपके वालिद अपने दौर के मुज्तहिद और फ़क़ीह थे और उनके तक़वा और परहेज़गारी के चर्चे लोगों की ज़बान पर रहते थे। अल्लामा अमीनी अपने वालिद की तरह ही मुज्तहिद और फ़क़ीह थे, आपका अधिकतर समय किताबों के पढ़ने में गुज़रता था, आप तफ़सीर, हदीस, तारीख़ और इल्मे रेजाल में ख़ास नज़र रखते थे।
आपका बचपन और जवानी
आप का बचपन दूसरो बच्चों की तरह नहीं था बल्कि आप बचपन से ज़हीन थे और दीनी अहकाम को याद करने में आप दूसरे बच्चों से बहुत आगे थे। (उलमाए बुज़ुर्गे शिया, पेज 410) जो भी आपको बचपन में देखता था आपको ज़हीन ही कहता था। (रुबअ क़र्न मअल-अल्लामा, हुसैन शाकेरी, पेज 299)
आप अपने वालेदैन के तक़वा और पाकीज़गी की वजह से कम उम्र में बहुत तेज़ी से रूहानी दर्जों को हासिल करते चले गए और कम उम्र में ही शुरूआती तालीम हासिल करने के बाद अपने वालिद के ही पास फ़ारसी और अरबी ग्रामर, मंतिक़ (ल़ॉजिक) और कुछ किताबें फ़िक़्ह और उसूल की पढ़ीं, आप हदीस और अक़ाएद के विषय में भी जवानी से ही दिलचस्पी रखते थे, लेकिन इन सबके बावजूद क़ुर्आन और नहजुल बलाग़ा के पढ़ने पर आपका विशेष ध्यान था। (गुलशने अबरार, जमई अज़ पज़ोहिशगर, जिल्द 2, पेज 727)
आपने बचपन से ही क़ुर्आन की आयतों और इमाम अली अ.स. और दूसरे इमामों की हदीसें ज़बानी याद कर लिया था और अहलेबैत अ.स. की मोहब्बत आपके पूरे वुजूद में रची बसी थी। आपकी इन्हीं विशेषताओं ने आपके ख़ानदान और सभी आस पास के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था और आप से लोगों की बहुत सारी उम्मीदें थीं, आप 16 साल की उम्र में बुज़ुर्ग मराजे और उलमा से इल्म हासिल करने के लिए नजफ़ गए और 16 साल तक अलग अलग विषय के माहिर उस्तादों से इल्म हासिल किया, इन सालों में आपके विशेष उस्ताद आयतुल्लाह सय्यद मोहम्मद इब्ने मोहम्मद बाक़िर हुसैनी फ़िरोज़ाबादी, आयतुल्लाह सय्यद अबू तुराब इब्ने अबुल क़ासिम ख़ुंसारी, आयतुल्लाह मिर्ज़ा अली इब्ने अब्दुल हुसैन ईरवानी और आयतुल्लाह अबुल हसन इब्ने अब्दुल हुसैन मिशकीनी थे।
आपका अल्लाह पर तवक्कुल और दुनिया की चकाचौंध से दूरी हर किसी की ज़बान पर था, आपका जब किसी कठिनाई या किसी मुश्किल से सामना होता आप हमेशा अहलेबैत अ.स. विशेष कर इमाम अली अ.स. से तवस्सुल कर के उनके वसीले से दुआ मांगते थे और आपका अल्लाह पर तवक्कुल इतना ज़्यादा था कि आपकी दुआ क़ुबूल भी होती थी और आपकी मुश्किल दूर हो जाती थी।
आप नजफ़ में किताबों के अध्ययन के अलावा बुज़ुर्ग उलमा और मराजे की विशेष बैठकों में भी हिस्सा लेते और आपके तक़वा और आपकी क़ाबिलियत को देखते हुए वह सभी उलमा और मराजे आपको अपने साथ बैठने की अनुमति भी दे देते थे, और आपका तक़वा और आपकी क़ाबिलियत ही कारण बनी की बहुत कम उम्र में आपको रिवायत बयान करने की बुज़ुर्ग मराजे की ओर से अनुमति हासिल हो गई थी, और आप तफ़सीर, हदीस, तारीख़ और इल्मे रेजाल जिससे रावियों के सच्चे और झूठे होने का पता लगाया जाता है और दूसरे उलूम में महारथ हासिल हो गई थी और आप इन उलूम में ख़ुद अपनी राय और अपना नज़रिया बयान करते थे। (मोक़द्दम-ए-अल-ग़दीर, जिल्द 1, पेज 64-68)
आपका तक़वा और इबादत
तक़वा और परहेज़गारी में आप बे मिसाल थे, दीनी मामलों और अल्लाह के अहकाम की पाबंदी को हर चीज़ से ज़्यादा अहमियत देते थे, आप हर किसी से अच्छे अख़लाक़ से मिलते और किसी भी काम में हार नहीं मानते थे और यही आपकी कामयाबी का राज़ है, क्योंकि अगर आप किसी भी कारण एक बार में अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते तो ना उम्मीद नहीं होते, और अपने ज़हीन और कम उम्र में इतना सब कुछ हासिल करने के बाद कभी घमंड या तकब्बुर नहीं करते थे।
