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Code : 190507
Date of publication : 18/11/2017 19:9
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मोहर्रम की बरकत , शहीद हुजजी ने बदल दी मेरी ज़िन्दगी ।

इस बार मैंने शहीद हुजजी को देखा जो अपने हाथ में एक परचम उठाये हुए थे । उन्होंने अपना परिचय देने के बाद कहा कि शहादत मेरी आरज़ू थी मैंने अपना सर दे दिया ताकि तुम्हारे सर पर रिदा बाक़ी रहे, अगर अपने पर्दे का ख्याल रखो तो अल्लाह के नज़दीक तुम्हारा मक़ाम और मर्तबा बहुत बुलंद है ।


विलायत पोर्टल :  हमें कभी कभी अपने आस पास रहने वाले लोगों की ज़िंदगियों में आये ऐसे बदलाव के बारे में सुनने को मिलता है जिसे सुनकर विश्वास करना आसान नहीं होता, ईरान नेशनल टीवी पर एक कर्यक्रम में सुबह सवेरे ऐसे ही लोगों पर चर्चा और साक्षात्कार हो रहा है ।
हम नीचे ऐसी ही एक घटना का विवरण को अपने पाठकों के लिए दे रहे हैं । यह घटना उस महिला है की जिस ने सपने शहीद हुजजी को देखने के बाद अपनी ज़िन्दगी की धारा को हो मोड़ लिया ।
मेरा पति बेशर्म नहीं था पहले मेरा पहनावा बहुत अच्छा नहीं था बल्कि ऐसा था कि जिसे देख कर कहा जा सकता था कि ठीक से पर्दा नहीं किया है । मैं ऐसे रंग बिरंगे कपडे पहनती थी जो दूसरों को अपनी और आकर्षित करें, मैं सोचती थी की पर्दा करना कोई कमाल नहीं है लेकिन ऐसे रंग बिरंगे कपडे पहन कर सार्वजानिक स्थानों पर आना और नामहरमों की चुभती निगाहों के बाद भी सुरक्षित रहना हुनर है । मेरा शौहर मेरे पहनावे से राज़ी नहीं था लेकिन में उस पर अपनी मर्ज़ी थोपती थी मेरा शौहर बेशर्म नहीं था मगर वह अंदर अंदर टूट रहा था ।
पर्दादार औरतों का मज़ाक़ बनाती थी मेरी उम्र ३२ साल है अल्लाह का शुक्र कि आज मैं कह सकती हूँ कि एक पर्दादार खातून हूँ । आज भी जब मैं किसी ऐसी खतून को देखती हूँ जिसका हिजाब सही न हो तो उसे टोकने की हिम्मत नहीं कर पाती और न ही उस पर अपने अक़ीदे और विश्वास को थोपने की कोशिश करती हूँ । मेरे 16 और 14 वर्षीय दो बेटे हैं जो मेरे साथ कहीं जाने को तैयार नहीं होते थे, एक 3 वर्षीय बेटी भी है जिसे में अपनी वेशभूषा में अपने साथ रखती थी । मैं हमेश सोचती थी कि हिजाब और पर्दा रूढ़िवादी और पिछड़ेपन का कारण है मैं पर्दादार औरतों का मज़ाक़ उड़ाती थी और आज खुद जब पर्दा करती हूँ तो उस दर्द से गुज़र रही हूँ । मैं ने जिस दिन हिजाब लेना शुरू किया उस दिन मुझे बहुत आत्मग्लानि हुई मैं एक स्टेशनरी चलाती हूँ जब मैं हिजाब पहन कर अपनी शॉप पर गयी तो बहुत से जान पहचान वाले भी मुझे नहीं पहचान पा रहे थे । वास्तव में हिजाब मेरी हिफाज़त के लिए एक प्रमुख हथियार बन गया है ।
शबे 4 मोहर्रम इस साल मोहर्रम में एक घटना हुई जिसने मेरी ज़िन्दगी का रुख ही बदल दिया मुझे इस से पहले रौज़ों की रक्षा करने वालों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी मेरा विश्वास था कि यह लोग अवसरवादी हैं जो अपने परिवार को छोड़कर दूसरे देश में मरने के लिए चले जाते हैं । यहाँ तक कि मैंने रौज़ों की रक्षा के लिए युद्ध कर रहे एक जवान का उस समय अपमान किया जब उसे शहीद किया जा रहा था । 3 मोहर्रम की रात को मैंने ख्वाब में देखा कि कुछ पर्दादार खातून मुझे एक चादर दे रहीं हैं मैं जाग कर उठा गयी थोड़ी देर बाद फिर सोई तो यही ख्वाब देखा कि उन औरतों ने मेरे सर पर मक़ना रखकर मेरी पेशानी को चूम लिया मैंने उनके काम पर आपत्ति जताई नींद से जाग कर मैंने सोचा के इस सपने को अपने शौहर से बयान करूँ लेकिन कहते हैं कि बुरे ख्वाब बताना नहीं चाहिए इस लिए चुप रही सुबह उठ कर भी मैं किसी को इस ख़्वाब के बारे में बता नहीं पा रही थी ।
