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Code : 188193
Date of publication : 4/7/2017 19:1
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वहाबियत के विरुध्द सुन्नी उलेमा के विचार।

उसको काफ़िर कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं की, अपनी एक तक़रीर में यहाँ तक कहा कि, अगर कोई इब्ने तैमिया को शैख़ुल इस्लाम कहे वह काफ़िर है।


विलायत पोर्टल :
  - मोरक्को के सुन्नियों के बड़े विद्वान इब्ने बतूता ने अपने सफ़रनामे में इब्ने तैमिया को पागल कहते हुए लिखा है कि, दमिश्क़ में हम्बली फ़िक़्ह के बड़े आलिम इब्ने तैमिया के अनेक विषय पर बातें करते देखा लेकिन मुझे वह पागल दिखाई दिया। (रेहलए इब्ने बतूता, जिल्द 1, पेज 57)
- शौकानी नाम के एक और सुन्नी आलिम ने कहा कि इब्ने तैमिया को शैख़ुल इस्लाम की उपाधि देना क़ुफ़्र है। - मोहम्मद बोख़ारी हनफ़ी जिनकी वफ़ात 841 हिजरी में हुई उन्होंने इब्ने तैमिया की नई नई बिदअतें निकालने और उसको काफ़िर कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं की, अपनी एक तक़रीर में यहाँ तक कहा कि, अगर कोई इब्ने तैमिया को शैख़ुल इस्लाम कहे वह काफ़िर है। (बद्रुत-तालेए, जिल्द 2, पेज 260)
- दसवीं सदी के सुन्नियों के नामवर विद्वान इब्ने हजर मक्की ने इब्ने तैमिया को गुमराह और दूसरों को गुमराह करने वाला कहते हुए लिखा है कि, अल्लाह ने उसे ज़लील, गुमराह, अंधा और बहरा बना दिया है, और सुन्नियों के पिछले और हाल के शाफ़ेई, मालिकी, हनफ़ी उलेमा ने साबित किया है कि उसके अक़ाएद और विचार ग़लत और बातिल हैं...... इब्ने तैमिया के विचारों की कोई हैसियत नहीं है, वह एक बिदअत फ़ैलाने वाला गुमराह और दूसरों को गुमराह करने वाला नाकारा इंसान था, ख़ुदा उसके साथ पूरा पूरा न्याय करे और हमें उसके बातिल और गुमराह अक़ीदे और विचारों से बचाए। (अल-फ़तावल हदीसह, पेज 86)
- सुन्नियों के एक और नामवर आलिम क़ाज़ी शाफ़ेई ने तो इब्ने तैमिया के विचारों को मानने वालों का ख़ून बहाना भी जाएज़ कहा है, जैसाकि इब्ने हजर और शौकानी ने लिखा है कि दमिश्क़ के क़ाज़ी शाफ़ेई ने पूरे दमिश्क़ में ऐलान करवा दिया कि जो इब्ने तैमिया के अक़ीदे और विचारों की पैरवी करेगा उसका माल लूटना और ख़ून बहाना जाएज़ है। ( अल-दोररोल-कामेलह, जिल्द 1, पेज 147, अल-बद्रुत-तालेए, जिल्द 1, पेज 67, मिरातुल-जिनान, जिल्द 2, पेज 242)
- सुन्नियों के एक और आलिम हुसनी दमिश्क़ी ने इब्ने तैमिया को नास्तिक कहते हुए लिखते हैं कि, उस इब्ने तैमिया जिसे कुछ इल्म का समुंद्र कहते हैं उसे कुछ बड़े उलेमा ने नास्तिक कहा है। और ऐसा कहने का मुख्य कारण यह है कि उन बुज़ुर्ग उलेमा ने इब्ने तैमिया की सभी किताबों में उसके विचारों की जांच की है और उन्हें उसके अक़ीदे और विचार सही नहीं लगे, उसके विचारों में केवल मुसलमानों को काफ़िर और गुमराह गया है। उसने अपनी किताबों में अल्लाह को जिस्म वाला मानते हुए इंसानों से मिलाया है, कहीं पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. का अपमान किया तो कहीं शैख़ैन का, और एक जगह अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास को काफ़िर लिखा है, उसने इब्ने अब्बास जैसे महान सहाबी को नास्तिक, अब्दुल्लाह इब्ने उमर को मुजरिम, बिदअत फैलाने वाला और गुमराह लिखा है, उसने यह सब बेहूदा बातें अपनी किताब अल-सिरातुल मुस्तक़ीम में लिखी हैं। (दफ़उश-शुबहा अनि-रसुल, पेज 125)
