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Code : 192063
Date of publication : 14/2/2018 3:57
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पहली बार फ़ौज की वर्दी पहनी....

उस समय तक किसी आलिमे दीन ने फ़ौजी वर्दी नहीं पहनी थी, मेरे फ़ौजी वर्दी पहनने के बाद 2-3 महीने तक जितने उलमा बार्डर पर ख़ुर्रम शहर या आबादान आ जा रहे थे सभी अम्मामे और रूहानी लिबास में थे लेकिन 3 महीने बाद से धीरे धीरे बदलाव शुरू हो गया और सभी फ़ौजी लिबास पहनने लगे, हालांकि कुछ लोग थे जो फ़ौजी वर्दी के साथ अम्मामा भी लगाते थे

विलायत पोर्टल :  एक रात शहीद चमरान के कहा, क्या आज रात आप लोग छापामार कार्यवाही के लिए तैयार हैं ? हम लोगों मे कहा ठीक है । इस कार्यवाही का कारण यह था कि उनको ख़बर मिली थी कि, दुश्मन की फ़ौज बख़्तरबंद वाहनों के साथ हम से क़रीब आ गई है, यानी क़रीब 13-14 किलोमीटर की दूरी तक दुश्मन की फ़ौज आ चुकी थी, शहीद चमरान ने कहा कि अगर सब तैयार हों तो आज रात हम लोग निकलें, मैंने कहा हम लोग तैयार हैं । हमारे कुछ जवान इस कार्यवाही के लिए बहुत उत्सुक थे, जिसे देख कर लग रहा था कि उन्होंने फ़ौजी ट्रेनिंग भी पहले से ले रखी है, जिनमे ख़ुद शहीद चमरान भी शामिल थे जिन्होंने गुरिल्ला हमलों का तजुर्बा था, और लेबनान में इस तकनीक का काफ़ी अभ्यास कर रखा था, और इस हमले की ट्रेनिंग भी ले रखी थी । हम सब ने अपनी फ़ौजी ड्रेस पहनी, मेरे लिए यह पहली बार थी कि मैं फ़ौजी वर्दी पहन रहा था, उस समय तक किसी आलिमे दीन ने फ़ौजी वर्दी नहीं पहनी थी, मेरे फ़ौजी वर्दी पहनने के बाद 2-3 महीने तक जितने उलमा बार्डर पर ख़ुर्रम शहर या आबादान आ जा रहे थे सभी अम्मामे और रूहानी लिबास में थे लेकिन 3 महीने बाद से धीरे धीरे बदलाव शुरू हो गया और सभी फ़ौजी लिबास पहनने लगे, हालांकि कुछ लोग थे जो फ़ौजी वर्दी के साथ अम्मामा भी लगाते थे, हम ने उस रात पहली बार फ़ौजी वर्दी, फ़ौज की कैप और फ़ौजी बूट पहने और एक AK-47 हमारे हाथ में थी।
(6 जनवरी 1987 में उम्मीदे इंक़ेलाब नामी पत्रिका से इंटरव्यू के दौरान आयतुल्लाह ख़ामेनई का बयान)
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