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Date of publication : 10/9/2017 17:39
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वहाबियों के तबलीग़ी हथकंडे (5)

कुछ मुसलमानों का इब्ने तैमिया और उसके पैरवी करने वाले वहाबियों की हिमायत करने के कारण सऊदी और दूसरे इस्लामी देशों के लोगों में नफ़रत और दूरी बढ़ती चली गई, 1950 से 1960 ईस्वी के बीच शिया और सुन्नी के बड़े उलेमा के प्रयास से शिया और सुन्नी के बीच का अंतर काफ़ी कम हुआ, और इस बारे में क़ाहिरा मिस्र में उलेमा की कई मीटिंग हुईं, जबकि वहाबियों ने शिया और सुन्नी उलमा के आपसी दूरी मिटाने के प्रयास की कड़ी निंदा की, कुछ उलेमा वहाबियत ही को इस्लामी जगत और मुसलमानों के बीच आपसी विवाद का कारण समझते हैं, कुछ दूसरे उलमा इस टोले को सऊदी और दूसरे इस्लामी देशों के बीच क़ौमी एकता न हो पाने का कारण समझते हैं, सुन्नियों के उच्च कोटी के विद्वान डॉक्टर मोहम्मद अल-बाही का कहना है कि, वहाबियत ने शिया और सुन्नी के बीच की दूरी को और अधिक बढ़ाया है, और इसी से वहाबियत की नकारात्मक मानसिकता का पता चलता है।

विलायत पोर्टल : आप वहाबियों के तबलीग़ी हथकंडों के विषय में सच्चाई पर आधारित लेख पढ़ रहे हैं, जिस के 4 पार्ट आपके सामने आ चुके जिसमें 10 हथकंडों पर रौशनी डाली गई। अब आगे........
पुस्तकालय और इल्मी संसाधन का जलाना वहाबियों का सब से गिरा हुआ और घटिया काम जिसका धब्बा आज भी उनके दामन पर दिखाई देता है यह है कि इस टोले ने बड़े बड़े पुस्तकालय और इल्मी संसाधनों को आग लगा कर जला दिया, इन्होंने अल-मकतबतुल अरबिय्यह नाम से बड़े पुस्तकालय जिसमें 60 हज़ार नायाब किताबें और 40 हज़ार हाथ की लिखी किताबें जिसमें यहूदियों और काफ़िरों के द्वारा पैग़म्बर के विरुध्द अनुबंध भी थे उन सब में आग लगा दी, जिस में इमाम अली अ.स. अबू बक्र, उमर, ख़ालिद इब्ने वलीद, तारिक़ इब्ने ज़ियाद और पैग़म्बर के कई सहाबा जैसे अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद का हाथ से लिखा क़ुर्आन भी था इन वहाबियों ने सब के जला कर राख कर दिया, इसी पुस्तकालय में पैग़म्बर के दौर के हथियार और लात, उज़्ज़ा और होबल के बुत भी थे सब को जला कर ख़त्म कर दिया, इतिहासकारों के अनुसार वहाबियों ने इस पुस्तकालय को कुफ़्र का आरोप लगाते हुए जला कर नाबूद कर दिया। (सल्फ़ीगरी व पासुख़ बे शुबहात, पेज 194, नक़्ल अज़ तारीख़े आले सऊद, जिल्द 1 पेज 158)
ऊट पटांग फ़तवे वहाबी उलेमा ने अनेक बार शियों के विरुध्द ऊट पटांग फ़तवे दिए हैं और शिया मज़हब को यहूदियों, मजूसियों और ईसाईयों की पैदावार बता कर कहते हैं कि कुछ झूठी हदीसों और मूल्यहीन विचारों के अलावा शिया मज़हब कुछ नहीं है, शियों को न केवल यह कि मुसलमान नहीं मानते बल्कि इस्लाम के लिए ख़तरनाक भी कहते हैं, फ़ोवाद इब्राहीम पेगाह नामी पत्रिका में लिखते हैं कि यह बात सही है कि शिया सुन्नी फ़िर्क़े पैग़म्बर ही के समय से उनके उत्तराधिकारी चुने जाने को ले कर अलग हो गए थे लेकिन इब्ने तैमिया ने इस मामले में बहुत अहम किरदार निभाया है, वह सुन्नियों के बीच विवाद करने में मशहूर था, उसने बहुत ही चालाकी और होशियारी से शियों के विचारों और