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Code : 191032
Date of publication : 20/12/2017 7:55
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पुले सेरात

जो भी पुले सेरात से हवा जैसी रफ़्तार से गुज़रना चाहता है उसको मेरे जानशीन मेरे मददगार और मेरे ख़लीफ़ा से सच्ची मोहब्बत करनी चाहिए, और जो जहन्नम की आग में जाना चाहता है उसे अली (अ.स.) की विलायत का इंकार कर देना चाहिए।

विलायत पोर्टल :  सेरात सीधे रास्ते को कहते हैं, और सेरात जहन्नम के ऊपर बने हुए पुल को भी कहते हैं जिसके ऊपर से हर इंसान को गुज़रना होगा, लेकिन हर इंसान के गुज़रने और उसके हिसाब किताब का तरीक़ा अलग होगा। इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं पुले सेरात से गुज़रने का हर किसी का अलग तरीक़ा होगा, कुछ लोग होंगे जो बिजली की तरह, कुछ हवा की तरह, कुछ घोड़े तो कुछ इंसानों के दौड़ने की रफ़्तार से, कुछ पैदल चलने वालों की तरह, और कुछ लोग गिरते पड़ते बदन में आग लगी हुई ऐसे भी गुज़र रहे होंगे। (अमाली सदूक़, पेज 107, बिहारुल अनवार, जिल्द 8, पेज 64)
वह आमाल जो हमारे पुले सेरात से बिजली जैसी रफ़्तार में गुज़रने में मदद करेंगे वह कुछ इस तरह हैं।
1. वह शख़्स जो इमाम अली अ.स. की विलायत को क़बूल करते हुए उनकी पैरवी करेगा वह क़यामत में पुले सेरात से बिजली की रफ़्तार में गुज़र जाएगा। (तर्जुमा-फ़ज़ाएलुश-शिया, पेज 5)
इसी तरह पैग़म्बर स.अ. की एक और हदीस में मिलता है कि जो भी पुले सेरात से हवा जैसी रफ़्तार से गुज़रना चाहता है उसको मेरे जानशीन मेरे मददगार और मेरे ख़लीफ़ा से सच्ची मोहब्बत करनी चाहिए, और जो जहन्नम की आग में जाना चाहता है उसे अली (अ.स.) की विलायत का इंकार कर देना चाहिए। (शवाहेदुत-तंज़ील, तर्जुमा-रूहानी, पेज 42)
इसी तरह हज़रत ज़हरा स.अ. के बारे में भी हदीस में मौजूद है कि आपके चाहने वाले पुले सेरात से बिजली जैसी रफ़्तार से गुज़र जाएंगे। (सवाबुल आमाल, तर्जुमा-हसन ज़ादे, पेज 505)
2. किसी भी जगह और किसी भी परिस्तिथि में नमाज़ जमाअत को अहम और ज़रूरी समझना, और जो नमाज़ के पाबंद हैं उनका अपने आप को जमाअत का पाबंद बनाना, क्योंकि जो भी नमाज़ को जमाअत के साथ पाबंदी से अदा करता है वह क़यामत में चौदहवीं के चांद की तरह बिजली की रफ़्तार से पुले सेरात से गुज़र जाएगा। (पादाशे नेकीहा व कैफ़रे गुनाहान, पेज 746, सवाबुल आमाल व एक़ाबुल आमाल, शैख़ सदूक़, तर्जुमा-हसन ज़ादे, पेज 673)
नमाज़ को उसके समय आते ही पढ़ने की अहमियत के बारे में एक सहाबी से पैग़म्बर स.अ. की हदीस नक़्ल हुई है कि आपने फ़रमाया जो भी नमाज़ को उसके समय होते ही पढ़ेगा अल्लाह उसके बदले नौ चीज़ें देगा,
1. वह अल्लाह का महबूब बंदा कहलाएगा
2. उसका बदन क़यामत में भी सही सलामत रहेगा
3. फ़रिश्ते उसकी सुरक्षा करेंगे
4. उसके घर बरकतें नाज़िल होंगी
5. उसमें नेक बंदों की विशेषताएं पैदा होंगी
6. उसका दिल नर्म होगा
7. पुले सेरात से बिजली की रफ़्तार से गुज़रेगा
8. जहन्नम की आग से बचा रहेगा
9. क़यामत में ऐसे लोगों का साथ मिलेगा जिन्हें न किसी तरह का डर होगा, न किसी तरह का ग़म। (नसाएह, पेज 296)
3. पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया जो हलाल रास्ते से रिज़्क़ कमा कर खाएगा वह पुले सेरात से आसानी से गुज़र जाएगा (अल-हयात, तर्जुमा-अहमद आराम, जिल्द 5, पेज 432) इस हदीस की रौशनी में यह बात समझ में आती है कि अल्लाह की ओर से क़ानून यह है कि उसके नेक बंदे आसानी से पुले सेरात से गुज़र जाएं, तभी एक ऐसी चीज़ जिसे एक संस्कारी और सभ्य ग़ैर मुस्लिम भी ज़रूरी समझता है उस पर इतना बड़ा सवाब रखा है, और ध्यान रहे हलाल कमाई से रिज़्क़ वही हासिल कर पाएगा जिसके पास तक़वा होगा।
4. बीमारी पर सब्र करने से भी पुले सेरात पर गुज़रने में आसानी होगी, जो शख़्स पूरे दिन किसी बीमारी की तकलीफ़ को सहन करे और अपनी तकलीफ़ की शिकायत किसी के सामने बयान न करे, उसे अल्लाह क़यामत में हज़रत इब्राहीम के साथ पलटाएगा और वह पुले सेरात से बिजली से भी तेज़ रफ़्तार से गुज़र जाएगा। (मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, तर्जुमा-अहमद ग़फ़्फ़ारी, जिल्द 5, पेज 305)
5. क़र्ज़ के तौर पर दी जाने वाली रक़म की वापसी पर सब्र करना, जैसा कि हदीस में है कि अल्लाह क़र्ज़ में दिए जाने वाले हर दिरहम के बदले ओहद, रज़वा और तूरे सीना जैसे पहाड़ों के बराबर नेकी उसके आमाल नामे में लिखेगा, और क़र्ज़ की वापसी की तारीख़ पर अगर वह वापस न कर पा रहा हो तो वह सब्र करते हुए उसे मोहलत दे दे, तो क़यामत में हिसाब किताब के दिन अज़ाब से बचा रहेगा और पुले सेरात से आसानी से गुज़र जाएगा। (सवाबुल आमाल, तर्जुमा-हसन ज़ादेह, पेज 667)
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