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Date of publication : 17/2/2018 16:53
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अल-काफ़ी

अल-काफ़ी के पहले हिस्से जिसे उसूले काफ़ी कहा जाता है उसमें अक़ाएद के 8 विषय पर हदीसों को बयान किया है सबसे पहले अल-अक़्ल वल जहल, फिर फ़ज़्लुल् इल्म, इसके बाद अल-तौहीद, फिर अल-हुज्जत, इसके बाद अल-ईमान वल कुफ़्र, फिर अल-दुआ, इसके बाद फ़ज़्लुल्-क़ुर्आन और फिर अल-इशरह। दूसरे हिस्से फ़ुरू-ए-काफ़ी में जैसा कि बयान किया गया कि अहकाम और फ़िक़्ह से संबंधित हदीसें हैं और इस किताब का यही हिस्सा सबसे बड़ा है जिसमें 26 अहम जैसे तहारत, नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात, ख़ुम्स और निकाह वग़ैरह के विषय पर हज़ारों हदीसें बयान की गई हैं।


विलायत पोर्टल :  शियों की भरोसेमंद हदीस की किताबों में से एक अल-काफ़ी है जिसे सेक़तुल-इस्लाम शैख़ कुलैनी (जिनकी वफ़ात 329 हिजरी में हुई) ने 20 साल के लंबे समय में लिखा जिससे इस किताब की अहमियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है, और इस किताब को लिखने के लिए कई कई हज़ार किलोमीटर के सफ़र आपने उस ज़माने की सवारी से किए।
इस किताब में नक़्ल की जाने वाली हदीसों को तीन हिस्सों में बांटा गया है, पहला हिस्सा उसूले काफ़ी का है जिसमें अक़ाएद से संबंधित हदीसें बयान की गई हैं, दूसरा हिस्सा फ़ुरू-ए-काफ़ी जिसमें अहकाम से संबंधित हदीसें बयान की गई हैं और तीसरा हिस्सा रौज़-ए-काफ़ी जिसमें अख़लाक़, नसीहत, नबियों के ज़माने के क़िस्से और भी अनेक विषय को हदीसों और रिवायतों द्वारा बयान किया गया है।
अल-काफ़ी में क़रीब 16 हज़ार हदीसें बयान की गई हैं, काफ़ी में बयान की गई हदीसों को बयान करने वाले रावियों के हालात को बुज़ुर्ग उलमा ने बयान किया है जिनकी तादाद 30 के क़रीब है, अधिकतर हदीसों को शैख़ कुलैनी ने 8 बड़े रावियों से नक़्ल किया है जिनके नाम इस तरह हैं, अली इब्ने इब्राहीम क़ुम्मी से 7068 हदीसें, मोहम्मद इब्ने यह्या अत्तार अशअरी क़ुम्मी से 5037 हदीसें, अबू अली अशअरी क़ुम्मी से 875 हदीसें, इब्ने आमिर हुसैन इब्ने मोहम्मद अशअरी क़ुम्मी से 830 हदीसें, मोहम्मद इब्ने इस्माईल नेशापूरी 758 हदीसें, हमीद इब्ने ज़ेयाद कूफ़ी से 450 हदीसें, अहमद इब्ने इद्रीस अशअरी से क़ुम्मी से 154 हदीसें और अली इब्ने मोहम्मद से 76 हदीसें नक़्ल की हैं, और यह किताब शियों की चार सबसे भरोसेमंद किताबों में से एक है।
शैख़ कुलैनी से किसी शख़्स ने एक ऐसी किताब की मांग की थी जिसमें अक़ाएद, अहकाम, अख़लाक़ और दूसरी सभी ज़रूरतों को बयान किया गया हो उसकी इसी मांग और उसकी ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए आप ने हर विषय जो इंसान की ज़िंदगी गुज़ारने के लिए ज़रूरी है उसके बारे में मासूमीन अ.स. से हदीसों को नक़्ल किया है। बहुत सारे उलमा ने अल-काफ़ी में बयान होने वाली हदीसों के सही ठहराया जैसा कि शैख़ हुर्रे आमुली का कहना है कि क़रीब इन हदीसों को मासूम अ.स. का बयान करना अलग अलग रास्तों से यक़ीनी है, इसी तरह शैख़ मुफ़ीद जो शैख़ कुलैनी के ही दौर के उलमा में से हैं उनका कहना है कि अल-काफ़ी शियों की सबसे अहम और उपयोगी किताब है।
इसी तरह शहीदे अव्वल मोहम्मद इब्ने मक्की इस किताब के बारे में फ़रमाते हैं कि अल-काफ़ी जैसी किताब शियों में लिखी ही नहीं गई है, शहीदे सानी ने भी अल-काफ़ी समेत बाक़ी 3 किताबों मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, तहज़ीबुल अहकाम और इस्तेबसार को भी इस्लाम और ईमान की मज़बूती बताया है।
अल-काफ़ी के पहले हिस्से जिसे उसूले काफ़ी कहा जाता है उसमें अक़ाएद के 8 विषय पर हदीसों को बयान किया है सबसे पहले अल-अक़्ल वल जहल, फिर फ़ज़्लुल् इल्म, इसके बाद अल-तौहीद, फिर अल-हुज्जत, इसके बाद अल-ईमान वल कुफ़्र, फिर अल-दुआ, इसके बाद फ़ज़्लुल्-क़ुर्आन और फिर अल-इशरह।
दूसरे हिस्से फ़ुरू-ए-काफ़ी में जैसा कि बयान किया गया कि अहकाम और फ़िक़्ह से संबंधित हदीसें हैं और इस किताब का यही हिस्सा सबसे बड़ा है जिसमें 26 अहम जैसे तहारत, नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात, ख़ुम्स और निकाह वग़ैरह के विषय पर हज़ारों हदीसें बयान की गई हैं।
तीसरा हिस्सा जो रौज़-ए-काफ़ी के नाम से मशहूर है इसमें किसी ख़ास विषय से संबंधित हदीसें नहीं हैं बल्कि अनेक विषयों पर हदीसों को बयान किया गया है। अल-काफ़ी किताब अरबी ज़बान में लिखी गई है, लेकिन उसमें बयान की गई हदीसों और शैख़ कुलैनी द्वारा उन हदीसों पर लगाए गए नोट्स की तफ़सीर और उनके विश्लेषण के लिए 20 से अधिक किताबें लिखी गई, जिनमें से 7 ऐसी हैं जिसमें पूरी अल-काफ़ी की हदीसों की तफ़सीर बयान की गई हैं और कुछ ऐसी हैं जिनमें अलग अलग कारणों के चलते सभी हदीसों की तफ़सीर नहीं लिखी जा सकी, जिनमें से मशहूर मुल्ला सदरा, मुल्ला सालेह माज़न्दरानी और अल्लामा मजलिसी की तफ़सीर है।
इस किताब की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसको लिखने वाले ने कम ही सही लेकिन इमाम हसन असकरी अ.स. के ज़माने को देखा है और नुव्वाबे अरबआ (वह 4 बुज़ुर्ग हस्तियां जो इमाम ज़माना अ.स. से संबंध का माध्यम थीं) के दौर में इस किताब को लिखा है। इस किताब को किसी प्रेस ने चार तो किसी ने 6 तो किसी ने इस से ज़्यादा या कम में छापा है, इस किताब का फ़ारसी, उर्दू और भी दुनिया की कई ज़बानों में तर्जुमा किया जा चुका है। ....................


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