अक़ाएद की आलोचना और निंदा की, वहाबी उलमा ने उसी की चाल अपनाते हुए शियों का अपमान करना शुरू किया, कुछ मुसलमानों का इब्ने तैमिया और उसके पैरवी करने वाले वहाबियों की हिमायत करने के कारण सऊदी और दूसरे इस्लामी देशों के लोगों में नफ़रत और दूरी बढ़ती चली गई, 1950 से 1960 ईस्वी के बीच शिया और सुन्नी के बड़े उलमा के प्रयास से शिया और सुन्नी के बीच का अंतर काफ़ी कम हुआ, और इस बारे में क़ाहिरा मिस्र में उलमा की कई मीटिंग हुईं, जबकि वहाबियों ने शिया और सुन्नी उलमा के आपसी दूरी मिटाने के प्रयास की कड़ी निंदा की, कुछ उलमा वहाबियत ही को इस्लामी जगत और मुसलमानों के बीच आपसी विवाद का कारण समझते हैं, कुछ दूसरे उलमा इस टोले को सऊदी और दूसरे इस्लामी देशों के बीच क़ौमी एकता न हो पाने का कारण समझते हैं, सुन्नियों के उच्च कोटी के विद्वान डॉक्टर मोहम्मद अल-बाही का कहना है कि, वहाबियत ने शिया और सुन्नी के बीच की दूरी को और अधिक बढ़ाया है, और इसी से वहाबियत की नकारात्मक मानसिकता का पता चलता है। (नशरियए पेगाह, फ़ोवाद इब्राहीम, तर्जुमा महदी बहराम शाही, शुमारा 226, फ़रवरी 2008) इयान रिचर्ड का कहना है कि, शिया और सुन्नी के बीच शांतिपूर्ण माहौल मे रुकावट का एक कारण वहाबियत और उसके विचार हैं, हमीद इनायत ने भी वहाबियत को शियों के लिए हमेशा से चुनौतीपूर्ण लिखा है। (नशरियए पेगाह, फ़ोवाद इब्राहीम, तर्जुमा महदी बहराम शाही, शुमारा 226, फ़रवरी 2008)
क़ब्रों का विनाश इस्लाम के आने के बाद से आज तक जब भी कोई महान धार्मिक इंसान इस दुनिया से गुज़रा है, मुसलमान इस दुनिया में उस से मोहब्बत और उसके सम्मान को ध्यान में रखते हुए उसके दुनिया से गुज़र जाने के बाद भी उसका का सम्मान करते हुए इसकी अहमियत को और अधिक ध्यान में रखते हुए उसकी क़ब्र पर जाते हैं, और कभी उसी क़ब्र के किनारे अल्लाह की इबादत और उस से दुआ करते हैं, और क़ब्र पर आने वालों के आराम के लिए वहां इमारत भी बना देते हैं, और कभी उस गुज़र जाने वाले की पवित्रता को और सम्मान के लिए गुबंद और रौज़ा बनाते हैं और वहां पर उजाले के लिए रौशनी की व्यवस्था करते हैं, और ऐसा सभी इस्लामी युग में रहा है, लेकिन यह वहाबी टोला इन सभी सम्मान को शिर्क और बुतों की पूजा कहते हुए कड़ा विरोध जता कर अपने नापाक इरादों को हासिल करने की कोशिश करते हैं, अल्लामा नज्मुद्दीन तबसी ने इस बारे में कुछ फतवों का ज़िक्र किया है... सनआनी का कहना है कि, रौज़ा और मक़बरा बनाना बुतों की पूजा करने जैसा है जो कि जेहालत के दौर में बुतों के लिए बनाया जाता था, और यही काम शिया लोग कर रहे हैं, काम वही है लेकिन नाम बदल दिया है और नाम बदलने से काम नही बदलेगा। (रोइकर्दे अक़्लानी बर बावरहाए वहाबियत, नज्मुद्दीन तबसी, जिल्द 5, पेज 13) इब्ने तैमिया का इब्ने क़य्यिम नामी चेला कहता है कि, क़ब्रों का बनाना बुतों और मूर्ती की पूजा करने जैसा है, उनका ढ़हाना वाजिब है, और ढ़हाने की ताक़त आने के बाद एक दिन भी देर करना जाएज़ नहीं है, क्योंकि सभी मक़बरे और रौज़े लात और उज़्ज़ा नामी बुतों ही के जैसे हैं या शिर्क हैं। (रोइकर्दे अक़्लानी बर बावरहाए वहाबियत, नज्मुद्दीन तबसी, जिल्द 5, पेज 14) वहाबियों ने शैख़ अल-रक्बुल मग़रिबी के जवाब में लिखे गए ख़त में विस्तार से लिखा है कि, बेशक नबियों और उनके अलावा दूसरे लोगों के रौज़े और मक़बरे बनाना वह काम हैं जिनकी पैग़म्बर ने सूचना दी थी, आप ने फ़रमाया था कि, उस समय तक क़यामत नहीं आएगी जब तक मेरी उम्मत के कुछ लोग मुशरिक नहीं हो जाते, और कुछ लोग बुतों की पूजा शुरू नहीं कर देते। (रोइकर्दे अक़्लानी बर बावरहाए वहाबियत, नज्मुद्दीन तबसी, जिल्द 5, पेज 14) वहाबियों के चीफ़ जस्टिस अब्दुल्लाह इब्ने सुलैमान का उम्मुल क़ुरा नाम के समाचार पत्र में इस प्रकार बयान आया कि, पाँचवी सदी से पहले मक़बरा और रौज़ा बनवाना यह सब कुछ नहीं था, यह बिदअत पाँचवी सदी के बाद से शुरू हुई है। (रोइकर्दे अक़्लानी बर बावरहाए वहाबियत, नज्मुद्दीन तबसी, जिल्द 5, पेज 14) यह वहाबी टोले के कुछ सरगना लोगों का क़ब्रों पर मक़बरा बनवाने और वहां से दूर रहने के बारे में था, कि जिसमें काफ़ी भद्दी ज़बान का इस्तेमाल करते हुए शियों के अक़ाएद और विचारों का कड़े शब्दों में विरोध कर के अपने विचारों को दुनिया के सभी मुसलमानों तक पहुंचाया है। वहाबी लेखक सलाहुद्दीन मुख़्तारी के अनुसार 1216 हिजरी में सऊदी के बादशाह के आदेश से नज्द, अशाएर, हेजाज़ और भी कई जगहों से इकठ्ठा हुई वहाबियों की फ़ौज ने ज़ीक़ादह महीने में कर्बला पहुंच कर पूरे शहर को घेर लिया। (चालिशहाए फ़िकरी व सियासी वहाबियत, पेज 67-68, नक़्ल अज़ तारीख़ुल ममलेकह, जिल्द 1, पेज 78) फिर वह धोखे से कर्बला शहर में घुस गए और शहर के बहुत से लोगों को गली मोहल्ले यहां तक घर में घुस घुस कर बेरहमी से क़त्ल कर दिया, इस टोले ने इमाम हुसैन अ.स. के रौज़े और उसके गुबंद को ढहा दिया, और रौज़े को भेंट किए गए क़ीमते गहनों को लूट लिया, इमाम की क़ब्र के ऊपर लगे हुए पत्थर जिस याक़ूत और हीरे जवाहेरात जड़े हुए थे हड़प लिया, शहर में जो कुछ मिला हथियार, सोना, चांदी, कपड़े, क़ीमती क़ुर्आन और लोगों की दौलत सब चुरा लिया। (चालिशहाए फ़िकरी व सियासी वहाबियत, पेज 67-68, नक़्ल अज़ उस्मान बिन बशर अन-नज्दी, उन्वानुल मज्द फ़ी तारीख़िन् नज्द, जिल्द 1, पेज 121) और फिर यह विचारधारा वहाबियों की आज तक जारी है जिस की कोई बुनियाद नहीं है, वह केवल अपने पूर्वज की बातों को सही ठहराने में लगे हैं जबकि अब पूरी दुनिया जान चुकी है कि इनका काम दुनिया की शांति को भंग करने के अलावा कुछ नहीं है, यह टोला अबतक अनेक चोले पहन कर आ चुका है, कभी अल-क़ायदा कभी तालेबान कभी अन-नुस्राह कभी जैशे सहाबा कभी दाइश और भी न जाने कितने नाम से आ चुके हैं, लेकिन हर बार पूरी दुनिया के सामने इनका मुखौटा उतर जाता है और कौन कहां से बैठ कर इनकी फ़ंडिंग कर रहा है और कौन सपोर्ट कर रहा है पूरी दुनिया जान और समझ चुकी है। इसके अलावा और भी बहुत से इनके तबलीग़ी हथकंडे हैं जो यह समय समय पर इस्तेमाल करते हैं और नई युवा पीढ़ी को धोखा दे कर अपने द्वारा बनाई गई जुर्म और पाप की लंका में शामिल कर के उनके भविष्य को बर्बाद करते हैं। हम सभी के ज़िम्मेदारी है ऐसे घातक और शांति के दुश्मन टोले को पहचाने और हमेशा की तरह उसकी हर साज़िश को बेनक़ाब कर के नाकामो बनाएं।
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