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Code : 188308
Date of publication : 10/7/2017 18:48
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वहाबियत और पैग़म्बरे इसलाम का सम्मान।

यह टोला पैग़म्बर की क़ब्र पर एहतेराम की निय्यत से जाने को भी हराम कहता है........ सहाबा की सीरत वहाबियों के विचारों के विपरीत है, यानी सहाबा पैग़म्बर की क़ब्र पर हाज़िरी दे कर एहतेराम करते थे...... हज़रत ज़हरा स.अ. नक़्ल हुआ है कि, पैग़म्बर के दफ़न करने के बाद आप उनकी क़ब्र पर गईं और जाकर क़ब्र की मिट्टी को उठा कर एहतेराम करते हुए अपनी आंखों से लगाया। अबू अय्यूब ने जवाब दिया हां मैं हूं, मैं रसूले ख़ुदा स.अ. के पास आया हूं किसी पत्थर के पास नहीं आया, मैंने पैग़म्बर से सुना है कि जिस समय दीन का हाकिम गंभीर हो उस समय दीन के लिए आंसू मत बहाओ, लेकिन उस समय ज़रूर रोना जब नाकारा लोग दीन के हाकिम बन जाएं।


विलायत पोर्टल :
  एहतेराम एक ऐसा मसला है जिस का बहाना बना कर वहाबियत ने मुसलमानों पर तरह तरह के बिदअत और शिर्क जैसे आरोप लगाए रखें हैं, लेकिन क्योंकि यह टोला सहाबियों द्वारा पैग़म्बर से संबंधित चीज़ों के एहतेराम का इंकार नहीं कर सकता इसलिए एहतेराम को दो हिस्सों में बांट दिया.....
1. वह चीज़ें जो पैग़म्बर के बदन का हिस्सा रहीं हों उनका एहतेराम जाएज़ है, जैसे आपके बाल, नाख़ून, पसीना और लोआबे दहन, इस में सभी मुसलमान एकमत हैं, और सभी का कहना है कि अल्लाह ने जो बरकत आप में रखी हैं उनके कारण यह चीज़ें भी बरकत वाली हो जाती हैं। (सियरो आलामिन नबला, जिल्द 2, पेज 198)
2. वह सभी जगहें और मस्जिदें जिन से किसी भी प्रकार पैग़म्बर का बदन छुआ है, जैसे कोई जगह जहां पैग़म्बर ने नमाज़ पढ़ी, आराम किया या बैठे उठे, इन्ही में से एक आपकी क़ब्र भी है। वहाबी उलेमा इस बात को तो मानते हैं कि बदन की बरकत बदन से संबंधित चीज़ों में भी पहुंचती है, और वह क़ब्र में बदन के हमेशा बाक़ी रहने को भी मानते है, (फ़तावा तौहीद, इब्ने जिबरीन, पेज 23) लेकिन यह भी कहते हैं कि आप के वजूद की बरकत उन जगहों पर जहां आपका बदन छुआ है बाक़ी नहीं रहती, विशेष रूप से आपकी क़ब्र पर बिल्कुल भी नहीं रहती, (फ़तावा नूर अला अल-दर्ब, पेज 160) इसी कारण यह टोला पैग़म्बर की क़ब्र पर एहतेराम की निय्यत से जाने को भी हराम कहता है, (अल-सिलसिलतुल अहादीस अल-सहीहतो अल-मुतल्लेदातोल कामेलह, हदीस 997) उसकी इस काम को हराम कहने की असली दलील सहाबियों द्वारा क़ब्र पर जा कर एहतेराम और सम्मान न करना था, हम इस बारे में संक्षेप में सहाबियों और सुन्नी आलिमों के कुछ फतवों को यहां बयान करेंगे।
