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Date of publication : 6/9/2017 16:48
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वहाबियत के तबलीग़ी हथकंडे (4)

क़ुर्आन की रूहुल मआनी नाम की तफ़सीर जिसे एक कट्टर सुन्नी ने लिखा है, उसकी सभी उन हदीसों जो अहले बैत अ.स. की फ़ज़ीलत और वहाबियत के विरोध में थीं उन्हें हटा कर उसे दोबारा छपवाया, या इसी प्रकार मक्का में कुछ दूसरी किताबें छपीं जिन में बड़ी कट्टरता के साथ शियों के विरुध्द बातें लिखी गईं जैसे, इन किताबों में लिखा कि इमाम रज़ा अ.स. ने फ़रमाया हम अल्लाह के बेटे हैं.... और लिखा यह हदीस उसूले काफ़ी की तीसरी जिल्द में है जो कि तेहरान से छपी है, जब कि हर कोई तेहरान से छपी उसूले काफ़ी को देख सकता है उस में यह हदीस है कि इमाम ने फ़रमाया कि हम अल्लाह के अमानतदार हैं, और इसी प्रकार इस टोले ने बड़ी किताबों को संक्षेप में लिखने के बहाने से उसमें से अहले बैत अ.स. की महानता और फ़ज़ाएल को हटा दिया।


विलायत पोर्टल : आप वहाबियों के तबलीग़ी हथकंडों के विषय में सच्चाई पर आधारित लेख पढ़ रहे हैं, जिस के 3 पार्ट आपके सामने आ चुके जिसमें 8 हथकंडों पर रौशनी डाली गई। अब आगे.........
झूठे आरोप लगाना झूठी से झूठी बाते गढ़ना और झूठे आरोप लगाना विशेष कर शिया फ़िर्क़े के विरुध्द यह इस टोले का पुराना हथकंडा है, ताकि दूसरे फ़िरक़ों को पूरी दुनिया के लोगों की निगाह में बदनाम कर दें और उनके बारे में सभी बुरा विचार करें, जब से इस टोले ने जन्म लिया है तब से अब तक यह हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं, यही कारण है कि विशेष रूप से शिया फ़िर्क़े को कभी काफ़िर कभी मुशरिक और कभी मुरतद्द (जो मुसलमान होने के बाद फ़िर काफ़िर हो गया हो) कभी बुतों की पूजा करने वाला कहते, जैसा कि अल्लामा अमीन ने रिसालतो ततहीरिल एतेक़ाद अन इदरनिल इलहाद (जो मोहम्मद इब्ने इस्माईल सनआनी की लिखी हुई किताब है और यह मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के दौर का था) के हवाले से लिखा है कि जब भी क़ब्रों पर जाने वाले और उनका सम्मान करने वालों के बारे में सवाल होता है वह कहते हैं कि हम मुशरिक नहीं हैं और किसी को भी ख़ुदा का साथी नहीं मानते हैं और क़ब्रों पर जाना उनका सम्मान करना यह शिर्क नहीं है, तो हम इसका इस प्रकार जवाब देंगे कि, वह कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं, इन्हे अभी तक शिर्क का मतलब ही समझ में नहीं आया, चूंकि ख़ुदा के विशेष बंदों का सम्मान करना और उनकी ओर से क़ुर्बानी करना यह सब शिर्क है, लेकिन इन सब बातों का कोई फ़ायदा नहीं है चूंकि उनका अमल उनकी बातों को झुठलाता है। (कश्फ़ुल इरतियाब, अल्लामा अमीन, पेज 211) आयतुल्लाह हुसैन क़ज़वीनी कहते हैं कि, कुछ साल पहले सऊदी में वहाबियों ने अश-शीआ वत-तक़रीब नाम की किताब लिखी जिस में लेखक ने इत्तेहाद की बुनियादी शर्तों का ज़िक्र किया है, और अंत में लिखा कि हम को सभी मुसलमानों के साथ इत्तेहाद और एकता करनी चाहिए लेकिन हम शियों को मुसलमान नहीं मानते, शियों से एकता के लिए शर्त यह है कि पहले वह साबित करें कि वह मुसलमान हैं, सऊदी की दूसरे नम्बर की इल्मी हस्ती ने कुछ समय पहले अधिकारिक तौर से यह ऐलान किया था कि, मैं फ़तवा देता हूं कि शिया इन दलीलों के कारण काफ़िर हैं, (1) इन लोगों का कहना है कि क़ुर्आन में फेरबदल हुआ है. (2) सहाबा और पैग़म्बर की सुन्नत को नहीं मानते. (3) अहले बैत अ.स. के द्वारा तवस्सुल करते है. यही कारण है कि शिया इस्लामी उम्मत का हिस्सा नहीं हैं, सऊदी में एक उच्च कमेटी है जिसका सरगना सऊदी का सर्वोच्च मुफ़्ती है इस कमेटी ने भी अधिकारिक ऐलान किया कि जिस तरह हमारी यहूदियों और ईसाइयों से कभी एकता नहीं हो सकती उसी तरह हमारी शियों के साथ भी कभी एकता नहीं हो सकती, यही वजह है कि अब्दुल मालिक रेगी ने ईरान में एक सैन्य शाखा बनाई ताकि इस्लामी हुकूमत के साथ हर समय जंग के लिए तैयार रह सकें और चूंकि ईरान शिया बहुल देश है इसलिए शियों के क़त्ल को वाजिब कह कर जन्नत जाने का कारण ऐलान किया, इराक़ की वहाबी सैन्य शाखा के लीडर ने अपनी हलाकत से 2 महीना पहले एक बयान में अधिकारिक तौर पर कहा था कि आज के दौर में हमारा असली दुश्मन अमेरिका और इस्राईल नहीं बल्कि शिया हैं, ज़ायोनी के विरुध्द हिज़बुल्लाह की 33 दिनों के युध्द में वहाबियों को 3 मुफ़्तियों ने यह फ़तवा दिया था कि हिज़बुल्लाह की हर प्रकार की मदद हराम है क्योंकि यह शैतान के जिस्म हैं यहां तक कि उनकी कामयाबी के लिए दुआ करने को गुनाहे कबीरा कहा था। (फ़रहंगे पूया, फ़स्लनामए फ़रहंगी इज्तेमाई व सियासी, शुमारा 7, फ़रवरी 2008) कभी कभी ऐसे हास्यास्पद और बे बुनियाद अक़ीदों और कामों को शियों का बताते हैं कि जिसे कोई बेवक़ूफ़ भी नहीं मान सकता, ऐसे हथकंडों से यह शियों को पूरी दुनिया में बदनाम करके अपने विचारों की तबलीग़ करते, उनके कुछ आरोप इस प्रकार हैं, शियों में इमामों के मज़ार का तवाफ़ करना जाएज़ है, या यह कि शिया क़ुर्बानी और किए गए दान को पैग़म्बर और इमामों के नाम ईसाले सवाब करते हैं, या यह कि शिया पैग़म्बर और इमामों की क़ब्रों को मस्जिद का दर्जा देते हैं और इनकी पूजा करते और काबे की तरह उनकी क़ब्रों की ओर नमाज़ पढ़ते हैं। (फ़िर्क़ए वहाबी, सैय्यद मोहम्मद हसन क़ज़वीनी, तर्जुमा अली दवानी, पेज 21) इस टोले के आरोपों में से एक मशहूर आरोप जिसे इन लोगों ने आम जनता के बीच फैलाया है वह यह है कि शिया हज में एक विशेष मानसिकता ले कर आते हैं वह यह कि अल्लाह के पवित्र घर को अपने (मआज़ल्लाह) मल-मूत्र से गंदा और नजिस करना है। (माहनामए इत्तेला रसानी पज़ोहिशी मरकज़े जहानी उलूमे इस्लामी, ग्राहम फ़्रैंक, तर्जुमा ख़दीजा तबरेज़ी, शुमारा 20, सितम्बर, अक्टूबर 2006. वहाबियान, पेज 47) झूठी किताबों का प्रकाशन वहाबियों का अपने विचारों के फैलाने का एक और अहम हथकंडा यह है कि दूसरे फ़िर्क़ों के विरुध्द झूठी बातों पर आधारित किताबें छाप कर इस्लामी जगत में फैलाना है, अपने मक़सद को हासिल करने के लिए शियों और कुछ अहले सुन्नत की किताबों में फ़ेरबदल करना शुरू कर दिया, कहीं किसी शब्द को बदला तो कहीं पूरे पैराग्राफ़ को, एक इस्लामी संप्रदायों के विशेषज्ञ के अनुसार वहाबियों का अपने फॉलोवर बढ़ाने और शियों को बदनाम करने का सबसे बड़ा हथकंडा शिया किताबों में फेरबदल करना है, सच्चाई यह है कि शिया फ़िर्क़ा दूसरे सारे फ़िर्को बल्कि सभी दीनों को देखते हुए सब से अधिक अक़्ल और लॉजिक का ध्यान रखता है, अगर यह सच न होता तो यह संगठन कभी शिया और कुछ सुन्नी किताबों में कभी फेरबदल न करता, और यही नही बल्कि फेरबदल कर के ऐसी किताबों को अधिक तादाद में छपवाते, और प्रेस वालों को मोटी रक़म दे कर उन किताबों के दाम कम रखवाते ता कि हर कोई आसानी से खरीद कर उन्हे पढ़ कर शिया और सुन्नियों के विरुध्द विचारधारा बना सके, और इसी तरह किताबों को ख़रीद कर दुनिया के हर छोटे बड़े पुस्तकालय को मुफ़्त में देते ताकि लोगों की विचारों को गुमराह कर सकें, जैसे क़ुर्आन की रूहुल मआनी नाम की तफ़सीर जिसे एक कट्टर सुन्नी ने लिखा है, उसकी सभी उन हदीसों जो अहले बैत अ.स. की फ़ज़ीलत और वहाबियत के विरोध में थीं उन्हें हटा कर उसे दोबारा छपवाया, या इसी प्रकार मक्का में कुछ दूसरी किताबें छपीं जिन में बड़ी कट्टरता के साथ शियों के विरुध्द बातें लिखी गईं जैसे, इन किताबों में लिखा कि इमाम रज़ा अ.स. ने फ़रमाया हम अल्लाह के बेटे हैं.... और लिखा यह हदीस उसूले काफ़ी की तीसरी जिल्द में है जो कि तेहरान से छपी है, जब कि हर कोई तेहरान से छपी उसूले काफ़ी को देख सकता है उस में यह हदीस है कि इमाम ने फ़रमाया कि हम अल्लाह के अमानतदार हैं, और इसी प्रकार इस टोले ने बड़ी किताबों को संक्षेप में लिखने के बहाने से उसमें से अहले बैत अ.स. की महानता और फ़ज़ाएल को हटा दिया। ((फ़रहंगे पूया, फ़स्लनामए फ़रहंगी इज्तेमाई व सियासी, शुमारा 7, फ़रवरी 2008) इसी प्रकार कुछ वेबसाइट के अनुसार इन वहाबियों ने कुछ किताबें हमारे मराजे और उलेमा जैसे आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी, आयतुल्लाह जाफ़र सुबहानी और अल्लामा अब्दुल हादी फ़ज्ली के नाम से छाप दीं जबकि इन उलेमा को पता तक नहीं, मोहतर्मा इब्राहीमी साहिबा लिखती हैं कि, कुछ साल पहले वहाबियों ने अल्लामा मुर्तज़ा अस्करी और आयतुल्लाह जाफ़र सुब्हानी के नाम से मदीना और बक़ी में बांटी हैं जबकि इन उलेमा ने यह किताबें नहीं लिखी हैं। ((फ़रहंगे पूया, फ़स्लनामए फ़रहंगी इज्तेमाई व सियासी, महबूबा इब्राहीमी, शुमारा 7, फ़रवरी 2008)
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