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Date of publication : 13/2/2017 16:52
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इमामे सज्जाद अ. के ज़माने के शासकों पर एक निगाह।

इमामे सज्जाद अलैहिस्सलाम इसके बावजूद कि बहुत बुरे युग में जीवन बिता रहे थे और अत्याचारी बादशाहों ओर से आपको शारीरिक और मानसिक पीड़ा दी जा रही थी लेकिन इस्लाम के प्रचार.....



विलायत पोर्टलः इमामे सज्जाद अलैहिस्सलाम इसके बावजूद कि बहुत बुरे युग में जीवन बिता रहे थे और अत्याचारी बादशाहों ओर से आपको शारीरिक और मानसिक पीड़ा दी जा रही थी लेकिन इस्लाम के प्रचार और उसकी जड़ों को मज़बूत करने और पैग़म्बरे इस्लाम स. के लाए हुए दीन और उनके चरित्र को फैलाने में अपने आप में उदाहरण थे।
यहां हम संक्षेप में इमाम के युग के बादशाहों और उनके अत्याचारों व करतूतों को बयान करेंगे।
1.    यज़ीद इब्ने मुआविया
इमाम सज्जाद अ. की इमामत के शुरूआती चार वर्ष यज़ीद के शासनकाल में गुज़रे, यज़ीद का असली चेहरा किसी से छुपा नहीं है, वह सबसे पहला इस्लामी शासक है जो खुलेआम सबके सामने शराब पिया करता था और अपने दरबार को अय्याशी का अड्डा बना रखा था और हर बुरा काम खुलेआम किया करता था, शराब और अय्याशी की तारीफ़ और परिभाषा करते हुए ख़ुद शायरी करता और शायरी करने वालों को उपहार और इनाम देता था। (तज़केरतुल ख़वास, सिब्ते इब्ने जौज़ी, पेज 287)
उसने अपने शासनकाल के पहले साल पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. के नवासे हज़रत इमाम हुसैन अ. को बड़ी क्रूरता और बेरहमी से शहीद क के आपकी औरतों और बच्चों को क़ैद करके विभिन्न शहरों में भिजवाया, यज़ीद ने अपने चार साल के शासनकाल के अंतिम वर्ष में मुसलमानों के पवित्र शहर मदीना में नरसंहार कर हजारों मुसलमानों का ख़ून बहाया और शासन के अंतिम दिनों में मुसलमानों के पवित्र शहर मक्का पर हमला कर अल्लाह के घर में आग लगाई। (तारीख़े याक़ूबी, जिल्द 2, पृष्ठ 184)
मशहूर इतिहासकार मसऊदी ने अपनी किताब में यज़ीद को फ़िरऔन से बदतर लिखा है। (मुरव्वजुज़्ज़हब, मसऊदी, जिल्द 3, पृष्ठ 85)
2.    अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर 
यज़ीद के बाद ज़ुबैर का बेटा सऊदी को फ़तेह करके वहॉं का शासक बना, वह एक पाखंडी ढोंगी निर्दई और हुकूमत का लालची था। (बामदादे इस्लाम, डाक्टर अब्दुल हुसैन, पृष्ठ 200)
हुकूमत की लालच की सीमा यह थी कि अपने ही भाई अम्र इब्ने ज़ुबैर को क़त्ल कर दिया था। (अलकामिल फित्तारीख़, इब्ने असीर, जिल्द 5, पृष्ठ 198)
उसने पैग़म्बर के चचा अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास इमाम अली के बेटे मुहम्मद हनफ़िया और इनके साथ बनी हाशिम के 24 लोगों को एक कमरे में बंदी बना के चारों ओर लकड़ी और ईंधन जमा करके कहा था कि अगर मेरी बैअत नहीं की तो सबको जला देगा। (याक़ूबी, जिल्द 2, पृष्ठ 261)
अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने सलवात से आले मुहम्मद को अ. हटा दिया था लोंगो के विरोध करने पर उसने कहा कि मुहम्मद स.अ.आ.स. अल्लाह के पैग़म्बर थे लेकिन उनके परिवार में बुरे लोग पाए जाते हैं अगर उनका नाम अगर सलवात में लिया जाएगा तो घमंड और अकड़ दिखाएंगे। (मुरव्वजुज़्ज़हब, जिल्द 3,पृष्ठ 84)
अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर ने पैग़म्बर की बहुत सी सुन्नतों को भी ख़त्म कर दिया था।
3.    अब्दुल्मलिक इब्ने मरवान
इमाम सज्जाद अ. की इमामत का युग अक्सर इसी शासक के शासन काल में बीता, मरवान और उसके परिवार की बनी हाशिम से दुश्मनी को साबित करने की ज़रूरत नहीं है, इसे समझने के लिए ज़ियारते आशूरा ही बहुत है।
अब्दुल्मलिक, मरवान का बेटा था वह भी अपने बाप की तरह पैग़म्बर के ख़ानदान से ईर्ष्या रखता था, और इमाम अली अ. के शिया और चाहने वाले अक्सर कूफ़ा में रहते थे इसलिए शासनकाल शुरू होते ही कूफ़े में हज्जाज इब्ने यूसुफ़ सक़फ़ी को वहॉं का हाकिम बना दिया, हज्जाज एक क्रूर दुष्ट पापी धर्मभ्रष्ट इंसान था जिसे क़त्ल करने में मज़ा आता था। उसी ने कुमैल इब्ने ज़ियाद, मीसमे तम्मार, इमाम अली अ. के ग़ुलाम और रुशैद हजरी जैसे बहुत सारे शिंयो को क्रूरता से शहीद किया, उसकी जेल बेगुनाह शियों से भरी थी कि जिनका खाना पीना गरम पानी ख़ाली नमक और इस तरह की चीज़े ही रहती थीं। (तारीख़े इब्ने ख़लकान, जिल्द 1, पृष्ठ 347)
हज्जाज बनी उमय्या का ऐसा चापलूस कठपुतली था कि उसने अब्दुल्मलिक इब्ने मरवान को पैग़म्बरे इस्लाम से आगे बढ़ा दिया था। (तारीख़े इब्ने ख़लकान जिल्द 1 पृष्ठ 285)
हज्जाज कूफ़ा से पहले 2 साल मदीने का शासक था, हॉलाकि पैग़म्बर की सुन्नत और उसके असर को बनी उमय्या के पिछले शासकों ने काफी अधिक मात्रा में या मिटा दिया था या बदल दिया था लेकिन फिर भी काफी कुछ बचा था उसने उन बची हुई सुन्नत से खिलवाड़ शुरु कर दिया, कभी पैग़म्बर की क़ब्र का अपमान कभी आपके मिंबर का, और हद तो यह हो गई कि पैग़म्बरे इस्लाम के महान सहाबियों का इस तरह अपमान किया गया कि कभी उनकी गर्दन तो कभी उनकी हाथों पर लोहा पिघला के सबके सामने डाला गया।
(तारीख़े याक़ूबी, जिल्द 3, पृष्ठ 17- अलकामिल फ़ित्तारीख़ जिल्द 5, पृष्ठ 192)
इतनी क्रूरता और दुष्टता के बाद भी जब मदीना छोड़ के जाने पर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए कहा कि इस शहर के लोग सबसे बुरे हैं, इस शहर में एक लकड़ी के टुकड़े जिसे पैग़म्बर का मिंबर और उनके मज़ार के अलावा कुछ भी नहीं है जिससे यह लोग चिपके रहते हैं। (तारीख़े तहलीलिए इस्लाम, डाक्टर सैय्यद जाफ़र शहीदी, पृष्ठ 195)
इराक़ में अपनी 20 साल के शासनकाल में 1 लाख 20 हज़ार लोगों की हत्या और लगभग इतने ही लोगों को ऐसे जेल में रखा जहॉं मर्द औरत एक साथ थे जिसमें एक तिहाई लोगों के शरीर पर कपड़ा तक गल चुका था। (तारीख़े तबरी, जिल्द 5, पृष्ठ 93)



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