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Date of publication : 7/12/2017 18:44
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नबी और इमाम का मासूम होना

उनके गुनाह न करने का असली कारण उनका गुनाह के प्रभाव का जान लेना है, जिस प्रकार हम किसी तरह की गंदगी के खाने का विचार तक मन में नहीं लाते, उसी प्रकार वह भी गुनाह की हक़ीक़त को जानते हुए उसके बारे में सोचते तक नहीं हैं।

विलायत पोर्टल :  शिया इस्ना अशरी का अक़ीदा है कि, नबी और इमाम हर तरह की बुराई और गुनाह से पाक हैं। नबी और इमाम क्यों मासूम हैं? नबी और इमाम का मासूम होना और हर तरह के गुनाह और बुराई से दूर रहने का कारण उनकी मारेफ़त और अंतर्दृष्टि है, जो अल्लाह की एक विशेष कृपा है, जिसका परिणाम यह है कि वह इसी मारेफ़त और अंतर्दृष्टि से गुनाह की गंदगी और उसके अंदर छिपी बुराई को समझ लेते हैं और फिर उसके निकट नहीं जाते। (नश्रे आज़मून साले सिव्वुमे राहनुमाई, पेज 588)
उनके गुनाह न करने का असली कारण उनका गुनाह के प्रभाव का जान लेना है, जिस प्रकार हम किसी तरह की गंदगी के खाने का विचार तक मन में नहीं लाते, उसी प्रकार वह भी गुनाह की हक़ीक़त को जानते हुए उसके बारे में सोचते तक नहीं हैं। या इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि, उन्हें अल्लाह की इतनी अधिक मारेफ़त है कि वह उसके विरोध के बारे में सोच भी नहीं सकते। नबी और इमाम का मासूम होना क्यों अनिवार्य है?
1. अगर वह मासूम न हों तो उन पर (विशेष रूप से अल्लाह की ओर से लाए हुए उसके अहकाम पर) विश्वास नहीं किया जा सकता, और जब विश्वास नहीं होगा तो उनकी बातों पर अमल नहीं होगा और यह नबी और इमाम के भेजे जाने के मक़सद के ख़िलाफ़ है।
2. नबी और इमाम अगर मासूम नहीं होंगे तो गुनाह करेंगे, और इस प्रकार एक ओर से उनकी पैरवी और दूसरी ओर से गुनाह करने के कारण उनके विरोध का वाजिब होना हम सब पर वाजिब हो जाएगा और यह काम अक़्ल के ख़िलाफ़ है, क्योंकि यह ऐसा काम है जिस को करने में हम सक्षम नहीं हैं।
3. नबी और इमाम अगर गुनाह करेंगे तो हम लोगों पर बुराईयों से रोकने का फ़रीज़ा वाजिब होगा और हमारी रोक टोक से उन्हें तकलीफ़ होगी, यह ख़ुद एक हराम काम है।
4. अगर नबी और इमाम मासूम न हों और गुनाह करें इस से लोगों के सामने उनकी छवि ख़राब होगी। (ईज़ाहुल् मुराद फ़ी शरहि कश्फ़िल् मुराद, पेज 15-17)
इसी कारण उनका मासूम होना अनिवार्य है, जिस से लोग अपने जीवन की हर आवश्यकता को बग़ैर कम और ज़्यादा किये हुए ले सकें , और यह उसी समय होगा जब वह हर प्रकार के गुनाह और ग़लती से सुरक्षित हों, और दूसरी बात यह कि अगर वह मासूम नहीं होगें तो उनकी छवि ख़राब हो जाएगी जिस से कोई भी उनकी पैरवी नहीं करेगा, और फिर वह लोग जो गुनाह नहीं करते होंगे वह इन नबी और इमाम से (मआज़ अल्लाह) बेहतर हो जाएंगे और बेहतर को छोड़ कर उनको नबी या इमाम बनाना यह अक़्ल के ख़िलाफ़ बात है।
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