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Date of publication : 11/9/2017 18:45
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अहले सुन्नत के चारों इमामों के नज़दीक मुसलमान को काफ़िर ठहराना हराम

नोमान इब्ने साबित से पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि किसी भी क़िब्ले वाले (मुसलमान) को किसी गुनाह की वजह से काफ़िर मत कहो, और किसी के ईमान पर शक न करो, अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर करो, और ध्यान रहे जो तुम तक पहुंच गया उसे तुम तक पहुंचना ही था, और जो नहीं पहुंचा है वह तुम्हारा था ही नहीं

विलायत पोर्टल :  किसी मुसलमान को काफ़िर ठहराना उन विषय में से है जिस का अहले सुन्नत की चारों मज़हबों की किताबों में ख़ास ध्यान दिया गया है, जिसमें से कुछ को हम यहां संक्षेप मे बयान कर रहे हैं।
हनफ़ी फ़िक़्ह अबुल हसन अली इब्ने अहमद फ़ारसी से यह कहते हुए रिवायत नक़्ल की है कि हमारे लिए यह रिवायत फ़क़ीह नसीर इब्ने यहया ने बयान की है और नसीर इब्ने यहया का कहना है कि मैंने अबु मुतीअ हकम इब्ने अब्दुल्लाह बल्ख़ी से सुना है कि जब मैंने अहले सुन्नत के उसूलों और सिध्दांतों के बारे में नोमान इब्ने साबित से पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि किसी भी क़िब्ले वाले (मुसलमान) को किसी गुनाह की वजह से काफ़िर मत कहो, और किसी के ईमान पर शक न करो, अम्र बिल मारूफ़ और नहि अनिल मुन्कर करो, और ध्यान रहे जो तुम तक पहुंच गया उसे तुम तक पहुंचना ही था, और जो नहीं पहुंचा है वह तुम्हारा था ही नहीं (यानी अल्लाह के हर फ़ैसले पर हमेशा राज़ी रहो), और पैग़म्बर स.अ. के किसी भी सहाबी से दूरी न बनाओ। (अल-शरहुल-मसीर अलल फ़िक़हैनिल अबसत वल अकबर, जिल्द 1, पेज 76) अगर कोई मुसलमान को काफ़िर कह कर पुकारे तो उसे ज़रूर सज़ा मिलनी चाहिए, यह पूछे जाने पर कि क्या किसी मुसलमान को काफ़िर समझने पर ख़ुद वह काफ़िर हो जाएगा, आपका जवाब यह था, कि हां बिल्कुल अगर उसके बारे में इसका काफ़िर होने का अक़ीदा बन चुका है तो यह ख़ुद काफ़िर है, यहां तक कि अगर काफ़िर पुकारने पर वह इंसान मुड़ के देखता है तो वह भी काफ़िर है। (अल-दुर्रुल मुख़्तार, जिल्द 2) अल-बहर नामी किताब में है कि अगर कोई किसी को काफ़िर या यहूदी कहे और उसके कहने का मक़सद केवल गाली देना हो काफ़िर समझना न हो उसे सज़ा दी जाएगी लेकिन उसे काफ़िर नहीं कहा जाएगा, लेकिन अगर इस अक़ीदे से कि वह काफ़िर है उसे काफ़िर पुकारे तो काफ़िर हो जाएगा क्योंकि उसने इस्लाम को काफ़िर कहा है। (मजमउल अनहार फ़ी शरहि मुलतक़ल बहर, जिल्द 4, पेज 214)
शाफ़ेई फ़िक़्ह शाफ़ेई का कहना है कि दो गिरोह के अलावा किसी भी मुसलमान को काफ़िर नहीं कहा जा सकता, पहला वह जो अल्लाह के जिस्म रखने का अक़ीदा रखता हो, दूसरे वह जो अल्लाह का हर छोटी से छोटी चीज़ के इल्म रखने का इंकार करता हो। शाफ़ेई मज़हब का अक़ीदा है कि, अल्लाह ने अपने रसूलों को भेजा ताकि लोगों को बुरे आमाल पर अल्लाह के अज़ाब और अच्छे कामों पर सवाब के बारे बता सकें, जिसके बाद लोगों के पास किसी तरह का बहाना न रह सके, और सच्चाई का रास्ता सब के सामने आ सके, अल्लाह के फ़ैसले पर और हर अच्छे और बुरे समय पर राज़ी रहना, ज़िंदगी के अच्छे और बुरे दिनों का हंस कर सामना करना, ग़ैब और हर उस चीज़ पर ईमान रखना जो हमारी आंखों के सामने नहीं है लेकिन अल्लाह ने हमको उसके बारे में ख़बर दी है, जैसे बरज़ख़, क़यामत, सवाब, अज़ाब, जन्नत और जहन्नम, और किसी को यह अधिकार नहीं है कि केवल गुनाह करने की वजह से उसे काफ़िर ठहरा के हमेशा के लिए जहन्नमी बना दें, सहाबा के बारे फ़ुज़ूल बहस से परहेज़ करें। (अल-तज़केरह)
मालिकी फ़िक़्ह कोई भी इंसान केवल गुनाह करने की वजह से काफ़िर नहीं होता, किसी को काफ़िर समझना गुनाहे कबीरा है या नहीं इसमें मतभेद पाया जाता है लेकिन किसी के काफ़िर कहने और समझने से कोई काफ़िर नहीं होता, कोई भी इंसान चाहे गुनाहे कबीरा अंजाम दे या सग़ीरा केवल गुनाह करने से उसको इस्लाम से ख़ारिज नहीं किया जा सकता, बस शर्त यह है कि वह गुनाह करने को जाएज़ न समझता हो। मालिकी मज़हब का कहना है कि अहले सुन्नत के सभी मज़हब के यही विचार हैं, केवल ख़्वारिज ऐसे हैं जिनका कहना है कि हर गुनाह, कबीरा ही होता है, और हर गुनाहे कबीरा इंसान के सारे आमाल को बर्बाद कर देता है, और गुनाहे कबीरा को अंजाम देने वाला काफ़िर होता है, इसके अलावा मोतज़ेलह फ़िर्क़ा है जिसका कहना है कि गुनाहे कबीरा के अंजाम देने से आमाल बर्बाद हो जाते हैं और वह न मोमिन कहलाएगा न ही काफ़िर बल्कि उसे फ़ासिक़ कहा जाएगा। (अल-फ़लाकिहुद-दवानी अला रिसालतिब्ने अबी ज़ैदिल क़ीरवानी, जिल्द 1, पेज 374)
हंबली फ़िक़्ह मुसलमानों को गुनाह के कारण काफ़िर ठहराना, बहुत सारे उन अहकाम की तरह है जिनमें मुसलमानों की बीच मतभेद पाया जाता है, लेकिन क़ुर्आन की आयात की रौशनी में कहा जा सकता है अल्लाह गुनाहों को माफ़ कर देता है, केवल ख़्वारिज ही हैं जिनके सबसे अलग विचार हैं, और इस टोले ने तो मुसलमानों के ख़लीफ़ा तक को काफ़िर कह दिया था।
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