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Date of publication : 24/12/2017 7:48
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हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी अ.स.

अबू हम्माद राज़ी को कहते हुए सुना कि मैं सामरा में इमाम अली नक़ी अ.स. के पास था मैंने सोंचा कुछ शरई अहकाम आपसे पूछ लूं, इमाम अ.स. ने मेरे सवालों का जवाब दिया और जब मैं वहां से चलने लगा तो इमाम अ.स. ने कहा ऐ अबू हम्माद जब कभी तुम्हारे इलाक़े में कोई मुश्किल या कोई सवाल हो तो अब्दुल अज़ीम हसनी (अ.स.) से पूछ लिया करो और हां जब उनके पास जाना तो मेरा सलाम कह देना।


विलायत पोर्टल : आप का शुमार बड़ी इल्मी और समाजी शख़्सियतों में होता है, यह और बात है कि जिस तरह आपको पहचाना जाना चाहिए वैसा नहीं पहचाना गया।
आप इमाम हसन अ.स. की पांचवी पीढ़ी से थे, इल्मे रेजाल के महान आलिम अहमद इब्ने अली नज्जाशी आपके वंश के बारे में लिखते हैं कि जिस समय आपकी वफ़ात के बाद आपको ग़ुस्ल देने के लिए कपड़े उतारे गए तो आपकी जेब में आपका लिखा हुआ एक लेख मिला जिसमें आपका वंश इस तरह लिखा था मैं अबुल क़ासिम अब्दुल अज़ीम इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने अली इब्ने हसन इब्ने ज़ैद इब्ने अली इब्ने हसन इब्ने अली इब्ने अबू तालिब हूं। (रेजाले नज्जाशी, जिल्द 2, पेज 67) आपके घराने और ख़ानदान पर नज़र डालने के बाद दो अहम चीज़ें दिखाई देती हैं।
1. आपके पूरे घराने ने ज़ुल्म, अत्याचार और उस समय के ज़ालिम हाकिमों के विरुध्द भरपूर आवाज़ उठाई जिसके कारण आपके वालिद ने ज़ालिम हाकिम की जेल में वफ़ात पाई और आप अपने वालिद को देख तक न सके, इसी तरह आपके दादा को भी ज़ुल्म का विरोध करने पर क़ैद किया गया था।
2. आप के घराने की गरिमा, मर्यादा, आत्म सम्मान और समाज के दबे कुचले लोगों को सहारा देने के गवाह आपके दौर में बे शुमार थे। (कीमियाए मोहब्बत, पेज 210) आप का नाम अब्दुल अज़ीम और आपकी कुन्नियत अबुल क़ासिम थी, आप 4 रबीउस्सानी 173 हिजरी को हारून रशीद की हुकूमत के दौर में अपने जद इमाम हसन अ.स. के घर में पैदा हुए और 79 साल 6 महीने 16 दिन की उम्र में मोअतज़ बिल्लाह की हुकूमत में आपकी वफ़ात हुई। (मजमूअए मक़ालात कुंगरए बुज़ुर्गदाश्त हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी अ.स., जिल्द 3, पेज 181-185)
आपने पांच इमामों के दौर को देखा है, आप सातवें इमाम, इमाम काज़िम अ.स. से लेकर ग्यारहवें इमाम, इमाम हसन असकरी अ.स. के दौर तक थे, हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि आप इन सभी इमाम के शागिर्द रहे या उनसे हदीस नक़्ल की है। इसिहास में जिस बात का होना यक़ीनी है वह यह है कि आपने इमाम मोहम्मद तक़ी अ.स. और इमाम हसन असकरी अ.स. से हदीसें नक़्ल की हैं, और शैख़ मुफ़ीद ने अपनी किताब अल-एख़्तेसास में इमाम रज़ा अ.स. से भी हदीस नक़्ल करने का ज़िक्र किया है। (हालांकि शैख़ मुफ़ीद की इस बात को काफ़ी उलमा ने क़ुबूल नहीं किया है, अधिक जानकारी के लिए पढ़ें, मोजमुर-रेजालिल-हदीस, जिल्द 10, पेज49)
आपके इल्मी मर्तबे को समझने के लिए यही काफ़ी है कि मासूम इमाम अ.स. ने अक़ीदे अहकाम और भी बहुत से दीनी सवालों के जवाब के लिए लोगों को आपका हवाला देते हुए आपसे पूछने को कहा, जैसाकि साहेब इब्ने उब्बाद ने अपने किताब जो आपकी ज़िंदगी के बारे में लिखी है (ख़ातमए मुस्तदरकुल वसाएल, जिल्द 4, पेज 404) आप लिखते हैं कि अबू तुराब रोयानी से नक़्ल है कि वह कहते हैं कि मैंने अबू हम्माद राज़ी को कहते हुए सुना कि मैं सामरा में इमाम अली नक़ी अ.स. के पास था मैंने सोंचा कुछ शरई अहकाम आपसे पूछ लूं, इमाम अ.स. ने मेरे सवालों का जवाब दिया और जब मैं वहां से चलने लगा तो इमाम अ.स. ने कहा ऐ अबू हम्माद जब कभी तुम्हारे इलाक़े में कोई मुश्किल या कोई सवाल हो तो अब्दुल अज़ीम हसनी (अ.स.) से पूछ लिया करो और हां जब उनके पास जाना तो मेरा सलाम कह देना। (मजमूअए रेसालेहाए ख़त्ती व संगी, पेज 23 (रिसालतुन फ़ी फ़ज़लि अब्दिल अज़ीम अ.स.), साहेब इब्ने उब्बाद)
आपकी मानवियत के बारे में यही काफ़ी है कि मासूम इमाम अ.स. ने आपकी ज़ियारत के सवाब को इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के सवाब के बराबर कहा गया है, जैसाकि शैख़ुल मोहद्देसीन सदूक़ र.ह. ने मोहम्मद इब्ने यहया अत्तार जो रय के रहने वाले हैं उनसे इस तरह नक़्ल किया है कि मैं इमाम अली नक़ी अ.स. के पास गया तो उन्होंने पूछा कहां थे तुम? मैंने कहा इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत के लिए कर्बला गया था, तो आपने फ़रमाया कि याद रहे अगर तुम ने अपने ही शहर में हज़रत अब्दुल अज़ीम हसनी अ.स. की ज़ियारत की समझो कि इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की। (सवाबुल आमाल, पेज 124)
आपका अपने वतन को छोड़ कर रय शहर की तरफ़ हिजरत करने का असली कारण ज़िक्र नहीं है, लेकिन हालात और परिस्तिथियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि आपकी इल्मी और समाजी शख़्सियत को देखते हुए हुकूमत बुरी तरह आपसे डरी हुई थी जिससे उसने आप पर कड़ी नज़र रखी हुई थी, इसलिए हो सकता है कि इमाम हसन असकरी अ.स. के इशारे पर आप ने अन्जानी ज़िंदगी को चुनते हुए मदीने से रय शहर की ओर हिजरत की ताकि आपकी शख़्सियत से शिया ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा उठा सकें। (मोजमुल बुलदान, जिल्द 3, पेज 205)
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