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Date of publication : 18/11/2017 16:17
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इमाम हसन अ.स. के दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्तिथियां

इमाम हसन अ.स. की सुलह ने ही कर्बला में इमाम हुसैन अ.स. के इंक़ेलाब की बुनियाद रखी थी, क्योंकि इमाम हसन अ.स. ने सुलह की शर्तों को इस तरह रखा था कि माविया और उसकी पूरी नस्ल की हर तरह की मक्कारी और चालबाज़ी के हर रास्ते को बंद कर दिया


विलायत पोर्टल : इमाम हसन अ.स. जिस समय ख़लीफ़ा बने माविया की ओर से बहुत सी बाधाएं खड़ी की गईं, आप उसकी ग़लत और गंदी राजनीति का विरोध करते हुए उसके मुक़ाबले और उसका रास्ता रोकने के लिए ख़ुद भी तैय्यार हुए और लोगों को भी तैय्यार किया, लेकिन हालात और परिस्तिथियों ने इमाम अ.स. को माविया की चालों के मुक़ाबले और माविया द्वारा दीन की बर्बादी को रोकने के लिए दूसरा रास्ता चुनने पर मजबूर हुए। (पासुख़ बे शुबहाते वाक़ेअए आशूरा, अली असग़र रिज़वानी, पेज 35) इमाम अ.स. के दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्तिथियां
1. इतिहास में एक बात जिसको अधिकतर लोगों ने लिखा है वह यह कि माविया एक नंबर का चालाक और मक्कार था और लोगों के सामने दिखावा करते हुए थोड़ा बहुत दीन के अहकाम पर अमल भी करता था, लेकिन अंदर ही अंदर इस्लाम से उसकी दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है, और यह भी किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रखता कि वह किसी भी इस्लामी हुक्म का पाबंद नहीं था, लेकिन अपनी मक्कारी के चलते अपनी इस बात को वह कभी किसी के समाने ज़ाहिर नहीं करता था, (पासुख़ बे शुबहाते वाक़ेअए आशूरा, अली असग़र रिज़वानी, पेज 319) उसके अंदर के फ़साद क्योंकि सारे लोगों के सामने नहीं आ सके थे इसलिए कुछ लोग उसे पैग़म्बर स.अ. का ख़लीफ़ा और इस्लाम का प्रचारक समझते थे, यही कारण है कि जब इमाम हुसैन अ.स.ने इराक़ की जनता की ओर से माविया के विरुध्द आंदोलन करने के लिए बहुत बड़ी तादाद में ख़त लिखने वालों के जवाब में कहा कि अल्लाह तुम लोगों पर रहमत नाज़िल करे, लेकिन अभी किसी तरह के आंदोलन का सही समय नहीं है, जब तक माविया ज़िंदा है अपने अपने घरों में बैठे रहो। (आलामुल हिदायत, इमाम हुसैन अ.स., पेज 147)
2. ख़्वारिज का उभर के सामने आना और वफ़ादार कमांडरों और साथियों का न होना (कुछ रिवायतों में है कि इमाम अली अ.स. जिस किसी को भी कमांडर बनाते माविया उसे दिरहम और दीनार दे कर ख़रीद लेता (पासुख़ बे शुबहाते वाक़ेअए आशूरा, अली असग़र रिज़वानी, पेज 316) इसी तरह आपसी कुछ मतभेदों और जंगी तकनीक में लोगों को कमज़ोर देखते हुए इमाम हसन अ.स. ने अपने इरादे को बदल दिया, इसके अलावा ख़ुद लोग भी माविया के साथ जंग करने के लिए तैय्यार नहीं थे, आपके सुलह करने की दलीलों में एक यह भी है जिसे ख़ुद इमाम अ.स. ने फरमाया, मैंने देखा कि अधिकतर लोग सुलह चाह रहे हैं और माविया के साथ जंग के लिए तैय्यार नहीं हैं, मैंने लोगों को जिस चीज़ को पसंद नहीं कर रहे थे उस ओर उभारना सही नहीं समझा, इसीलिए कुछ साथियों की जान के बचाने के लिए मैंने सुलह की। (आलामुल हिदायत, पेज 147)