अभी कुछ घंटे भी नहीं गुज़रे थे कि मैंने एक बार फिर वैसा ही सपना देखा इस बार मैंने शहीद हुजजी को देखा जो अपने हाथ में एक परचम उठाये हुए थे । उन्होंने अपना परिचय देने के बाद कहा कि शहादत मेरी आरज़ू थी मैंने अपना सर दे दिया ताकि तुम्हारे सर पर रिदा बाक़ी रहे, अगर अपने पर्दे का ख्याल रखो तो अल्लाह के नज़दीक तुम्हारा मक़ाम और मर्तबा बहुत बुलंद है ।
मैं इस से पहले शहीद मोहसिन हुजजी को एकदम नहीं जानती थी, मैंने सोशल मीडिया पर शहीद हुजजी को सर्च किया और उनके बारे में पढ़ा और पर्दे के बारे में उनके विचार और उनकी चिंताओं को समझा । शहीद को पहचानने के बाद में बदल कर रह गयी, मेरी आँखों से आंसू नहीं रुक रहे थे मैंने अपने शौहर को बताया और उस से कहा कि मैं चादर { मुकम्मल हिजाब }में रहना चाहती हूँ , मेरे शौहर ने कहा कि अगर भावना में बहकर पर्दा करना चाहती हो और थोड़े समय बाद फिर अपने फैसले से पलटने का इरादा है तो बेहतर यह है कि तुम हिजाब न करो । मैं अपने ख्वाब की ताबीर तलाश रही थी और अहसास कर रही थी कि इस ख्वाब की ताबीर यह है कि मैं मुकम्मल हिजाब में आ जाऊँ ।
अंतिम निर्णय मेरे शौहर मेरे हिजाब के फैसले का समर्थन नहीं कर रहे थे मैं अजीब उलझन में थी कि एक बार फिर शहीद हुजजी को देखा उन्होंने मुझे एक तोहफा दिया जो हरे रंग के कपडे से छुपा हुआ था, मैंने उस कपडे को हटाकर देखा तो शहीद मोहसिन का सर था मैं ड़र के मारे उठ गयी और उसी पल फैसला कर लिया कि मैं हिजाब पहनूंगी । मैंने सुबह सवेरे उठते ही अपनी स्टेशनरी के पास से मुकम्मल हिजाब खरीदा मैंने जब दुकानदार को अपना ख्वाब बताया तो वो बहुत प्रसन्न हुआ मैंने उसी के बाद से अपनी दुकान पर शहीद हुजजी का पोस्टर लगाया, जब कोई शहीद पर कोई कमेंट करता या कोई व्यंग्य करता तो मेरा दिल करता कि अपनी पूरी क्षमता से उसका जवाब दूँ , मेरे शौहर कभी मेरा समर्थन करते तो कभी मेरे अतीत के कारण चुप रहते ।
एक दिन मेरे शौहर ने इरादा किया कि हम शहीद हुजजी के शहर नजफ़ आबाद जाएँ कुछ और जानकारों ने हमारे साथ आने की हामी भरी, उन दिनों खबर थी कि शहीद की लाश को इस्फ़हान लाया जा रहा है । हम 35 लोगों ने इस्फ़हान आने की तैयारी कर ली, मेरे बेटे और पति भी चेहलुम में कर्बला जाने की तैयारी करने लगे । जब हम अपनी मन्ज़िल पर पहुंचे तो मैं और लोगों से अलग होकर तेज़ तेज़ क़दम उठाती हुई शहीद की क़ब्र की ओर लपकी , भीड़ के कारण आगे बढ़ने से रोक दिया गया मैंने उत्सुकता में सीढ़ी से चढ़कर शहीद की क़ब्र की ज़ियारत की । मैंने रोते हुए मांग की कि मुझे शहीद की क़ब्र पर जाने दिया जाये शहीद की क़ब्र पर हाल ही में तख्ती लगायी गयी थी , मेरे बार बार कहने पर मुझे शहीद की क़ब्र पर जाने दिया गया, मैंने शहीद को सम्बोधित करते हुए कहा कि मैंने आपकी बातों पर अमल करना शुरू कर दिया है, अब आप खुद मेरी रक्षा करना ।
शहीद की क़ब्र पर हाज़िरी देने के बाद मुझे लगा कि मेरे सर से बोझ उतर गया है मेरे आस पास कोई तेज़ निगाहें नहीं थी । अचानक मैं उसी अवस्था में बेहोश हो गयी, होश में आई तो मैंने एक बार फिर शहीद की बारगाह की ज़ियारत की । हमें एक घर में दावत दी गयी सब हमसे बहुत सम्मान और आदर के साथ मिले हमे एक आत्मीय सुकून का अहसास हुआ, हमने इस दावत का कारण पुछा तो कहा गया कि हम शहीद मोहसिन के ख़ानदान के लोग हैं और यह समझते हैं कि अगर मोहसिन हुजजी किसी को दावत देता है तो उनकी आबरू और सम्मान की रक्षा करता है ।
इस घटना के बाद मुझे शहीदों से बहुत मोहब्बत हो गयी है, शहीद मुझे बहुत प्यारे हैं, मैं अपने हालात और अपने वर्तमान से बहुत खुश हूँ लेकिन अपने अतीत से नहीं ।
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फ़ार्स न्यूज़


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