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Date of publication : 5/7/2017 18:45
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वहाबियत के बारे में शिया उलेमा के विचार।

हक़ीक़त में वहाबियत को मुसलमानों के आपसी इत्तेहाद को मिटाने और इस्राईल से दोस्ती बढ़ाने के लिए बनाया गया है, मुसलमानों के ख़ून से होली खेलने वाले इस्राईल की किस हद तक सऊदी से दोस्ती है,


विलायत पोर्टल :
वह चीज़ जो हर मुसलमान को तकलीफ़ देती है वह शरीयत और अक़्ल के विरुध्द फ़तवा देना है, और इस प्रकार के फ़तवा देने वाले कभी जान बूझ कर कभी अंजाने में ऐसे लोगों के एजेंट बन जाते हैं जिनका मक़सद इस्लाम को नाबूद करना है। हम संक्षेप में इस लेख में वहाबियत के बारे मे शिया उलेमा के विचार पेश करेंगे।
आयतुल्लाह ख़ुमैनी र.अ.
क्या सारी दुनिया के मुसलमान देख नहीं रहे कि आज वहाबियों के सारे सेंटर मुसलमानों की जासूसी और उनके बीच फ़साद फैलाने का काम कर रहे हैं, कभी यह अबू सुफ़यान के इस्लाम का प्रचार करते कभी अमेरिका के इस्लाम का, और कभी अमेरिका की चौखट पर अपनी नाक रगड़ कर ख़ुद को ज़लील करते हैं। (सहीफ़ा ए इमाम, जिल्द 21, पेज 80) आपने अपनी वसिय्यत में इस तरह लिखा है कि, हम देख रहे हैं कि शाह फ़हद (उस समय सऊदी का बादशाह) एक ओर हर साल आम जनता का न जाने कितना पैसा क़ुर्आन की छपाई में दूसरी ओर क़ुर्आन के मक़सद और उसकी तालीमात के विरुध्द बातें फैलाने में ख़र्च कर रहा है, और वहाबियत जैसे बे बुनियाद मज़हब को आम करने में ख़र्च कर रहा है, और सोई हुई जनता और क़ौमों को साम्राज्य की ओर ढ़केल रहा है, और क़ुर्आन ही को क़ुर्आन और इस्लाम की नाबूदी के लिए इस्तेमाल कर रहा है। (वसिय्यत नामए सियासी व इलाही, इमाम ख़ुमैनी, 1 जमादियुस सानी 1403)
आयतुल्लाह ख़ामेनई
आप फरमाते हैं कि, हक़ीक़त में वहाबियत को मुसलमानों के आपसी इत्तेहाद को मिटाने और इस्राईल से दोस्ती बढ़ाने के लिए बनाया गया है, और बिल्कुल इसी तरह इस्राईल को भी इसी मक़सद के लिए बनाया गया, और वहाबियत की हुकूमत को इसी इस्राईल के इशारे पर बनाया गया है ताकि इस्राईल का मुसलमानों के बिल्कुल बीच में एक अड्डा बन सके, और आज आप लोग देख सकते हैं कि मुसलमानों के ख़ून से होली खेलने वाले इस्राईल की किस हद तक सऊदी से दोस्ती है, और यह वहाबी हाकिम अपने और मुसलमानों के क़ातिल इस्राईल की दोस्ती के क़िस्से हर जगह सुनाते फिरते भी दिखाई देते हैं। (farsi.khamenei.ir)
आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी र.अ. यह बात सब के लिए साबित है कि सारे मुसलमानों के एकमत द्वारा वहाबियत का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है, और यह कुफ़्र और यहूद ही की पैदावार है, वहाबियत के जन्म लेने का मक़सद ही इस्लाम और क़ुर्आन का विरोध और मुसलमानों के बीच आपसी मतभेद फैलाना है, यह टोला न केवल शियों के मोक़द्दस मज़ारों को ढ़हाने पर तुला है बल्कि पूरी इस्लामी धरोहर और संसकृति को मिटाने में दिन रात लगे हैं, जैसे कि उनकी आंखों में नबी का मज़ार भी चुभता है, और एक दिन वह क़ुर्आन और काबे को भी मिटाने की कोशिश करेंगे। (सामरा में वहाबियों द्वारा दोबारा हमले के बाद आपका यह बयान आया था 13 जून 2007)
आयतुल्लाह साफ़ी गुलपाएगानी
मैंने जब अल-अवासिम मिनल क़वासिम नामी किताब पढ़ी, तो मैं मुसलमानों के बीच उसके द्वारा भड़काई जाने वाली साज़िशों को देख कर हैरत में पड़ गया, ख़ुदा की क़सम मुझे यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि आज के दौर में भी कोई मुसलमान आपस में झगड़ा या रंजिश करवाने के लिए इस हद तक गिर सकता है, और जितने भी आपसी इत्तेहाद और भाईचारे की कोशिश कर रहे हैं उनको झूठा, नादान, मक्कार और मुनाफ़िक़ जैसे अपशब्द कह कर विरोध करते, और सबसे अफ़सोस और दुख की बात यह है कि यह किताब मदीने के एक बहुत बड़े विश्व विधालय से छपी है। वहाबियों को केवल अहले बैत अ.स. से दुशमनी नहीं है बल्कि उन्हें पैग़म्बर के वजूद से भी कोई लगाव नहीं है, वह इस्लाम और उसके इतिहास को बदलने और उसे बर्बाद करने की साज़िशों में लगे हैं, उन्हे जान लेना चाहिए कि न अहले बैत अ.स. के नाम कभी मिटने वाला है और न उनकी यादगार चीज़ें, जो चीज़ बहुत जल्द नाबूद होने वाली है वह वहाबियत और उसके फैलाए गए चारो ओर फ़ितने हैं। 


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