3. इमाम हसन अ.स उस समय मुसलमानों के ख़लीफ़ा थे, इसलिए अगर कम साथियों और जंगी तकनीक के बिना माविया से जंग करते तो नतीजा मुसलमानों की हार होती जिसके कारण पैग़म्बर के ख़लीफ़ा की हार कही जाती, यही वह कारण है जिसके बारे में आयतुल्लाह शहीद मुतह्हरी र.ह. कहते हैं कि इमाम हुसैन अ.स. भी माविया के मुक़ाबले इसी कारण के चलते इस तरह की जंग से बचते रहे, कि पैग़म्बर स.अ. का ख़लीफ़ा उनकी जगह पर होते हुए ख़िलाफ़त करते हुए क़त्ल न हो (सैरी दर सीरए आइम्मए अतहार अ.स., शहीद मुतह्हरी, पेज 77) यही कारण है कि इमाम हुसैन अ.स. मक्के में शहीद होने के लिए तैय्यार नहीं हुए, क्योंकि मक्का शहर की गरिमा ख़त्म हो जाती, इसीलिए उस समय किसी भी तरह की जंग और टकराव उचित नहीं था, क्योंकि उस से न केवल इस्लाम को कोई फ़ायदा न होता बल्कि मुसलमानों की काफ़ी जानें चली जातीं, उस समय मुसलमानों को जमा रखने उनके बीच आपसी मतभेद को सुलझाने और उनकी जानों के बचाने के लिए सुलह ही सबसे उचित और मज़बूत उपाय थी।
ध्यान देने की बात है कि माविया ने अपनी 20 साल की हुकूमत में इस्लाम के अहकाम के विपरीत अमल किया, जहां पाया जैसे पाया अत्याचार किया, इस्लामी अहकाम में फेरबदल किया, बैतुलमाल का जैसे चाहा बर्बाद किया, लोगों का ना हक़ ख़ून बहाया, सुलह नामे की किसी भी शर्त पर अमल नहीं किया, न अल्लाह की किताब न पैग़म्बर स.अ. की सुन्नत पर अमल किया, और फिर अपने बाद अपने शराबी, अय्याश और कुत्तों से खेलने वाले लड़के को अपना उत्तराधिकारी बना दिया (जबकि यह भी सुलह की शर्तों के विरुध्द था), लेकिन माविया की यह सभी करतूत इमाम हसन अ.स. के दौर में लोगों से छिपी थीं, लेकिन उसके अय्याश बेटे यज़ीद के दौर में जब यही सब खुले आम होने लगा तब इमाम हुसैन अ.स. जो कि अपने भाई इमाम हसन अ.स. के दौर में भी मौजूद थे लेकिन सुलह की शर्तों के कारण चुप थे, अब उन्होंने उन सब बुराईयों का विरोध किया जो यज़ीद खुले आम अंजाम दे रहा था, यही कारण है कि कहा जाता है कि इमाम हसन अ.स. की सुलह ने ही कर्बला में इमाम हुसैन अ.स. के इंक़ेलाब की बुनियाद रखी थी, क्योंकि इमाम हसन अ.स. ने सुलह की शर्तों को इस तरह रखा था कि माविया और उसकी पूरी नस्ल की हर तरह की मक्कारी और चालबाज़ी के हर रास्ते को बंद कर दिया था, यह और बात है कि माविया ने सुलह की उन शर्तों में से किसी पर अमल नहीं किया, लेकिन शर्तों पर अमल न करने के कारण वह उस समय के मुसलमानों में बुरी तरह ज़लील हुआ, और फिर अपने बाद उसने अपनी औलादों के लिए भी हर तरह के बहाने के रास्तों को बंद कर दिया।
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