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Code : 188362
Date of publication : 13/7/2017 18:9
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वहाबियत के काले कारनामे (1)

इन वहाबियों ने रसूल स.अ. के नवासे, और हज़रत अली अ.स. व हज़रत ज़हरा स.अ. के बेटे इमाम हुसैन अ.स. के मज़ार को ढ़हा कर वीरान कर के ज़रीह को खोद दिया, और वहीं पर हबीब इब्ने मज़ाहिर की मज़ार को आग लगा कर जला दिया, यही नहीं बल्कि इमाम हुसैन अ.स. के मज़ार के क़ीमती तोहफ़ों को हड़प लिया, और अपने घोड़ों को हरम के अंदर बांधा, और फिर ऐसा घिनौना काम किया जिस से एक बार फिर लोगों को कर्बला और हर्रा {मदीने मे यज़ीद के हुक्म पर क़त्ले आम किया गया और औरतों की इज़्ज़त को तार तार किया गया जिसके नतीजे मे 10 हज़ार नाजायज़ बट्टे पैदा हुए} के मसाएब और बनी उमय्या और मुतवक्किल अब्बासी का दौर याद आ गया।


विलायत पोर्टल :
  आज जिधर भी देखिए हर तरफ़ इंसानियत आंसू बहाती दिखाई दे रही है, कुछ केवल नाम के मुसलमानों (जिनका नाम केवल मुसलमानों की तरह है) ने साम्राज्यवादी ताक़तों से मिल कर मुसलमानों ही के ख़ून बहाने को जन्नत में जाने का कारण समझ लिया है, और मानवाधिकार के नाम पर कलंक बनी संस्थाएं हाथ पर हाथ रखे बैठी केवल तमाशा देख रहीं हैं, और कुछ ऐसे हैं जो आतंकवाद को ख़त्म करने के नाम पर उन लोगों को मार देते हैं जो बेचारे इन आतंकियों के हमलों से बच जाते हैं, अफ़सोस तो संयुक्त राष्ट्र संघ पर है जो मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर साम्राज्य की बैसाखियों पर चलते हुए भेदभाव कर रहा है। इस लेख में मुसलमानों पर वहाबियों द्वारा बार बार किए गए अत्याचारों का ज़िक्र किया जा रहा है। 1216 हिजरी में ईदे ग़दीर के दिन तत्कालीन वहाबी सरगना सऊद इब्ने अब्दुल अज़ीज़ ने 20 हज़ार लड़ाकों के साथ कर्बला जैसे पवित्र शहर पर हमला किया, उस समय वहां पर ज़ियारत करने वालों का तांता लगा हुआ था जिस में ईरानी, तुर्क और अरब के लोग शामिल थे, इस वहाबी शासक ने कर्बला को चारो ओर से घेर कर शहर के बेगुनाह बच्चों, बूढ़ों, जवानों, औरतों और मर्दों का क़त्ले आम किया, कुछ इतिहास विशेषज्ञों के अनुसार 1 लाख 50 हज़ार लोगों का ख़ून कर्बला शहर की गलियों में बहा है, और सब से अधिक अफ़सोस की बात यह कि ऐसे घिनौने और इंसानियत के क़त्ले आम जैसे काम को अल्लाह की राह में जेहाद और तौहीद को फैलाने का नाम दिया। इसके बाद इन वहाबियों ने रसूल स.अ. के नवासे, और हज़रत अली अ.स. व हज़रत ज़हरा स.अ. के बेटे इमाम हुसैन अ.स. के मज़ार को ढ़हा कर वीरान कर के ज़रीह को खोद दिया, और वहीं पर हबीब इब्ने मज़ाहिर की मज़ार को आग लगा कर जला दिया, यही नहीं बल्कि इमाम हुसैन अ.स. के मज़ार के क़ीमती तोहफ़ों को हड़प लिया, और अपने घोड़ों को हरम के अंदर बांधा, और फिर ऐसा घिनौना काम किया जिस से एक बार फिर लोगों को कर्बला और हर्रा {मदीने मे यज़ीद के हुक्म पर क़त्ले आम किया गया और औरतों की इज़्ज़त को तार तार किया गया जिसके नतीजे मे 10 हज़ार नाजायज़ बट्टे पैदा हुए} के मसाएब और बनी उमय्या और मुतवक्किल अब्बासी का दौर याद आ गया। कर्बला एक बार फिर ऐसी स्थिति में पहुंच गई थी कि शाएरों ने मरसिये कहने शुरू कर दिए थे, इस वहाबी ने 12 साल के क़ब्ज़े में कई बार कर्बला और उसके आस पास के इलाक़ों और इसी तरह कई बार नजफ़ पर हमला कर के लूटा। कर्बला पर क्या क्या गुज़री है इस पर बहुत सारे पूर्वी और पश्चिमी विद्वानों यहां तक सऊदी इतिहासकारों ने किताबें लिखी हैं, जैसे अल-ममलेकतुल अरबिय्यह अल-सऊदिय्यह, या उनवानुल मज्द फ़ी तारीख़े नज्द, या तारीख़ुल अरबिय्यह अल-सऊदिय्यह जिसे नासिलीफ़ , और मिफ़ताहुल करामह जिसे सैय्यद जवाद आमुली ने लिखा, पढ़ सकते हैं। 