 पैग़म्बर की क़ब्र का एहतेराम के बारे में सहाबा की सीरत सहाबा की सीरत वहाबियों के विचारों के विपरीत है, यानी सहाबा पैग़म्बर की क़ब्र पर हाज़िरी दे कर एहतेराम करते थे, जिन में से तीन मिसालें यहां पेश कर रहे हैं....
1. हज़रत ज़हरा स.अ. नक़्ल हुआ है कि, पैग़म्बर के दफ़न करने के बाद आप उनकी क़ब्र पर गईं और जाकर क़ब्र की मिट्टी को उठा कर एहतेराम करते हुए अपनी आंखों से लगाया। (वफ़ाउल वफ़ा, जिल्द 4, पेज 218, सियरो आलामिन नबलना, जिल्द 3, पेज 426) शहज़ादी के इस अमल से हट कर भी अगर देखा जाए तो सहाबा की सीरत में कहीं भी इस अमल का विरोध दर्ज नहीं है, जिस से पता चलता है कि, सहाबा की ओर से इस अमल पर कोई आपत्ति नहीं थी, और सब से अहम यह कि हज़रत ज़हरा स.अ. ख़ुद सहाबा की लिस्ट में शामिल हैं जिनका यह अमल पैग़म्बर की क़ब्र का एहतेराम साबित करता है।
2. अहमद इब्ने हंबल की मुसनद में मौजूद है कि, दाऊद इब्ने सालेह से इस प्रकार नक़्ल हुआ है कि, एक दिन मरवान ने एक शख़्स को अपना चेहरा पैग़म्बर की क़ब्र पर रखे हुए देखा तो उस से कहा, क्या तुमको पता है कि क्या कर रहे हो, मरवान ने पास आकर देखा तो देखा कि वह शख़्स अबू अय्यूब अंसारी हैं, अबू अय्यूब ने जवाब दिया हां मैं हूं, मैं रसूले ख़ुदा स.अ. के पास आया हूं किसी पत्थर के पास नहीं आया, मैंने पैग़म्बर से सुना है कि जिस समय दीन का हाकिम गंभीर हो उस समय दीन के लिए आंसू मत बहाओ, लेकिन उस समय ज़रूर रोना जब नाकारा लोग दीन के हाकिम बन जाएं। (मुसनदे अहमद इब्ने हंबल, जिल्द 17, पेज 42, मुसतदरक, हाकिम नेशापूरी, जिल्द 4, पेज 560) तक़ीउद्दीन सुबकी शिफ़ाउस सिक़ाम में कहते हैं कि एक सबसे अहम बात जो इस हदीस से समझ में आती है वह नबी की क़ब्र का एहतेराम और सम्मान करना है, क्योंकि मरवान से अबू अय्यूब पर एतेराज़ किया था जिसके जवाब में अबू अय्यूब ने कहा ति मैं पत्थर के पास नहीं आया बल्कि पैग़म्बर के पास आया हूं, आप का यह कहना वहाबियों के दावे के विरुध्द है क्योंकि वह क़ब्र के एहतेराम का विरोध करते हैं। (शिफ़ाउस सिक़ाम, पेज 279)
3. समहूदी ने इस प्रकार रिवायत नक़्ल की है कि, इब्ने मुनकदिर जो ताबेई में से हैं कि एक दिन वह अपने चाहने वालों के बीच बैठे थे, अचानक उन्होंने देखा कि इब्ने मुनकदिर उठे और सीधे नबी की क़ब्र पर जा कर अपना चेहरा नबी की पाक क़ब्र पर रख दिया, जब उनके चाहने वालों ने ऐसा करने का कारण पूछा तो आपने कहा, मुझे अपने अंदर तकलीफ़ महसूस हुई इसलिए ऐसा किया और अब अच्छा महसूस कर रहा हूँ। (वफ़ाउल वफ़ा, जिल्द 4, पेज 218) वह इस अमल से न ही काफ़िर हुए न ही बिदअत को फैलाने वाले, और आज तक किसी ने भी उनके इस तरीक़े और शिफ़ा हासिल करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।


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