आप हमेशा अपनी ज़बान पर कंट्रोल रखते थे, आपके बारे में मिलता है कि आपके मुंह से कभी किसी के लिए अपशब्द को नहीं सुना गया। आपका मानना था कि हमारी पैदाइश का आधार मोहब्बत है, और हर इबादतों का आधार भी मोहब्बत ही है (जैसाकि हदीस में भी है क्या दीन मोहब्बत के अलावा किसी और चीज़ का नाम है) जितनी ज़्यादा अल्लाह से इंसान की मोहब्बत होगी उतना ही वह गुनाहों से दूर रहेगा और अल्लाह के क़रीब होगा, आपका कहना था जिसका नमाज़ में कम ध्यान रहता है उसकी अल्लाह से मोहब्बत में कमी है।
आप इबादत के मामले में बहुत गंभीर थे विशेष कर नमाज़े शब के पाबंद थे और हर दिन सुबह की नमाज़ के बाद क़ुर्आन की उसकी तफ़सीर पर ध्यान देते हुए तिलावत करते थे।
आप अपनी ज़िंदगी में जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा अहमियत देते एक नमाज़ जिसका ज़िक्र किया गया दूसरी सबसे अहम चीज़ क़ुर्आन की तिलावत थी, आपको क़ुर्आन से ख़ास लगाव था, आप रमज़ान के पाक महीने में नमाज़, रोज़ा और दूसरी इबादतों के अलावा 15 क़ुर्आन ख़त्म करते थे जिनमें से 14 क़ुर्आन चौदह मासूमीन अ.स. की ओर से नियत करते हुए और एक अपने वालेदैन की ओर से, आपका यही क़ुर्आन से लगाव आपकी ज़िंदगी और आपकी किताबों में दिखाई देता है जिसकी मिसाल आपकी वह किताब जो आज भी विलायत और इमामत के इंकार करने वालों के मुंह पर ज़ोरदार तमांचा है जिसका नाम अल-ग़दीर है, जिसमें क़ुर्आन से आपके द्वारा पेश की गई दलीलों को आपने इस अंदाज़ से पेश किया है कि मालूम होता है यह आयतें इसी मतलब को साबित करने के लिए उतरी थीं। (मोक़द्दम-ए-अल-ग़दीर, जिल्द 1, पेज 77-78)
 इसी तरह आप ज़ियारते जामेआ-ए-कबीरा, ज़ियारते अमीनुल्लाह और ज़ियारते आशूरा भी पाबंदी से पढ़ते थे, और इसके अलावा और बहुत सी दुआएं आपको ज़बानी याद थीं।
आप अहलेबैत अ.स. से तवस्सुल पर बहुद अक़ीदा रखते थे, यहां तक कि आप जिस समय इमामों के हरम में ज़ियारत नामें में सलाम करते तो इस यक़ीन के साथ इमाम जवाब ज़रूर देंगे और यह आपकी विलायत और इमामत पर भरोसे की मज़बूती को भी दर्शाता है। आपका तक़वा परहेज़गारी, इल्म, और आपकी अहलेबैत अ.स. से मोहब्बत ही का नतीजा आपकी किताब अल-ग़दीर थी, जो आपने इमामत और विलायत पर लगाए गए आरोपों को ध्यान में रखते हुए लिखी थी जिसमें आपने अहलेबैत अ.स. के हक़ को क़ुर्आन की आयतों और सहीह हदीसों से साबित किया है।
आपकी वफ़ात
आपकी दिन रात अहलेबैत अ.स. की तालीमात और उनके हक़ को दुनिया वालों तक पहुंचाने में कुछ इस तरह व्यस्त हो गए कि आपकी सेहत दिन प्रतिदिन ख़राब होने लगी, और आपकी उम्र के आख़िरी दो सालों में आप चलने फिरने से भी मजबूर हो गए थे, आप दीन की ख़िदमत, शागिर्दों की तरबियत, अहलेबैत अ.स. के हक़ को दुनिया वालों तक पहुंचाने और शिया मज़हब को फ़ैलाने की कामयाब कोशिश के बाद आप ने 28 रबीउस्सानी 1390 हिजरी को अल-ग़दीर जैसा तोहफ़ा देने के बाद इस दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर अल्लाह की बारगाह में चल बसे।
आपके बारे में अल्लामा जलालुद्दीन हुमाई कहते हैं कि अल्लामा अमीनी की दीन और शिया मज़हब के लिए की जाने वाली मेहनत इतनी ज़्यादा थी जिसकी वजह से आपका बदन धीरे धीरे धीरे कमज़ोर होता चला गया कि आप इस दुनिया को छोड़ कर हमेशा हमेशा के लिए चल बसे।
 ...............


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :