Saturday - 2018 Oct 20
Languages
Delicious facebook RSS दोस्तों को भेजें। प्रिंट सेव करें। XML TEXT PDF
Code : 189374
Date of publication : 2/9/2017 18:25
Hit : 437

वहाबियत के तबलीग़ी हथकंडे (3)

किसी भी प्रकार का लेख और अनुसंधान जो वहां के बादशाहों और वहाबियत के हित में न हो वह क़ानूनी अपराध है और उसको दोषी ठहरा दिया जाता है, और इस प्रकार दूसरों के विचारों को कमज़ोर और ख़ुद अपने विचारों को मज़बूत किए जा रहे हैं, अब्बास जाफ़री का इस बारे में कहना है कि, आले सऊद के बादशाह तेल की सारी आमदनी को वहाबी साम्राज्य के फैलाने और उस के प्रचार में धड़ल्ले से ख़र्च कर रहे हैं,


विलायत पोर्टल :  आप वहाबियों के तबलीग़ी हथकंडों के विषय में सच्चाई पर आधारित लेख पढ़ रहे हैं, जिस के 2 पार्ट आपके सामने आ चुके जिसमें 5 हथकंडों पर रौशनी डाली गई। अब आगे.....
केवल अपने विचारों के अनुसार प्रेस और पुस्तकालय की स्थापना जिस देश में भी अनेक धर्म और जाति के लोग रहते हों, वहां हर धर्म और जाति के लोगों को आगे बढ़ने और तरक़्क़ी के रास्ते और हर तरह की सुविधाएं मिलनी चाहिए ताकि हर नागरिक हर मुद्दे पर खुल कर अपनी राए ज़ाहिर कर सके, क्योंकि किसी विशेष संगठन, ग्रुप या टोले का अहम जगहों पर क़ब्ज़ा कर के बाक़ी लोगों को दूर रखना सामाजिक न्याय, इस्लामी क़ानून और अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों के विरुध्द है। लेकिन अफ़सोस कि सऊदी में इसका ख़्याल नहीं रखा गया और सभी प्रेस और मीडिया को वहाबियों के हवाले कर दिया गया, जिस से दूसरे फ़िर्क़ों को नाबूद करने की मुहिम शुरू कर दी गई, और इस हद तक कट्टरता दिखाई जाती है कि किसी भी प्रकार का लेख और अनुसंधान जो वहां के बादशाहों और वहाबियत के हित में न हो वह क़ानूनी अपराध है और उसको दोषी ठहरा दिया जाता है, और इस प्रकार दूसरों के विचारों को कमज़ोर और ख़ुद अपने विचारों को मज़बूत किए जा रहे हैं, अब्बास जाफ़री का इस बारे में कहना है कि, आले सऊद के बादशाह तेल की सारी आमदनी को वहाबी साम्राज्य के फैलाने और उस के प्रचार में धड़ल्ले से ख़र्च कर रहे हैं, रेडियो, टी.वी. और पत्रिका हर एक आले सऊद के साम्राज्य और वहाबियत के विचारों को सब से अच्छे और पसंदीदा विचार, सबसे मज़बूत गठन, और क़ुर्आन और हदीस के मुताबिक़ बताने पर ज़ोर देते हैं, वह आगे कहते हैं कि, जो भी लेख और अनुसंधान इस टोले के हित में होगा उसे नियमित तरीक़े से प्रकाशित कर के उसको हर जगह भेजा जाता है, और दूसरे धर्म और मज़हब के विचारों के द्वारा हर लिखे गए लेख और किताब बिदअत, कुफ़्र और दीन से भटका हुआ बता कर उस से क़रीब जाने से भी रोकते है। (फ़रहंगे पूया, फ़स्लनामए फ़रहंगी इज्तेमाई व सियासी, शुमारा 7, फ़रवरी 2008) वहाबी सत्ता वाले देश सऊदी में बड़े बड़े पुस्तकालय हैं जिनमें अनगिनत किताबें हैं, लेकिन अफ़सोस कि यह लोग केवल अपनी किताबें ही उनमें रखते हैं, जबकि कोई भी किसी भी शिया पुस्तकालय में जाता है तो उसे मुसलमानों के सारे फ़िरक़ों की प्रथम श्रेणी की किताबों से लेकर वहाबियों की किताबों तक दिखाई देती हैं और हर कोई उसे पढ़ भी सकता है, लेकिन कोई भी शिया लेखक अगर इनके पुस्तकालय में चला जाए तो उसे शिया फ़िर्क़े की कोई भी किताब नहीं मिलेगी और अगर मिल भी गई तो उस में इनकी ओर से कांट छांट के बाद मिलोगी। मीडिया (रेडियो, टी.वी., न्यूज़ पेपर, वेबसाइट.....) किसी भी चीज़ का प्रचार करने और अपने विचारों को फ़ैलाने के लिए आज के दौर में सब से प्रभावी साधन मीडिया है, और जैसे जैसे समय आगे बढ़ रहा है इसकी अहमियत और अधिक ज़ाहिर होती जा रही है, सऊदी के वहाबी बादशाह इस साधन के द्वारा वहाबियत को फैलाने और अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने में बहुत सक्रिय हैं, जिसको आप उनके टी.वी. और यू ट्यूब चैनल से लेकर सोशल मीडिया तक पर देख रहे हैं। लोगों की भवनाओं से खिलवाड़ करते हुए काफ़िरों से जेहाद का नारा हर इंसानी प्रकृति में अल्लाह की ओर क़दम बढ़ाना और उसकी इबादत करना होता है, लेकिन कभी कभी इंसान जोश, इच्छाओं, शैतान और विशेष रूप से इंसानी शक्ल में शैतान के बहकावे में आकर अपनी प्रकृति की बात को अनसुना करते हुए अल्लाह के रास्ते से भटक कर शिर्क के रास्ते पर चला जाता है, अल्लाह की ओर से नबी और रसूल आए ताकि इस प्रकृति और ज़मीर की आवाज़ को फैलाने और इंसान के कानों तक पहुंचाने में मदद कर सकें, और इंसानों के जीवन को कुफ़्र, शिर्क और स्वार्थ के अंधेरों से छुटकारा दिला कर तौहीद के नूर से सजा दें, वह मुसलमान जिन्होंने शुरू ही से इस्लाम की किरनों तले जीवन गुज़ारा उन्होंने हमेशा कुफ़्र और शिर्क जैसे मामलों में संवेदनशीलता बरती और हमेशा तौहीद जैसी सच्चाई का विरोध करने वालों से मुक़ाबला करने के लिए तैय्यार रहे, वहाबी मुसलमानों की इस हक़ीक़त को जानते थे, उन्होंने इसका फ़ायदा उठाते हुए काफ़िरों और मुशरिकों से जेहाद और पैग़म्बर की क़ब्र पर खड़े हो कर उनके वसीले से दुआ करने तक को बिदअत बता कर नारा लगाना शुरू कर दिया, और इस को आप आज भी अनेक इस्लामी देशों में अच्छी तरह देख सकते हैं, और उन की कुछ किताबों में यहां तक मिलता है कि, आज के मुशरिक पैग़म्बर के दौर के मुशरिकों से अधिक बुरे हैं, मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब अपने दौर के मुसलमानों के बारे में लिखता है कि, आज के दौर के बहुत से मुसलमान होबल, लात, उज़्ज़ा और मनात के आगे किसी ख़ुदा को नही जानते, अगर इनकी सोंच सही होती तो यह आज पेड़, पत्थर, सूरज, चांद और इंसानों की पूजा न करते, यह सब बुतों की पूजा है। (मबानिए एतेक़ादिए वहाबियान, अली असग़र रिज़वानी, पेज 74, अद-दोररोस सुन्निय्यह जिल्द 1, पेज 117 से नक़्ल करते हुए) इसी प्रकार की और भी बहुत सी बातों को पढ़ने और जानने के लिए अद-दोररोस सुन्निय्यह में पेज 120 और पोज 160 पर या मबानिए एतेक़ादिए वहाबियान में पेज 117 पर पढ़ सकते हैं। हामिद इलगार इस बारे में लिखते हैं कि, क़ुर्आन का इंग्लिश में मोहम्मद तक़ी हेलाली और मोहम्मद हसन द्वारा तर्जुमा ध्यान देने के क़ाबिल है, कि जो 1994 में रियाज़ शहर से सऊदी बादशाह अब्दुल अज़ीज़ इब्ने अब्दुल्लाह की मर्ज़ी हासिल करने के बाद प्रकाशित हुआ, इन तर्जुमा करने वालों ने दूसरी और कुछ बातों के साथ साथ तर्जुमे के आख़िर में लिखते हैं कि, हमें ज्ञात हुआ है कि अधिकतर लोग जो इस्लाम धर्म से जुड़े तो हैं लेकिन ला इलाहा इल्लल्लाह, मोहम्महदुर रसूलुल्लाह के सही मतलब तक भी नहीं जानते, इन तर्जुमा करने वालों ने जो बात कहना चाही है वह यह है कि वहाबी विचारधारा के हिसाब से अधिकतर मुसलमान मुशरिक हैं। (वहाबीगरी, हामिद इलगार, तर्जुमा अहमद नुमाई, पेज 50) सैय्यद मोहसिन अमीन अपनी किताब तारीख़चए नक़्द व बररसी वहाबीहा में लिखते हैं कि, वहाबियों का कहना है कि मुसलमान या ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए हैं, तौहीद के इक़रार के बाद मुशरिक हो गए हैं या शुरू से मुसलमान ही नहीं थे बल्कि काफ़िर उस से भी गए गुज़रे थे, इसलिए उनका क़त्ल और ख़ून बहाना वाजिब और उनका माल उनकी दौलत लूटना हलाल है, और यहां तक भी उनके विचार हैं कि मुसलमानों के बच्चों को अपना ग़ुलामी में ले लो। (तारीख़चए नक़्द व बररसी वहाबीहा, अल्लामा मोहसिन अमीन, तर्जुमा सैय्यद इब्राहीम व सैय्यद अलवी, पेज 151) .................................


आपका कमेंट



मेरा कमेंट शो न किया जाये
Security Code :