 हुसनी दमिश्क़ी ने एक जगह इस तरह लिखा कि, इब्ने तैमिया कहता है कि, जो भी किसी मर जाने वाले या निगाहों से दूर रहने वाले से दुआ और इस्तेग़ासा करे वह पापी, गुमराह और मुशरिक है, वह लिखते हैं कि इब्ने तैमिया की इन बातों से बदन लरज़ उठता है, उस नास्तिक से पहले किसी दौर में किसी जगह पर किसी ने भी यह विचार पेश नहीं किए थे, यहाँ तक कहना है कि, पैग़म्बर की वफ़ात के बाद उनका सम्मान भी ख़त्म हो गया, उसका यह अक़ीदा और विचार उसके काफ़िर, नास्तिक और मुनाफ़िक़ होने को साबित करता है। दफ़उश-शुबहा अनि-रसुल, पेज 131)
- सुन्नियों के एक और विद्वान सुबकी (जो 756 हिजरी में वफ़ात पाए) जो अहले सुन्नत के मशहूर और इब्ने तैमिया के दौर के आलिम हैं इन्होंने बिदअत फैलाने वाला बताते हुए लिखा है, उसने क़ुर्आन और सुन्नत की आड़ में इस्लामी अक़ीदों के नाम पर बिदअत फैला कर इल्लामी बुनियादों को खोखला किया है, उसने अल्लाह को बारे में ऐसे विचार पेश किए जिस से उस की पैरवी करने वाले अल्लाह को जिस्म वाला मानने लगे, और भी उस ने इस प्रकार के कई विचार पेश किए जिस से वह 73 फ़िरक़ों से भी बाहर निकस गया। (तबक़ातुश-शाफ़ेईयह, जिल्द 5, पेज 253, वल-दोररतुल-मोज़िय्यह फ़िल-रद अला इब्ने तैमिया, पेज 5)
 - इब्ने हजर असक़लानी जो सुन्नियों के बहुत बड़े ज्ञानी और जिनकी उपाधि हाफ़िज़ थी उनका इब्ने तैमिया के बारे में कहना है कि, सुन्नी उलेमा का इब्ने तैमिया के बारे में अनेक विचार हैं, कुछ का कहना है कि वह अल्लाह को जिस्म वाला मानता है क्योंकि उसने अल-अक़ीदतुल हमविय्यह में अल्लाह के हाथ पैर और चेहरे के बारे में बातें की हैं, औक कुछ ने उसके तवस्सुल और पैग़म्बर के वसीले से दुआ करने को शिर्क कहने के कारण उसे नास्तिक कहा है क्योंकि उन उलेमा का कहना है कि ऐसे विचार हमारे नबी की शान में गुस्ताख़ी हैं, और कुछ ने उसकी इमाम अली अ.स. के बारे में घटिया और बे बुनियाद बातों के कारण उसे मुनाफ़िक़ कहा है। (अल-दोररोल कामेलह, जिल्द 1, पेज 155)
- ज़हबी सुन्नियों के वह आलिम हैं जो इल्मे हदीस और रेजाल के माहिर थे वह भी इब्ने तैमिया की तरह हंबली फ़िक़्ह से थे और उसी के दौर के आलिम थे, ज़हबी ने उसको एक ख़त के द्वारा इस प्रकार कहा, बेचारे, जो भी तेरी पैरवी करते हैं वह सब नास्तिक और बे धर्म हैं, और तेरे मानने वाले भी पिछड़े हुए, बुध्दू, झूठे, मक्कार, झगड़ालू और ना समझ हैं, अगर तुझे मेरी बात पर यक़ीन नहीं तो तू ख़ुद इनको परख के देख ले। ( अल-ऐलान बित्तौबीख़, पेज 77)


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