9 सफ़र 1221 हिजरी को सुबह होने से पहले अंधेरी रात में इन वहाबियों ने नजफ़ के लोगों को धोके में रख कर हमला किया, यहां तक कि कुछ वहाबियों ने शहर की दीवार फांद कर नजफ़ शहर पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश भी की ताकि इमाम अली अ.स. के मज़ार को ढहा सकें, लेकिन मौला अमीर अ.स. के रौज़े से कुछ ऐसी करामात ज़ाहिर हुईं कि इन सब को मुंह की खानी पड़ी कुछ मारे गए कुछ डर के हमेशा की तरह भाग गए। जमादियुस सानी 1221 में इन वहाबियों ने 20 हज़ार से अधिक की फ़ौज लेकर रात में नजफ़ पर हमला किया, लेकिन वहां के लोगों के प्रतिरोध के कारण वहां से भाग कर हिल्ला नामी शहर पर हमला किया फिर कर्बला पर भी हमला कर उसे चारों ओर से घेर लिया, कर्बला वासियों ने विरोध के साथ साथ डट कर प्रतिरोध किया बहुत से लोग शहीद भी हुए और बहुत से वहाबी भी मारे गए, अंत में वहाबी वहां से भाग निकले और पूरे इराक़ में तबाही फैलाने लगे। 1225 हिजरी के शाबान और रमज़ान के महीनों में ग़ज़्ज़ा के वहाबियों कि जिन के पास नजफ़ और कर्बला पर हमला करने की हिम्मत और ताक़त नहीं थी तो उन्होंने नजफ़ और कर्बला तक पहुंचने के रास्तों को बंद कर दिया, और कूफ़े से कर्बला तक के रास्ते को घेर लिया और फिर जो भी ज़ियारत कर के उस रास्ते से वापिस होता उसका रास्ता रोक कर उसका सामान और पैसा छीन कर उसे मार देते। सन् 1966 और 1967 में कई बार वहाबी टोले ने इराक़ की कई अलग अलग जगहों पर हमला कर के ख़ून ख़राबा फैला कर उनके घर पले हुए जानवरों को छीन लेते थे, और अंत में नौबत यह आ गई कि इराक़ हुकूमत ने ब्रिटिश हुकूमत से शिकायत की कि या वह वहाबियों को रोकें या हमें ख़ुद इनसे मुक़ाबला करने दें, फिर इराक़ी सेना के जहाज़ों ने इन वहाबियों के ठिकानों पर हमला करके इन्हें वहां से खदेड़ा। 1425 हिजरी में आशूर के दिन अल-क़ायदा नामक वहाबी संगठन ने कर्बला में मौजूद हज़ारों इमाम हुसैन अ.स. के चाहने वालों और अज़ादोरों के बीच सिलसिलेवार कई धमाके किए, जिसके कारण हज़ारों बूढ़े, जवान, मर्द, औरत और बच्चे शहीद हुए। 25 रजब 1426 हिजरी इमाम मूसा काज़िम अ.स. की शहादत के दिन यही वहाबी अल-क़ायदा के नाम से एक बार फिर काज़मैन नामी शहर में लोगों में ज़हरीला खाना बाँट कर और इमाम का गम मनाने पहुंचे अज़ादारों के बीच कई सिलसिलेवार धमाके किए जिस से औरत, मर्द और बच्चों को मिला कर 1500 लोग शहीद हुए। अमरीका और उसके सहयोगियों द्वारा इराक़ पर सद्दाम को सत्ता में लाने से वहाबियों ने अपने मालिकों के इस मौक़े से फ़ायदा उठाते हुए बे बुनियाद अक़ीदों को दीन में दाख़िल करके इस्लाम को क्षति पहुंचाने और फिर मुसलमानों के बीच फूट डालते हुए अनेक बार इराक़ के शियों सुन्नियों, मर्दों औरतों, बूढ़ों बच्चों हर मुसलमान को अपने आतंकवाद का शिकार बनाते हुए ऐसे संगीन जुर्म किए हैं कि क़लम भी उन्हें लिखने से कांप जाता है।


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