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Code : 188041
Date of publication : 25/6/2017 16:58
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ईदुल फ़ितर के आदाब और अहकाम।

अगर कोई रोज़ा रखे और जान बूझ कर फ़ितरा न निकाले हक़ीक़त में उसने रोज़ा ही नहीं रखा यानी उसके रोज़े क़ुबूल नहीं होंगे।


विलायत पोर्टल : 
1. शबे ईद अल्लाह की इबादत के लिए जागना, इमाम सादिक़ अ.स. अपने वालिद से नक़्ल करते हुए फ़रमाते हैं कि, इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ.स. शबे ईद में रात भर जागते और अल्लाह की इबादत करते थे। (वसाएलुश-शिया, हुर्रे आमुली, जिल्द 8, पेज 87)
2. ज़ियारते इमाम हुसैन अ.स. पढ़ना, सैय्यद इब्ने ताऊस ने इक़बालुल आमाल में शबे ईद के आमाल में इमाम हुसैन अ.स. की ज़ियारत की ताकीद की है।
3. शबे ईद और ईद के दिन ग़ुस्ल करना, शबे ईद में ग़ुस्ल करने का समय मग़रिब की अज़ान के बाद से सुबह की अज़ान तक है, लेकिन रात के शुरू के हिस्से में ग़ुस्ल करना बेहतर है, और ईद के दिन ग़ुस्ल करने का समय सुबह का अज़ान से ज़ोहर की अज़ान तक है, लेकिन ईद की नमाज़ से पहले ग़ुस्ल करना बेहतर है। (रिसालए इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह, मसला न. 644)
4. फ़ितरा देना, जिस प्रकार पैग़म्बर और उनके घराने पर सलवात के बिना नमाज़ अधूरी है उसी प्रकार फ़ितरे के बिना रोज़े का भी कोई फ़ायदा नहीं है, इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं, फ़ितरा उन चीज़ों में से है जो रोज़े को कामिल करता है, जिस प्रकार सलवात के बिना नमाज़ अधूरी है उसी प्रकार अगर कोई रोज़ा रखे और जान बूझ कर फ़ितरा न निकाले हक़ीक़त में उसने रोज़ा ही नहीं रखा यानी उसके रोज़े क़ुबूल नहीं होंगे। (इक़बालुल आमाल, सैय्यद इब्ने ताऊस, जिल्द 1, पेज 466, मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, शैख़ सदूक़, जिल्द 2 पेज 119) इसके अलावा इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं, जो भी शख़्स फ़ितरा निकालता है अल्लाह उस निकाले गए माल को कहीं न कहीं से ज़रूर पूरा करता है। (मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, शैख़ सदूक़, जिल्द 2 पेज 119)
5. तकबीर कहना, रमज़ान के मुबारक महीने में अल्लाह की मदद, अपने नफ़्स पर कंट्रोल कर पाने, हिदायत जैसी नेमत के मिलने पर मदद करने वाले और नेमत के देने वाले की बड़ाई का ऐलान करना चाहिए, इसी लिए शबे ईद मग़रिबैन की नमाज़ के बाद और ईद के दिन सुबह की नमाज़, ईद की नमाज़ के बाद और ज़ोहरैन की नमाज़ के बाद इस प्रकार तकबीर कहना मुसतहब है, अल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर, अल्लाहो अकबर व लिल्लाहिल हम्द, अल्लाहो अकबर अला मा हदाना। (रिसालए इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह, मसला न. 1526)
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